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फेक फैक्ट्री पर बुलडोज़र: भारत का टेक स्ट्राइक, एआई युग में भरोसे की रक्षा: भारत का नया डिजिटल कवच
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
इन नए नियमों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू एआई-जनरेटेड सामग्री पर विशेष ध्यान देना है। अब सभी कृत्रिम रूप से तैयार किए गए ऑडियो, वीडियो और चित्रों को स्पष्ट रूप से लेबल करना अनिवार्य होगा। प्लेटफॉर्म्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि उपयोगकर्ता यह घोषणा करें कि उनकी सामग्री एआई से बनी है या नहीं। साथ ही, जहां संभव हो, स्थायी मेटाडेटा को एम्बेड करना होगा, ताकि मूल स्रोत का पता लगाया जा सके। यह व्यवस्था डीपफेक और फर्जी वीडियो के बढ़ते खतरे पर रोक लगाने में अत्यंत सहायक सिद्ध होगी। इससे महिलाओं, सार्वजनिक हस्तियों और आम नागरिकों की गरिमा सुरक्षित होगी और समाज में विश्वास का वातावरण बनेगा।
तीन घंटे की समयसीमा पहली नजर में सोशल मीडिया कंपनियों के लिए कठिन लग सकती है, लेकिन वास्तव में यह एक सकारात्मक और रचनात्मक दबाव है। मेटा, यूट्यूब और एक्स जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स अब अपनी तकनीकी क्षमताओं को और अधिक मजबूत करेंगे। एआई आधारित मॉडरेशन सिस्टम, ऑटोमेटेड डिटेक्शन टूल्स और रियल-टाइम मॉनिटरिंग तकनीकों का तेजी से विकास होगा। भारत का विशाल डिजिटल बाजार कंपनियों को मजबूर करेगा कि वे बेहतर और अधिक जिम्मेदार प्रणालियां विकसित करें। इससे न केवल भारत में, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी डिजिटल सुरक्षा के मानक ऊंचे होंगे। यह नियम कंपनियों को नवाचार के लिए प्रेरित करता है, न कि उन्हें सीमित करता है।
इस नीति का सबसे बड़ा लाभ महिलाओं, बच्चों और कमजोर वर्गों को मिलेगा। गैर-सहमति वाली अंतरंग तस्वीरों और वीडियो के मामलों में अब केवल दो घंटे की समयसीमा तय की गई है, जो पीड़ितों को त्वरित राहत प्रदान करेगी। पहले ऐसी सामग्री घंटों या दिनों तक वायरल हो जाती थी, जिससे मानसिक और सामाजिक नुकसान होता था। अब हटाने की प्रक्रिया इतनी तेज होगी कि नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकेगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह नियम राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री पर विशेष ध्यान देता है। इससे डिजिटल हिंसा में कमी आएगी और समाज में सुरक्षा की भावना मजबूत होगी।
नियमों की मजबूती को और बढ़ाने के लिए सरकार ने प्लेटफॉर्म्स पर अनुपालन की जिम्मेदारी को और सख्त किया है। यदि कोई इंटरमीडियरी इन निर्देशों का पालन नहीं करता, तो उसे सुरक्षित हार्बर संरक्षण खोने का खतरा होगा, जो कंपनियों को और अधिक जिम्मेदार बनाएगा। साथ ही, उपयोगकर्ता शिकायतों के निवारण को और मजबूत किया गया है, जिससे पीड़ितों को तेज न्याय मिलेगा। प्लेटफॉर्म्स को अब हर तिमाही उपयोगकर्ताओं को एआई दुरुपयोग के खतरों पर स्पष्ट चेतावनी जारी करनी होगी, ताकि लोग स्वयं सतर्क रहें। ये प्रावधान डिजिटल पारिस्थितिकी को अधिक जवाबदेह और सक्रिय बनाते हैं, जहां सुरक्षा केवल नियमों से नहीं, बल्कि सामूहिक जागरूकता से भी मजबूत होगी।
एआई कंटेंट पर लेबलिंग और ट्रेसेबिलिटी का प्रावधान भारत के डिजिटल इतिहास में एक मील का पत्थर है। अब फर्जी वीडियो और झूठी खबरों की पहचान करना पहले से कहीं अधिक आसान होगा। मेटाडेटा को हटाना या बदलना अपराध की श्रेणी में आएगा, जिससे अपराधियों के लिए छिपना कठिन हो जाएगा। यह व्यवस्था लोकतंत्र की रक्षा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, क्योंकि चुनावी समय में गलत सूचनाएं सबसे बड़ा खतरा बन जाती हैं। भारत अब जिम्मेदार एआई गवर्नेंस का एक आदर्श मॉडल प्रस्तुत कर रहा है, जहां नवाचार और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखा गया है।
इन नियमों के लागू होने से प्लेटफॉर्म्स का अनुपालन स्तर बढ़ेगा और उपयोगकर्ताओं का अनुभव अधिक सुरक्षित बनेगा। अब लोग बिना भय के अपनी बात साझा कर सकेंगे, क्योंकि उन्हें भरोसा होगा कि हानिकारक सामग्री पर तुरंत कार्रवाई होगी। शिकायत निवारण तंत्र को भी मजबूत किया गया है, जिससे उपयोगकर्ताओं को तेजी से न्याय मिलेगा। पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ने से डिजिटल इकोसिस्टम अधिक विश्वसनीय बनेगा। भारत का इंटरनेट अब केवल विशाल ही नहीं, बल्कि सुरक्षित और भरोसेमंद भी होगा, जो डिजिटल विकास के लिए एक मजबूत आधार तैयार करेगा।
दीर्घकालिक दृष्टि से यह नियम डिजिटल साक्षरता और जागरूकता को भी बढ़ावा देगा। लोग एआई से बनी सामग्री को पहचानना सीखेंगे और फर्जी खबरों के प्रति अधिक सतर्क होंगे। सरकार, शैक्षणिक संस्थान और तकनीकी कंपनियां मिलकर जागरूकता अभियान चलाएंगी। इससे समाज में डिजिटल जिम्मेदारी की भावना विकसित होगी। सुरक्षित और नियंत्रित वातावरण के कारण विदेशी और घरेलू निवेश में भी वृद्धि होगी, क्योंकि नवाचार के लिए स्थिरता आवश्यक होती है। यह नीति भारत को एक वैश्विक डिजिटल लीडर के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
हालांकि कुछ आलोचक इसे कठोर और अव्यावहारिक मानते हैं, परंतु डिजिटल युग की तीव्र गति को देखते हुए यह समयसीमा आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है। आज कोई भी सूचना कुछ ही पलों में करोड़ों लोगों तक पहुंच जाती है, जिससे उसके प्रभाव भी उतने ही व्यापक और गहरे होते हैं। ऐसे में केवल त्वरित और निर्णायक कार्रवाई ही वास्तविक सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है। सरकार ने संतुलन साधने का प्रयास किया है, ताकि न तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनावश्यक अंकुश लगे और न ही लापरवाही को बढ़ावा मिले। भारत का तीन घंटे का अल्टीमेटम यह स्पष्ट संदेश देता है कि डिजिटल स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही अनिवार्य है। निस्संदेह, यह कदम हमें एक सुरक्षित, पारदर्शी और सशक्त डिजिटल भविष्य की दिशा में अग्रसर करेगा।

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