राजनीति
कृषि से समृद्धि की राह पर बिहार दुग्ध उत्पादन में नई क्रांति का निश्चय
बिहार में विधानसभा चुनाव के बाद सरकार ने जिस तेज़ी और स्पष्टता के साथ काम शुरू किया है, उसने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले वर्षों में राज्य विकास की नई ऊंचाइयों को छूने वाला है। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, उद्योग और सामाजिक कल्याण के साथ-साथ अब कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों पर सरकार का विशेष फोकस साफ़ दिखाई दे रहा है। इसी क्रम में सात निश्चय-3 के तीसरे निश्चय कृषि में प्रगति, प्रदेश में समृद्धि के तहत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा राज्य के प्रत्येक गांव में दुग्ध उत्पादन समिति के गठन का निर्णय एक दूरगामी और ऐतिहासिक पहल के रूप में देखा जा रहा है। यह फैसला न केवल पशुपालकों की आमदनी बढ़ाने वाला है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने की दिशा में एक मजबूत आधार भी तैयार करता है।
बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है, जहां आबादी का बड़ा हिस्सा खेती और पशुपालन पर निर्भर है। दुग्ध उत्पादन यहां लंबे समय से ग्रामीण आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है, लेकिन संगठित ढांचे की कमी, बाजार तक सीमित पहुंच और उचित मूल्य न मिलने के कारण पशुपालक अपनी पूरी क्षमता का लाभ नहीं उठा पाते थे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस वास्तविकता को समझते हुए डेयरी क्षेत्र को संगठित करने का जो संकल्प लिया है, वह उनकी दूरदर्शी सोच का प्रमाण है। सात निश्चय-2 के तहत सभी प्रखंडों में सुधा दुग्ध बिक्री केंद्रों की स्थापना और अब सात निश्चय-3 के तहत पंचायतों और गांवों तक इस व्यवस्था का विस्तार, इस बात को दर्शाता है कि सरकार योजनाओं को केवल घोषणा तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उन्हें ज़मीन पर उतारने के लिए निरंतर प्रयास करती है।
वर्तमान समय में बिहार की दुग्ध उत्पादन स्थिति पर नज़र डालें तो राज्य देश के प्रमुख दुग्ध उत्पादक राज्यों में अपनी पहचान बना चुका है। राष्ट्रीय स्तर पर बिहार का दुग्ध उत्पादन लगातार बढ़ रहा है और यह वृद्धि मुख्यतः छोटे और सीमांत पशुपालकों के परिश्रम का परिणाम है। इसके बावजूद, उत्पादन की तुलना में प्रसंस्करण और विपणन की व्यवस्था उतनी सशक्त नहीं थी, जितनी होनी चाहिए थी। इसी कमी को दूर करने के लिए हर गांव में दुग्ध उत्पादन समिति के गठन का निर्णय बेहद महत्वपूर्ण है। इससे दूध संग्रहण, गुणवत्ता नियंत्रण और उचित मूल्य निर्धारण की व्यवस्था मजबूत होगी और पशुपालकों को सीधे लाभ मिलेगा।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह स्पष्ट किया है कि राज्य के 39,073 गांवों में से 25,593 गांवों में दुग्ध उत्पादन समितियों का गठन पहले ही किया जा चुका है और शेष गांवों में अगले दो वर्षों के भीतर यह कार्य पूरा कर लिया जाएगा। यह आंकड़ा बताता है कि सरकार केवल लक्ष्य निर्धारित नहीं कर रही, बल्कि उन्हें समयबद्ध तरीके से पूरा करने की दिशा में गंभीर है। पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग को दिए गए स्पष्ट निर्देश इस बात का प्रमाण हैं कि प्रशासनिक स्तर पर भी इस योजना को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है।
सुधा दुग्ध बिक्री केंद्रों के विस्तार का निर्णय भी उतना ही महत्वपूर्ण है। राज्य की 8053 पंचायतों में से फिलहाल 100 पंचायतों में ये केंद्र स्थापित हो चुके हैं और शेष 7953 पंचायतों में वित्तीय वर्ष 2026-27 के अंत तक इन्हें खोलने का लक्ष्य रखा गया है। खास बात यह है कि इन केंद्रों को प्राथमिकता के आधार पर मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना से जुड़ी जीविका दीदियों को आवंटित करने का निर्देश दिया गया है। यह पहल महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम है। महिलाएं अब केवल स्वयं सहायता समूहों तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि डेयरी जैसे व्यावसायिक क्षेत्र में भी निर्णायक भूमिका निभाएंगी।
नीतीश कुमार की प्रशंसा इसलिए भी की जानी चाहिए कि उन्होंने हमेशा विकास को समावेशी दृष्टिकोण से देखा है। उनके नेतृत्व में बनी नई कैबिनेट ने भी कार्यभार संभालते ही जिस सक्रियता और समन्वय का परिचय दिया है, वह काबिले-तारीफ है। नए कैबिनेट मंत्री अपने-अपने विभागों में तेजी से फैसले ले रहे हैं और योजनाओं के क्रियान्वयन पर सख्त निगरानी रख रहे हैं। कृषि, पशुपालन और ग्रामीण विकास जैसे विभागों में जिस गति से काम हो रहा है, उसने यह भरोसा पैदा किया है कि बिहार अब केवल संभावनाओं का राज्य नहीं, बल्कि उपलब्धियों का राज्य बनने की ओर अग्रसर है।
दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में यह नई पहल राज्य की अर्थव्यवस्था को बहुआयामी लाभ पहुंचाएगी। एक ओर पशुपालकों की आय बढ़ेगी, तो दूसरी ओर गांवों में ही रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। दूध संग्रहण, परिवहन, प्रसंस्करण और विपणन से जुड़े कामों में स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा, जिससे पलायन की समस्या पर भी अंकुश लगेगा। साथ ही, राज्य में दूध और दुग्ध उत्पादों की उपलब्धता बढ़ने से पोषण स्तर में सुधार होगा, जिसका सकारात्मक प्रभाव स्वास्थ्य पर भी पड़ेगा।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती किसी भी राज्य की समग्र प्रगति का आधार होती है। नीतीश कुमार की सरकार यह भली-भांति समझती है कि जब तक गांव मजबूत नहीं होंगे, तब तक राज्य और देश की अर्थव्यवस्था भी मजबूत नहीं हो सकती। इसलिए कृषि और पशुपालन को विकास की धुरी बनाकर योजनाएं बनाई जा रही हैं। दुग्ध उत्पादन समितियों का गठन केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह गांव के स्तर पर सहकारिता और सामूहिक प्रयास की भावना को भी मजबूत करेगा।
आज जब देश में आत्मनिर्भर भारत की बात हो रही है, तब बिहार की यह पहल आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दिशा में एक ठोस कदम है। चुनाव के बाद जिस तेजी से सरकार ने काम शुरू किया है, उससे यह स्पष्ट है कि विकास अब रुकने वाला नहीं है। हर क्षेत्र में हो रहे कार्यों के बीच डेयरी उद्योग को दिया गया यह प्रोत्साहन आने वाले वर्षों में बिहार को दुग्ध उत्पादन के मानचित्र पर और अधिक मजबूत स्थिति में खड़ा करेगा।
अंततः कहा जा सकता है कि सात निश्चय-3 के तहत लिया गया यह निर्णय बिहार के भविष्य को नई दिशा देने वाला है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का अनुभव, उनकी प्रतिबद्धता और नई कैबिनेट मंत्रियों की सक्रियता मिलकर राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने का जो कार्य कर रही है, वह प्रशंसा के योग्य है। कृषि में प्रगति के माध्यम से प्रदेश में समृद्धि लाने का यह संकल्प अगर इसी गति से आगे बढ़ता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब बिहार विकास और समृद्धि का एक नया उदाहरण बनकर देश के सामने खड़ा होगा।
कांतिलाल मांडोत

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