दीवानी मामलों के लिए पुलिस के पास जाने की प्रवृत्ति कानून के शासन को कमज़ोर करती है

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 'दिखावटी' FIRs की कड़ी आलोचना की

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ब्यूरो प्रयागराज- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में इस बात को 'परेशान करने वाला' बताया कि जनता दीवानी मामलों के समाधान के लिए पुलिस और कलेक्टरों के पास जाती है, क्योंकि यह प्रवृत्ति कानून के शासन की बुनियाद को कमज़ोर करती है। ऐसे मामलों में समाधान के लिए उन गैर-कानूनी एजेंसियों को बढ़ावा देती है, जिनका उन मामलों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं होता।

जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने दलजीत सिंह और एक अन्य व्यक्ति द्वारा दायर एक आपराधिक रिट याचिका की सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं।उनकी याचिका में एक FIR को चुनौती दी गई, जो मूल रूप से एक व्यावसायिक विवाद से संबंधित थी। यह विवाद याचिकाकर्ताओं द्वारा अपने माल को अलग-अलग जगहों पर पहुंचाने के लिए किराए पर लिए गए वाहनों के भाड़े का भुगतान न करने को लेकर था।

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उस पर गोली चलाई गई, लेकिन गोली किसी को लगी नहीं। खंडपीठ ने गौर किया कि यह पहली नज़र में "दिखावटी आरोप" था, जिसे जान-बूझकर एक दीवानी विवाद को आपराधिक रंग देने के लिए गढ़ा गया।खंडपीठ ने टिप्पणी की, "यह बहुत परेशान करने वाली बात है कि समाज के हर तबके के लोग सभी प्रकार के दीवानी मामलों के समाधान के लिए पुलिस और ज़िलों के कलेक्टरों के पास जाने की ज़िद करते हैं, जबकि इन मामलों पर अधिकार क्षेत्र दीवानी अदालत का होता है। यह प्रवृत्ति, जिसे समाज के सभी वर्गों द्वारा बढ़ावा दिया जाता है, कानून के शासन की बुनियाद को कमज़ोर करने और ऐसे मामलों में समाधान के लिए उन गैर-कानूनी एजेंसियों को बढ़ावा देने की संभावना रखती है, जिनका उन मामलों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं होता।"

इस पृष्ठभूमि में पहली नज़र में मामला बनता देख, अदालत ने याचिका स्वीकार कर ली और नोटिस जारी किए।खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत दी और निर्देश दिया कि जब तक कोई अगला आदेश नहीं आ जाता, तब तक उन्हें BNS की धारा 109(1), 116(2) और 352 के तहत दर्ज FIR में गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।। अदालत ने मुरादाबाद के सीनियर पुलिस अधीक्षक से एक हलफनामा भी मांगा, जिसमें यह स्पष्टीकरण मांगा गया कि पुलिस ने यह FIR किस आधार पर दर्ज की। इस मामले को 15 अप्रैल को आदेश के लिए सूचीबद्ध किया गया।

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