आतंकवाद की जड़ पर 'प्रहार'

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महेन्द्र तिवारी

 

आतंकवाद-विरोधी नीति का अनावरण भारतीय सुरक्षा इतिहास की एक ऐसी घटना है, जिसने देश की रक्षात्मक रणनीति को एक नए और आक्रामक धरातल पर खड़ा कर दिया है। प्रहार, यह नीति केवल एक आधिकारिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह आतंकवाद के विरुद्ध भारत की सामूहिक इच्छाशक्ति और 'जीरो टॉलरेंस' के सिद्धांत की एक वैधानिक उद्घोषणा है। पिछले कई दशकों से भारत ने सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद का दंश झेला है, लेकिन 'प्रहार' पहली बार एक ऐसी एकीकृत और व्यापक रूपरेखा प्रस्तुत करती है जो न केवल वर्तमान खतरों से लड़ती है, बल्कि भविष्य की उन चुनौतियों का भी आकलन करती है जो अभी तक क्षितिज पर उभर ही रही हैं।

इस नीति का सबसे प्रमुख पहलू इसकी समग्रता है, जो जल, थल और नभ तीनों ही मोर्चों पर सुरक्षा की एक अभेद्य दीवार खड़ी करने का लक्ष्य रखती है। आधुनिक युग में आतंकवाद का चेहरा पूरी तरह बदल चुका है; यह अब केवल बंदूकों और विस्फोटकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें ड्रोन तकनीक, साइबर हमले, और परिष्कृत एन्क्रिप्शन का समावेश हो चुका है। 'प्रहार' नीति इन बदलती वास्तविकताओं को पहचानती है और स्वीकार करती है कि आज का आतंकवादी साइबर स्पेस में बैठकर देश के बुनियादी ढांचे पर प्रहार कर सकता है।

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भारत की भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति इसे आतंकवाद के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील बनाती है। 'प्रहार' दस्तावेज में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि देश को सीमा पार से संचालित होने वाले उन राज्य-प्रायोजित समूहों से निरंतर खतरा है जो पंजाब और जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अस्थिरता पैदा करने के लिए ड्रोन जैसी नई तकनीकों का सहारा ले रहे हैं। ये ड्रोन न केवल हथियारों की तस्करी कर रहे हैं, बल्कि नशीले पदार्थों के माध्यम से भारत की युवा पीढ़ी को खोखला करने का एक नया माध्यम बन गए हैं।

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इसके साथ ही, अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक एंड सीरिया जैसे वैश्विक आतंकी संगठनों की भारत में पैठ जमाने की कोशिशों को भी इस नीति में गंभीरता से लिया गया है। ये संगठन अब प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय 'लोन वुल्फ' हमलों और छोटे-छोटे स्लीपर सेल्स के माध्यम से हिंसा फैलाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इनके द्वारा सोशल मीडिया, डार्क वेब और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स का उपयोग प्रोपेगैंडा फैलाने, युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और भर्ती करने के लिए किया जा रहा है, जो सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक अभूतपूर्व चुनौती है।

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'प्रहार' नीति की रोकथाम रणनीति का हृदय इंटेलिजेंस ब्यूरो के तहत संचालित होने वाला 'मल्टी-एजेंसी सेंटर' और 'जॉइंट टास्क फोर्स ऑन इंटेलिजेंस' है। सरकार ने इन मंचों को रीयल-टाइम इंटेलिजेंस साझा करने के लिए एक अनिवार्य नोडल प्लेटफॉर्म बना दिया है, जिससे विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के बीच सूचनाओं की दीवारें गिर गई हैं। अब जानकारी का प्रवाह इतना तेज और सटीक है कि संदिग्ध गतिविधियों को अंजाम देने से पहले ही उन्हें निष्क्रिय किया जा सकता है।

आतंकवाद की आर्थिक रीढ़ पर प्रहार करने के लिए इस नीति में क्रिप्टो-वॉलेट और हवाला नेटवर्क के विरुद्ध कठोर दंडात्मक प्रावधान किए गए हैं। नीति मानती है कि यदि आतंकी फंडिंग के स्रोतों को सुखा दिया जाए, तो उनके ऑपरेशंस अपने आप ठप पड़ जाएंगे। इसके अलावा, देश के महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे पावर ग्रिड, रेलवे, एविएशन, और न्यूक्लियर इंस्टॉलेशन की सुरक्षा के लिए अत्याधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करने का निर्देश दिया गया है। सीमा सुरक्षा को केवल बाड़ लगाने तक सीमित न रखकर उसे सेंसर आधारित 'स्मार्ट फेंसिंग' और सैटेलाइट निगरानी से सुसज्जित किया जा रहा है ताकि घुसपैठ की हर कोशिश को विफल किया जा सके।

प्रतिक्रिया तंत्र के मामले में 'प्रहार' नीति एक स्पष्ट श्रेणीबद्ध ढांचा प्रदान करती है। इसमें स्थानीय पुलिस की भूमिका को 'प्रथम उत्तरदाता' के रूप में अत्यधिक महत्व दिया गया है। नीति का मानना है कि हमले के शुरुआती मिनट सबसे महत्वपूर्ण होते हैं, इसलिए स्थानीय पुलिस को इतना सशक्त और प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि वे विशिष्ट बलों के आने तक स्थिति को नियंत्रित कर सकें। राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड को गृह मंत्रालय के अधीन नोडल काउंटर-टेररिज्म फोर्स के रूप में और अधिक शक्तियां दी गई हैं, ताकि वह न केवल ऑपरेशंस का नेतृत्व करे, बल्कि राज्यों की आतंकवाद-विरोधी इकाइयों को भी वैश्विक स्तर का प्रशिक्षण और उपकरण प्रदान करे।

राष्ट्रीय जांच एजेंसी को जांच के क्षेत्र में व्यापक स्वायत्तता दी गई है ताकि आतंकी मामलों का समयबद्ध और प्रभावी निपटारा हो सके। यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि 'प्रहार' नीति सुरक्षा और मानवाधिकारों के बीच एक सूक्ष्म संतुलन बनाए रखने पर भी जोर देती है। गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम जैसे कठोर कानूनों का उपयोग करते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि न्याय प्रक्रिया पारदर्शी हो और किसी निर्दोष को प्रताड़ित न किया जाए।

क्षमता निर्माण 'प्रहार' का वह स्तंभ है जो इसे भविष्योन्मुखी बनाता है। सुरक्षा बलों को केवल आधुनिक हथियार देना ही पर्याप्त नहीं है; उन्हें उन नई विधाओं में भी पारंगत किया जा रहा है जो भविष्य के युद्धों का हिस्सा होंगी। इसमें रासायनिक, जैविक, रेडियोधर्मी, परमाणु और उन्नत विस्फोटक जैसे खतरों से निपटने के लिए विशेष ड्रिल और तकनीक का प्रशिक्षण शामिल है। सुरक्षा संस्थानों के बुनियादी ढांचे और फैकल्टी को अपग्रेड किया जा रहा है ताकि हमारी एजेंसियां दुनिया की बेहतरीन काउंटर-टेररिज्म यूनिट्स के समकक्ष खड़ी हो सकें। इसके साथ ही, डी-रेडिकलाइजेशन (कट्टरपंथ मुक्ति) को इस नीति का एक अनिवार्य अंग बनाया गया है।

सरकार ने स्वीकार किया है कि आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध केवल बंदूकों से नहीं जीता जा सकता, बल्कि विचारधारा के धरातल पर भी लड़ना होगा। इसके लिए समुदायों, धार्मिक नेताओं, उदारवादी प्रचारकों और गैर-सरकारी संगठनों को साथ लिया जा रहा है। इसका उद्देश्य उन युवाओं की पहचान करना है जो कट्टरपंथ की राह पर भटक रहे हैं और उन्हें रचनात्मक गतिविधियों, रोजगार और सामाजिक मुख्यधारा से जोड़ना है। जेलों के भीतर कट्टरपंथ को रोकने के लिए जेल प्रशासन को विशेष निर्देश दिए गए हैं कि कट्टरपंथी अपराधियों को सामान्य कैदियों से अलग रखा जाए ताकि वे जेल को भर्ती केंद्र न बना सकें।

अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर 'प्रहार' नीति भारत के नेतृत्वकारी दृष्टिकोण को प्रदर्शित करती है। यह वैश्विक समुदाय के साथ मिलकर 'नो मनी फॉर टेरर' जैसे सिद्धांतों को आगे बढ़ाती है। पारस्परिक कानूनी सहायता संधियों और प्रत्यर्पण संधियों के माध्यम से भारत विदेशी धरती पर छिपे आतंकियों को कानून के कटघरे में लाने के लिए प्रतिबद्ध है। संयुक्त राष्ट्र में आतंकी समूहों और उनके आकाओं को प्रतिबंधित करने के प्रयासों में तेजी लाना इस नीति का एक प्रमुख कूटनीतिक लक्ष्य है। भारत अब केवल एक शिकायतकर्ता राष्ट्र नहीं रहा, बल्कि एक ऐसा देश बन गया है जो आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक मानदंडों को निर्धारित करने की क्षमता रखता है। नीति में स्पष्ट किया गया है कि आतंकवाद एक वैश्विक खतरा है और इसका मुकाबला केवल वैश्विक सहयोग से ही संभव है।

निष्कर्षतः, 'प्रहार' नीति भारत की सुरक्षा वास्तुकला में एक निर्णायक मोड़ है। यह नीति एक ऐसे भारत का चित्र प्रस्तुत करती है जो अपनी संप्रभुता के प्रति जागरूक है और अपनी सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। गृह मंत्री अमित शाह के दूरदर्शी नेतृत्व में तैयार किया गया यह दस्तावेज न केवल मौजूदा चुनौतियों का समाधान करता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक भयमुक्त वातावरण सुनिश्चित करने का वादा भी करता है।

'प्रहार' का सफल क्रियान्वयन केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय, संसाधनों के उचित आवंटन और बदलती तकनीक के साथ निरंतर अनुकूलन पर निर्भर करेगा। यह नीति आतंकवादियों और उनके संरक्षकों को एक कड़ा और स्पष्ट संदेश देती है कि भारत अब खामोश नहीं रहेगा; वह अपनी सुरक्षा के लिए हर उस जड़ पर प्रहार करेगा जहाँ से हिंसा का अंकुर फूटता है। यह वास्तव में सुरक्षित और विकसित भारत की दिशा में बढ़ाया गया एक क्रांतिकारी कदम है, जो देश के प्रत्येक नागरिक में अटूट विश्वास और सुरक्षा की भावना जागृत करता है।

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