ज्ञान आधारित महाशक्ति बनने के लिए भारतीय महिलाओं का वैज्ञानिक क्रांति का सारथी बनना आवश्यक

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डा. मनमोहन प्रकाश 
 
​प्रत्येक वर्ष 28 फरवरी को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय विज्ञान दिवस केवल सर सी.वी. रमन द्वारा 1928 में खोजे गए 'रमन प्रभाव' की स्मृति मात्र नहीं है, बल्कि यह आधुनिक भारत के उस संकल्प का प्रतिबिंब है जहाँ विज्ञान ही राष्ट्र की नियति का आधार बनेगा। आज जब भारत 'विकसित भारत @2047' के महालक्ष्य की ओर अग्रसर है, तब यह स्पष्ट है कि हम केवल भौतिक संसाधनों के बल पर नहीं, बल्कि 'ज्ञान' की शक्ति से विश्व पटल पर अपनी पहचान बना सकते हैं, और बना भी रहे हैं। इस ज्ञान आधारित महाशक्ति की परिकल्पना तब तक अधूरी है, जब तक देश की आधी आबादी, यानी हमारी महिला वैज्ञानिक, इस क्रांति की मुख्य सारथी नहीं बन जातीं।
 
​भारतीय महिलाओं ने गत वर्षों में यह सिद्ध किया है कि वे विज्ञान के क्षेत्र में केवल सहभागी नहीं, बल्कि निर्णायक नेतृत्वकर्ता का रोल अदा करने के लिए तैयार हैं। अंतरिक्ष विज्ञान के दुर्गम क्षेत्र में 'रॉकेट वुमन' रितु करिधाल और मुथैया वनिता जैसी वैज्ञानिकों ने चंद्रयान जैसे जटिल मिशनों का सफल प्रबंधन कर वैश्विक स्तर पर भारत की तकनीकी क्षमता का लोहा मनवाया है। वहीं रक्षा अनुसंधान के क्षेत्र में 'मिसाइल वुमन' डॉ. टेसी थॉमस का योगदान अग्नि मिसाइल कार्यक्रमों की सफलता के रूप में हमारे सामने है, जिसने भारत को रणनीतिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया है। स्वास्थ्य और जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में डॉ. प्रिया अब्राहम और डॉ. गगनदीप कांग जैसे नामों ने महामारी के दौरान स्वदेशी शोध और वैक्सीन विकास के जरिए करोड़ों जीवन बचाकर भारत को 'विश्व की फार्मेसी' के रूप में स्थापित करने में केंद्रीय भूमिका निभाई है।
 
​आंकड़ों की दृष्टि से देखें तो भारत में एक सुखद परिवर्तन दिखाई देता है। 'ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन' के अनुसार, भारत में विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित पाठ्यक्रमों में महिलाओं का नामांकन लगभग 43% है, जो अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों की तुलना में कहीं बेहतर स्थिति को दर्शाता है। हालांकि, इस नामांकन को सक्रिय शोध और वरिष्ठ नेतृत्व के पदों में बदलना अभी भी एक चुनौती है, जिसे 'लीकी पाइपलाइन' कहा जाता है। अनुसंधान और विकास  के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी वर्तमान में 20% के आसपास है, जिसे बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा 'किरण', 'विज्यान ज्योति' और 'गति' जैसी महत्वपूर्ण योजनाएं चलाई जा रही हैं। ये नीतियां न केवल छात्राओं को विज्ञान की ओर आकर्षित करती हैं, बल्कि शोध के क्षेत्र में उनके करियर को निरंतरता प्रदान करने में भी सहायक सिद्ध हो रही हैं।
 
​एक ज्ञान आधारित समाज का अर्थ है जहाँ समस्याओं का समाधान डेटा, तर्क और निरंतर नवाचार से निकले। वैज्ञानिक शोध में महिलाओं की भागीदारी से न केवल कार्यस्थल पर विविधता आती है, बल्कि समस्याओं को देखने का एक नया मानवीय और सामाजिक दृष्टिकोण भी मिलता है। विश्व बैंक के अनुमान बताते हैं कि यदि नवाचार और श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के बराबर हो जाए, तो भारत की जीडीपी में 27% तक की अतिरिक्त वृद्धि संभव है। अतः, महिला वैज्ञानिकों का सशक्तिकरण केवल एक सामाजिक न्याय का विषय नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आर्थिक और रणनीतिक आवश्यकता भी है।
 
​निष्कर्षतः, विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब भारत की बेटियाँ प्रयोगशालाओं में केवल सहायक नहीं, बल्कि मुख्य अन्वेषक और आविष्कारक की भूमिका में होंगी। जब विज्ञान की मशाल महिला नेतृत्व के हाथों में होगी, तभी भारत की प्रगति की गति अजेय और सर्वसमावेशी बनेगी। सरकारी तथा गैर सरकारी वैज्ञानिक संस्थानों  को यह संकल्प लेना होगा कि वे ऐसा समावेशी पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करेंगे जहाँ हर महिला वैज्ञानिक प्रतिभा को फलने-फूलने का समान अवसर मिले, क्योंकि राष्ट्र की विकास यात्रा में नारी शक्ति का सारथी बनना ही भारत को पुनः विश्वगुरु के पद पर आसीन करा सकता है।

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