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रहीमाबाद पुलिस पर ₹50 हजार रिश्वत मांगने का आरोप
पैसे न देने पर युवकों को उठाकर थाने में बंद करने व बदले की भावना का आरोप
लखनऊ- राजधानी लखनऊ के रहीमाबाद थाना क्षेत्र से पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। एक पीड़ित परिवार ने मुख्यमंत्री को प्रार्थना पत्र भेजकर आरोप लगाया है कि रहीमाबाद पुलिस के कुछ कर्मियों ने न केवल रिश्वत की मांग की, बल्कि पैसे न देने पर निर्दोष युवकों को उठाकर थाने में बंद कर दिया।
प्रार्थना पत्र के अनुसार, ग्राम बांक मजरा खड़ौहा, थाना रहीमाबाद निवासी नरेश पुत्र रामचंदर ने बताया कि उन्होंने पहले एक मारपीट के मामले में थाने में शिकायत दी थी। उनका आरोप है कि विपक्षियों ने उनके साथ मारपीट कर गंभीर चोटें पहुंचाई थीं, लेकिन पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेने के बजाय इसे एनसीआर में दर्ज कर दिया। जबकि घटना में लाठी-डंडों से हमला कर गंभीर रूप से घायल किया गया था।
पीड़ित ने बताया कि 4 मार्च 2026 को इस मामले को एनसीआर में दर्ज किया गया, जबकि यह संगीन अपराध की श्रेणी में आता था। इसके बाद उन्होंने 13 मार्च 2026 को सहायक पुलिस आयुक्त को भी प्रार्थना पत्र देकर मामले की निष्पक्ष जांच और आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग की, लेकिन इसके बावजूद कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
सबसे गंभीर आरोप 8 मार्च से जुड़ा है, जब पीड़ित के अनुसार रहीमाबाद थाने के दो पुलिसकर्मी—सुमित और शेषपाल—ने उनसे ₹50,000 की रिश्वत मांगी। आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने कहा कि यदि पैसा दिया जाता है तो मामले में मदद की जाएगी, अन्यथा उन्हें ही फंसाकर गंभीर धाराएं लगा दी जाएंगी। वहीं इससे पहले इन्हीं दोनों सिपाहियों की इसी पूर्व मामले में रिश्वत मांगने की रिकॉर्डिंग सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी, व पूर्व में इसपर खबर भी प्रकाशित हो चुकी है परन्तु अभी तक एक महीना बीत गया किसी प्रकार की कोई कारवाही नहीं हुई है|
वहीं पीड़ित का कहना है कि उन्होंने रिश्वत देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद 6 अप्रैल 2026 की सुबह करीब 8 बजे इन्हीं दोनों पुलिसकर्मी द्वारा सादी वर्दी में उनके पुत्र नीरज और हिमांशु को सड़क से उठाकर थाने ले जाकर बंद कर दिया। इस दौरान कुछ स्थानीय लोगों—जिनमें उमा शंकर, गोलू, अर्जुन, अनिल और रानी जैसे नाम शामिल हैं—की मौजूदगी का भी जिक्र किया गया है, जिन्होंने कथित रूप से पुलिस के साथ मिलकर इस कार्रवाई को अंजाम दिया।
प्रार्थना पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि एक स्थानीय व्यक्ति, जो शराब का आदी बताया गया है, पुलिस और आम लोगों के बीच दलाली का काम करता है। आरोप है कि वही व्यक्ति पुलिसकर्मियों से मिलकर लोगों पर दबाव बनवाता है और रिश्वत की मांग करवाता है।
पीड़ित परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि जिन असली आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज होना चाहिए था, उन्हें छोड़ दिया गया, जबकि निर्दोष युवकों को फंसाकर थाने में बंद कर दिया गया। इससे साफ होता है कि पूरे मामले में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया गया।
वहीं पीड़ित को बार बार यह दोनों ही पुलिसकर्मियों द्वारा परेशान किया जा रहा, उसको झूठे केसों में इन दोनों पुलिसकर्मी द्वारा फंसाया जा रहा है, क्या अब पुलिस पीड़ितों से बदले की कार्यवाही करेगी, बड़ा सवाल है?? अंत में पीड़ित ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए और जिन निर्दोष युवकों को बंद किया गया है, उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।
साथ ही, पूरे प्रकरण में शामिल अन्य लोगों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है।यह मामला सामने आने के बाद स्थानीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया है और लोगों में पुलिस की कार्यशैली को लेकर असंतोष देखा जा रहा है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस गंभीर शिकायत पर क्या कार्रवाई करता है।
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