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आतंकवाद और नक्सलवाद से मुक्ति के बाद भी सतर्कता बेहद जरूरी
राजनीतिक इच्छाशक्ति, रणनीतिक समन्वय और सुरक्षाबलों के सतत प्रयासों का समेकित प्रभाव है।
देश की आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर बीते वर्षों में जो परिवर्तन देखने को मिला है, वह निश्चित ही एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में दर्ज किया जाएगा। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने एक बार फिर यह संदेश देने का प्रयास किया है कि उसकी घोषणाएं केवल आश्वासन नहीं, बल्कि संकल्प हैं जिन्हें समयबद्ध तरीके से पूरा किया जा सकता है। कश्मीर में आतंकवाद के प्रभाव में कमी और नक्सलवाद के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई ने लंबे समय से चले आ रहे सुरक्षा संकट को काफी हद तक नियंत्रित किया है। कुछ वर्ष पहले तक लाल चौक जैसे संवेदनशील स्थानों पर आम नागरिकों का बेखौफ आना-जाना भी असंभव प्रतीत होता था, लेकिन आज यहां सामान्य जीवन की वापसी एक सकारात्मक संकेत है। यह परिवर्तन केवल सैन्य कार्रवाई का परिणाम नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, रणनीतिक समन्वय और सुरक्षाबलों के सतत प्रयासों का समेकित प्रभाव है।
नक्सलवाद के संदर्भ में केंद्र और राज्यों के साझा प्रयासों ने निर्णायक मोड़ लाने का काम किया है। सरकार द्वारा निर्धारित समय सीमा 31 मार्च 2026 तक इस समस्या को समाप्त करने का लक्ष्य रखा गया था, और इसी दिशा में लगातार अभियान चलाए गए। सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई, खुफिया तंत्र की सक्रियता और आत्मसमर्पण नीति के प्रभावी क्रियान्वयन ने नक्सली संगठनों की जड़ों को कमजोर किया है। बड़ी संख्या में उग्रवादियों का आत्मसमर्पण इस बात का संकेत है कि हिंसा का रास्ता अब उनके लिए टिकाऊ विकल्प नहीं रह गया है। हालांकि, यह उपलब्धि जितनी महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण इसे बनाए रखना है। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी राष्ट्र ने सुरक्षा के मोर्चे पर ढिलाई बरती है, तब अस्थिरता ने पुनः सिर उठाया है। आतंकवाद और नक्सलवाद जैसी चुनौतियां केवल बंदूक की नोक से समाप्त नहीं होतीं; इनके पीछे वैचारिक, सामाजिक और आर्थिक कारण भी होते हैं, जिनका निरंतर समाधान आवश्यक है।
सीमा पार से सक्रिय आतंकी ताकतें भारत की स्थिरता और प्रगति को सहज रूप से स्वीकार नहीं करेंगी। ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता, खुफिया तंत्र की मजबूती और स्थानीय स्तर पर जनसहभागिता अत्यंत आवश्यक हो जाती है। साथ ही, विकास की धारा को उन क्षेत्रों तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है, जहां कभी असंतोष ने उग्र रूप लिया था। अंततः, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि देश आज आतंकवाद और नक्सलवाद से मुक्ति की दिशा में एक मजबूत स्थिति में खड़ा है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि सुरक्षा एक सतत प्रक्रिया है, न कि एक बार हासिल कर लेने वाली उपलब्धि। इसलिए सरकार, सुरक्षा बलों और आम नागरिकों सभी को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि शांति और स्थिरता की यह उपलब्धि स्थायी बनी रहे तभी देश वास्तव में एक सुरक्षित, स्थिर और समृद्ध भविष्य की ओर अग्रसर हो सकेगा।
अरविंद रावल


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