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सुप्रीम कोर्ट कहे, शहर सुन न पाए: ध्वनि का अन्याय
स्वप्नों पर हमला: तेज़ ध्वनि और शिक्षा का टकराव,शोर के पीछे छुपा अन्याय: नींद, स्वास्थ्य और भविष्य
कृति आरके जैन
ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 स्पष्ट रूप से कहते हैं कि रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक किसी भी लाउडस्पीकर, म्यूजिक सिस्टम या सार्वजनिक ध्वनि उपकरण का उपयोग बिना अनुमति प्रतिबंधित है। आवासीय क्षेत्रों में रात के समय ध्वनि स्तर 45 डेसिबल से अधिक नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने ‘इन रे: नॉइज पॉल्यूशन’ (2005) में स्पष्ट किया कि यह केवल कानूनी नियम नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का जीवन का अधिकार है। मध्यप्रदेश सरकार ने भी परीक्षा काल में विशेष सख्ती का आदेश जारी किया है, ताकि छात्रों की पढ़ाई बाधित न हो और उनका भविष्य सुरक्षित रहे।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, रात के समय आवासीय क्षेत्रों में ध्वनि स्तर 45 डेसिबल और व्यावसायिक क्षेत्रों में 55 डेसिबल से अधिक नहीं होना चाहिए। एमपी सरकार के आदेश में स्पष्ट लिखा गया है कि परीक्षा काल के दौरान रात 10 बजे के बाद किसी भी प्रकार का लाउडस्पीकर, म्यूजिक सिस्टम या डीजे नहीं चलाया जाएगा। इसके बावजूद, हर मैरिज गार्डन और कई मोहल्लों/कालोनियों में लगातार तेज़ ध्वनि सुनाई देती है। इस अत्यधिक शोर के कारण बच्चों की मानसिक एकाग्रता टूटती है, उनकी नींद बाधित होती है, और स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
शिकायत करने पर अक्सर जवाब मिलता है—“लिखित शिकायत लाओ।” क्या केवल शिकायत न होने से उल्लंघन वैध हो जाता है? कई बार पुलिस, प्रशासन और स्थानीय नेता इन कार्यक्रमों में उपस्थित रहते हैं। मंच से शिक्षा और अनुशासन की बातें करते हैं, लेकिन डांस फ्लोर पर थिरकते हैं। यह कोई दोहरा मापदंड नहीं, बल्कि स्पष्ट पाखंड है। प्रभावशाली लोगों के लिए छूट, आम जनता के लिए सख्ती—यह समाज में बढ़ते असंतुलन और असंवेदनशीलता का प्रतीक है।
शिकायत न करने का कारण डर और सामाजिक दबाव है। पड़ोसी की शादी हो या कोई बड़ा कार्यक्रम, मन में बार-बार यह ख्याल आता है—“मैं भी इससे नहीं बच पाऊँगा।” स्थानीय नेताओं या पुलिस की मिलीभगत का डर भी है। मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि कई बार पुलिस सुरक्षा में मौजूद रहती है, लेकिन डेसिबल मीटर नहीं लगाया जाता। ऑनलाइन शिकायत पोर्टल हैं, लेकिन कार्रवाई दुर्लभ है। परिणामस्वरूप छात्रों की एकाग्रता टूटती है, नींद छिन जाती है, और तनाव बढ़ता है। यह केवल शैक्षणिक नुकसान नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर गहरा आघात है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन का स्पष्ट कहना है कि लगातार ध्वनि प्रदूषण नींद की कमी का सबसे बड़ा कारण है। इससे न केवल मानसिक तनाव और अवसाद बढ़ता है, बल्कि हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं। भारत में शिक्षा किसी प्रतियोगिता की तरह है, और एक रात की खराब नींद साल भर की मेहनत पर पानी फेर सकती है। अत्यधिक शोर से बीमार लोग—हृदय रोगी, कैंसर पीड़ित, गर्भवती महिलाएं—गंभीर रूप से प्रभावित होते हैं। वृद्ध माता-पिता, जिनकी सुनने की क्षमता पहले से कम है, उनकी शांति भी छीनी जाती है। यह केवल व्यक्तिगत परेशानी नहीं, बल्कि पूरे समाज के प्रति अन्याय है।
उत्सव मनाना हर किसी का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार दूसरों की पीड़ा के ऊपर कभी हावी नहीं होना चाहिए। क्या सचमुच शादी या धार्मिक आयोजन बिना तेज़ म्यूजिक के संभव नहीं हैं? क्या ये आनंद शांतिपूर्ण ढंग से नहीं मनाए जा सकते? पश्चिमी देशों में रात 10 बजे के बाद शोर पर सख्त नियंत्रण होता है, और उल्लंघन करने वालों पर तुरंत कार्रवाई होती है। वहीं भारत में ‘चलता है’ की मानसिकता ने नियमों को खोखला कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट और मध्य प्रदेश सरकार दोनों स्पष्ट कर चुके हैं—ध्वनि प्रदूषण के नियम सभी पर समान रूप से लागू होंगे, और परीक्षा के समय किसी को भी छूट नहीं दी जाएगी।
आज अगर हम मौन रहेंगे, तो कल हमारे बच्चे हमसे प्रश्न करेंगे—“हमारे सपनों को पूरा करने का अवसर क्यों छीन लिया गया?” रात की चुप्पी कोई विलासिता नहीं, बल्कि सुरक्षा, अधिकार और उज्जवल भविष्य की आधारशिला है। परीक्षा के कठिन दिनों में इसे बनाए रखना हम सबकी साझा जिम्मेदारी है। नियम केवल कागज़ों तक सीमित नहीं होने चाहिए; उन्हें सड़कों, गलियों और मोहल्लों में भी लागू होना चाहिए। आवाज़ उठाएँ—शांतिपूर्ण रातों के लिए, बच्चों के उज्ज्वल और संवारते भविष्य के लिए। क्योंकि शिक्षा तभी फलती-फूलती है जब उसके साथ शांति और सुरक्षा का साथ हो।

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