तेल के इर्द-गिर्द घूमता वैश्विक जगत

तेल, राजनीति का नया उपकरण

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विश्व की राजनीति का पूरा का पूरा चक्र आज  प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से तेल और ऊर्जा संसाधनों के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई दे रहा है। जहाँ किसी देश का लोकतंत्र, मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय नियम कानून केवल कागज में दिखाई देने लगे हैं। अमेरिका के चलते जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ कर रही है। तेल और ऊर्जा संसाधन अब  वास्तविक प्रेरक शक्ति,भू-राजनीतिक हित तथा ऊर्जा सुरक्षा बन गई है।

अमेरिका द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में सैन्य तथा कूटनीतिक हस्तक्षेप को जब तेल भंडारों, आपूर्ति मार्गों और रणनीतिक नियंत्रण के संदर्भ में जोड़ा जाता है तब यह स्पष्ट  है कि ऊर्जा संसाधनों पर प्रभुत्व वैश्विक नेतृत्व का केंद्रीय उपकरण बन गया  है, यही कारण है कि रूस से तेल खरीदने के प्रश्न पर भारत जैसे संप्रभु देश पर दबाव, प्रतिबंधों की धमकी और नैतिक उपदेशों की बौछार देखने को मिली, जबकि वही देश अपने हित में नियमों की व्याख्या बदलने से नहीं हिचकते; मध्य-पूर्व लंबे समय से इस राजनीति का केंद्र रहा है जहाँ तेल के साथ-साथ अब परमाणु ऊर्जा भी शक्ति संतुलन का निर्णायक कारण बन चुकी है।

ईरान द्वारा परमाणु संधियों को लेकर अपनाया गया सतर्क या असहमति वाले रुख ने उसे वैश्विक दबावों के केंद्र बना दिया है और संभावित टकराव की आशंकाएँ इसी भय से उपज की परिणति हैं कि कहीं ऊर्जा और परमाणु क्षमता का संतुलन एकतरफा न हो जाए। यूरोप से एशिया तक बड़े देश तेल आयात-निर्यात, पाइपलाइन, समुद्री मार्गों और परमाणु ईंधन की आपूर्ति को लेकर जिस तरह से खेमे में लंम्बन्ध हो रहे हैं, उससे यह प्रतीत होता है कि वैश्वीकरण के युग में भी संसाधनों की राजनीति पहले से अधिक क्लिष्ट हो गई है।

ऊर्जा आत्मनिर्भरता अब केवल आर्थिक लक्ष्य नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बन चुकी है । यही कारण है कि विश्व की अधिकांश नीतियाँ नैतिकता से अधिक बैरल, रिएक्टर और आपूर्ति श्रृंखलाओं की भाषा में लिखी जा रही जहाँ युद्ध की आहट भी अक्सर शांति के नारों के बीच सुनाई देती है। वैश्विक राजनीति और व्यापार का आधुनिक ताना-बाना भारत, चीन, रूस, ईरान और खाड़ी देशों के ऊर्जा-केंद्रित संबंधों से और अधिक स्पष्ट हो जाता है, जहाँ तेल, गैस और परमाणु ईंधन केवल वस्तुएँ नहीं बल्कि रणनीतिक शक्ति के उपकरण बन चुके हैं।

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हालिया वर्षों के व्यापारिक रुझान बताते हैं कि भारत ने अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए रूस से कच्चे तेल का आयात बढ़ाया, जिससे उसे अपेक्षाकृत सस्ती ऊर्जा मिली और घरेलू अर्थव्यवस्था को संबल मिला, जबकि यही कदम पश्चिमी देशों को असहज करता रहा, दूसरी ओर चीन ने रूस और ईरान दोनों के साथ दीर्घकालिक ऊर्जा और अवसंरचना समझौतों के माध्यम से अपने उद्योग और आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित किया है। जिससे वह वैश्विक विनिर्माण में अपनी बढ़त बनाए रख सके, रूस जो प्रतिबंधों के बीच नए बाज़ार तलाश रहा है, एशिया विशेषकर भारत और चीन को ऊर्जा निर्यात कर अपने व्यापार संतुलन को संभाल रहा है।

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वहीं ईरान अपने तेल, गैस और परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को राष्ट्रीय संप्रभुता से जोड़कर और खाड़ी देशों के साथ प्रतिस्पर्धा तथा सहयोग—दोनों के बीच संतुलन साधे हुए है। खाड़ी देश, जिनकी पूरी अर्थव्यवस्थाएँ ही तेल-गैस निर्यात पर टिकी हैं, अब व्यापार विविधीकरण, पेट्रोकेमिकल्स, हरित ऊर्जा और एशिया-केंद्रित बाज़ारों की ओर तेज़ी से बढ़ रहे हैं जहाँ भारत और चीन उनके सबसे बड़े ग्राहक बनते जा रहे हैं।

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इन नए व्यापारिक आंकड़ों और प्रवृत्तियों से यह स्पष्ट होता है कि वैश्विक व्यवसाय अब केवल मुक्त बाज़ार का खेल नहीं रहा बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, मुद्रा लेन-देन, समुद्री मार्गों और राजनीतिक गठबंधनों से गहराई से जुड़ चुका है, और इसी कारण विश्व की बड़ी शक्तियाँ व्यापार समझौतों को रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही हैं। जहाँ तेल और परमाणु ऊर्जा आने वाले दशकों की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों की दिशा तय करते दिखाई दे रहे हैं।

संजीव ठाकुर

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