बजट से बेदखल किसान: दिल में तो कभी था ही नहीं, अब ज़ुबान से भी हुआ गायब

देश की आधी से ज़्यादा आबादी खेती-किसानी पर निर्भर है, लेकिन बजट में किसान का हिस्सा लगातार सिमटता जा रहा है। साल 2019–20 में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्र का हिस्सा कुल बजट का 5.44 प्रतिशत था

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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहा करते थे कि असली भारत गांवों में बसता है।  उसी भारत के लोग—किसान—हर साल बजट के दिन इस उम्मीद में रहते हैं कि शायद इस बार सरकार उनकी सुध लेगी। लेकिन इस बार का बजट देखकर यह कहने में कोई हिचक नहीं कि सरकार को किसान फूटी आंख नहीं सुहाता।
 
पहले कम से कम किसान के नाम पर बजट में दिखावा तो किया जाता था—बड़ी-बड़ी बातें, भारी-भरकम योजनाएं होती थीं। लेकिन इस बार तो वह दिखावा भी छोड़ दिया गया। अगर कोई किसान नारियल, काजू, सैंडलवुड या कोको नहीं उगाता, तो इस बजट में उसके लिए सिवाय सपने बेचने के कुछ नहीं है। हालत यह रही कि वित्त मंत्री के कृषि बजट भाषण में ‘किसान’ शब्द तक का ज़िक्र नहीं हुआ। अगर हुआ भी तो वो भी दिव्यांग जनों, फिजिकली और मेंटली चैलेंज और नार्थ ईस्ट के साथ।  
 
देश की आधी से ज़्यादा आबादी खेती-किसानी पर निर्भर है, लेकिन बजट में किसान का हिस्सा लगातार सिमटता जा रहा है। साल 2019–20 में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्र का हिस्सा कुल बजट का 5.44 प्रतिशत था, जो घटते-घटते 2026–27 में सिर्फ़ 3.04 प्रतिशत रह गया है। मतलब साफ़ है सरकार का कुल बजट बढ़ रहा है, लेकिन किसान के हिस्से का पैसा काटा जा रहा है। 

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      कृषि+ सेक्टर के लिए वर्षवार घटता आवंटन।
 
बजट का बारीकी से विश्लेषण करने पर साफ़ होता है कि ऐसी कई योजनाएं हैं, जिन्हें पिछले साल बड़े शोर-शराबे के साथ शुरू किया गया, लेकिन ज़मीन पर उनका कोई अता-पता नहीं है। यहां हम केवल कृषि और उससे जुड़े क्षेत्र के बजट पर ही ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
 
सरकार ने आर्थिक विकास के लिए जिन छह बड़े क्षेत्रों में हस्तक्षेप तय किए हैं, उनमें खेती का नाम तक शामिल नहीं है। यह तब है, जब सरकारी आंकड़े (PLFS) खुद बताते हैं कि शहरों से मज़दूर फिर से गांव और खेती की ओर लौट रहे हैं। यानी जिस सेक्टर पर रोजगार का दबाव बढ़ रहा है, वह नीति बजट की प्राथमिकताओं से बाहर है। 
 
फसल बीमा योजना: किसानों की सुरक्षा पर चली सरकारी कैंची
 
किसान की सुरक्षा की बात करें तो तस्वीर और भी चिंताजनक है। फसल बीमा योजना सूखा, बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं में किसान का आख़िरी सहारा मानी जाती है। 
 
साल 2024–25 में इस योजना पर सरकार ने ₹14,473 करोड़ खर्च किए, लेकिन 2025–26 के बजट में इसका प्रावधान घटाकर ₹12,242 करोड़ किया गया। हैरानी की बात यह है कि वास्तविक खर्च इस अनुमान से लगभग ₹25 करोड़ ज़्यादा रहा, फिर भी इस साल योजना का बजट बढ़ाने के बजाय सरकार ने पिछले साल के वास्तविक खर्च के मुक़ाबले इस बार ₹2,273 करोड़ की सीधी कटौती कर दी, जो लगभग 16 प्रतिशत है। साल 2026-27 के लिए फसल बीमा योजना का बजट ₹12,200 करोड़ रखा गया है।
 
जब मौसम का मिज़ाज लगातार बिगड़ रहा है, तब किसान की सुरक्षा में की गई यह कटौती साफ़ बताती है कि सरकार की प्राथमिकता सूची में किसान की सुरक्षा सबसे नीचले पायदान पर है। 
 
पीएम-किसान सम्मान निधि 
 
पीएम-किसान सम्मान निधि योजना में भी सरकार का रवैया साफ़ दिखता है। 2026-27 के लिए सरकार ने ₹63,500 करोड़ रखे हैं, जबकि 2024-25 में असल खर्च ₹66,121 करोड़ था। यानी असल खर्च से सीधे-सीधे ₹2,621 करोड़ कम। प्रतिशत में देखें तो यह लगभग 4% की कमी है। हैरानी की बात यह है कि पिछले 5 साल से किसान को मिलने वाली सालाना राशि ₹6,000 पर ही अटकी हुई है, जबकि इसी दौरान खाद, बीज, डीजल और मज़दूरी की लागत 30–40% तक बढ़ चुकी है। इस बार किसानों को उम्मीद थी कि यह राशि बढ़कर 10-12 हजार हो जानी चाहिए थी। 
 
क्रिसिल के अनुमान के मुताबिक 2026–27 में महंगाई दर करीब 5% तक पहुंच सकती है। अगर महंगाई दर को ध्यान में रखकर देखें तो पीएम-किसान की राशि की असली कीमत में लगभग ₹3,175 करोड़ की और कमी बैठती है। अगर योजना के लाभार्थियों की संख्या पहले जैसी (लगभग 11 करोड़) बनी रहती, तो यह फंड कम पड़ जाता। लेकिन सरकार ने बजट पर कैंची चलाने के साथ-साथ लाभार्थियों की संख्या पर भी खूब कटौती की है।
 
खाद सब्सिडी: ज़रूरत बढ़ी, पैसा घटा 
 
केंद्र सरकार किसानों को उर्वरक (खाद) पर दो तरह से सब्सिडी देती है। पहली, न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी (NBS), जिसके तहत फॉस्फेटिक और पोटाशिक खादों— जैसे DAP, MOP, NPKS आदि पर सहायता दी जाती है।
 
दूसरी, यूरिया पर दी जाने वाली सब्सिडी, जो डायरेक्ट तरीके से किसानों को मिलती है, लेकिन बजट 2026–27 का विश्लेषण बताता है कि सरकार ने दोनों ही तरह की खाद सब्सिडी में कटौती का रास्ता अपनाया है।
 
साल 2024–25 में एनबीएस सब्सिडी का वास्तविक खर्च 52,239 करोड़ रुपये रहा। वहीं अगले वर्ष इस सब्सिडी का आवंटन घटाकर 49,000 करोड़ कर दिया गया। 
 
हालांकि बाद में संशोधित अनुमान में यह रकम 11,000 करोड़ बढ़ाकर 60,000 करोड़ करनी पड़ी, करीब 22% बजट बढ़ाना पड़ा। लेकिन इस बार 2026–27 के बजट में फिर से यह आवंटन घटाकर 54,000 करोड़ कर दिया गया है, जो इस बार के संशोधित अनुमान से 6,000 करोड़ कम (लगभग 10% कटौती की गई ) है।  
 

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  जैसा कि बजट सर्वे 2025-26 भी सब्सिडी के घटते ट्रेंड को दर्शाता है। 
 
इसी तरह यूरिया सब्सिडी में भी पिछले साल के संशोधित अनुमान से करीब 9,670 करोड़ रुपये कम रखे गए हैं। 
 
वर्ष 2025–26 में सरकार ने यूरिया सब्सिडी के लिए शुरुआत में ₹1,18,900 करोड़ का प्रावधान किया था, लेकिन खाद की बढ़ती लागत और किसानों की ज़रूरत को देखते हुए यही राशि संशोधित अनुमान में बढ़ाकर ₹1,26,475 करोड़ करनी पड़ी। यानी 7,575 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि जोड़नी पड़ी।
 
 लेकिन इस बार के 2026-27 के बजट में सरकार ने उलटा रुख अपनाया है। पिछले साल के संशोधित अनुमान को आधार बनाने के बजाय आवंटन घटाकर 1,16,805 करोड़ रुपये कर दिया गया है। इससे 9,670 करोड़ रुपये की सीधी कटौती हुई है, जो लगभग 7.65 प्रतिशत की कमी है।
 
यह कटौती ऐसे समय में की गई है जब खुद सरकारी अनुमान के मुताबिक यूरिया की खपत 8% तक बढ़ सकती है, जैसा कि 2025–26 में देखा गया। ऐसे में आने वाले समय में फिर से संशोधित अनुमान में राशि बढ़ाने की नौबत आ सकती है।
 
अगर दोनों सब्सिडी को जोड़कर देखें, तो 2024–25 में कुल खाद सब्सिडी 1.91 लाख करोड़ थी, जो 2026–27 में घटकर करीब 1.71 लाख करोड़ रह गई। यानी लगभग 20,200 करोड़ रुपये—करीब 10.6 प्रतिशत की सीधी कटौती की गई।
 
इससे साफ है कि खाद सब्सिडी में भी सरकार पहले कम आकलन करती है और बाद में मजबूरी में बढ़ाती है—लेकिन स्थायी राहत देने से बचती है। यह यकायक ही नहीं हुआ इसके पीछे आप सरकार की मंशा देखेंगे तो इरादे स्पष्ट हो जाएंगे। उर्वरकों पर दी जाने वाली सरकारी सब्सिडी का खर्च लगातार बढ़ रहा है। जिसे सरकार इस सब्सिडी के बोझ को आपने माथे से कम करना चाहती है इसलिए वह एक पायलेट योजना के तहत इसकी परिपाटी तैयार करने में लगी है। 
 
कई योजनाओं के लिए खर्च नहीं हो पाया बजट 
 
कटौती की कहानी सिर्फ़ रकम घटाने तक सीमित नहीं है। बजट का एक और चेहरा वह है, जहां पैसा रखा तो गया, लेकिन ज़मीन पर खर्च ही नहीं हुआ। कृषि योजनाओं के लिए रखे गए कुल बजट में से ₹6,985 करोड़ रुपये, जो किसानों के नाम पर बजट में दिखाए गए, लेकिन साल भर में यह राशि खर्च नहीं हो पाई। यानी कागज़ों में योजना चली, खेतों तक नहीं पहुंची। 
 
इसकी सबसे बड़ी मिसाल है “ड्रोन दीदी” योजना, जिसे सरकार ने महिला रोज़गार और खेती के आधुनिकीकरण का बड़ा कदम बताया था। नाम इतना बड़ा रखा गया कि लगा अब खेतों में तकनीक पहुंचेगी और महिलाओं को रोज़गार मिलेगा। लेकिन हकीकत बिल्कुल उलटी निकली।
 
साल 2025–26 में इस योजना के लिए ₹676 करोड़ रुपये रखे गए, जबकि पूरे साल में सिर्फ़ ₹100 करोड़ ही खर्च हो पाए। मतलब करीब ₹576 करोड़ रुपये—यानी लगभग 85 प्रतिशत—राशि यूं ही पड़ी रह गई।
 
न ड्रोन खेतों तक पहुंचे, न महिलाओं को काम मिला, और न ही किसानों को कोई ठोस लाभ हुआ। इससे साफ़ दिखता है कि योजना का मक़सद ज़्यादा हेडलाइन बनाना था, ज़मीन पर बदलाव लाना नहीं।
 
यह पैटर्न दिखाता है कि योजना का उद्देश्य महिला सशक्तिकरण कम और हेडलाइन मैनेजमेंट ज़्यादा है। इसके बाद तस्वीर और साफ़ हो जाती है। सवाल सिर्फ़ एक योजना या एक मद का नहीं है, बल्कि पूरे किसान बजट के रवैये का है। जहां पैसा चाहिए, वहां कटौती; और जहां पैसा रखा गया, वहां खर्च करने की इच्छाशक्ति नहीं। “ड्रोन दीदी” जैसी योजनाओं में यह दिखता है कि पहले बड़े नाम और बड़े दावे किए जाते हैं, फिर ज़मीन पर काम ठप पड़ जाता है और अगला बजट बिना किसी जवाबदेही के फिर वही रकम दोहरा देता है।
 
यही तरीका आगे प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना जैसी योजनाओं में भी दिखता है, जहां किसान की बुढ़ापे की सुरक्षा की बात तो की जाती है, लेकिन बजट और अमल दोनों के क्रियान्वयन में फर्क साफ दिखाई देता है। 
 
साल 2025–26 में इस योजना के लिए ₹120 करोड़ का बजट रखा गया था, लेकिन संशोधित अनुमान में इसे घटाकर सिर्फ़ ₹50 करोड़ कर दिया गया। यानी सरकार खुद मान रही है कि ₹70 करोड़, लगभग 58 प्रतिशत पैसा खर्च ही नहीं हो पाया। साफ़ है कि योजना या तो किसानों तक पहुंची ही नहीं, या फिर इतनी उलझी रही कि किसान जुड़ ही नहीं पाए।
 
अगर किसान बड़ी संख्या में इस योजना से जुड़ते, अगर पंजीकरण कराना किसानों के लिए आसान होता और प्रशासन सक्रिय होता, तो पैसा कम नहीं बल्कि पूरा खर्च होता। इसलिए इस बार भी पिछली बार की तरह उतना ही आवंटन(₹120 करोड़) किया गया है। सरकार यह कहकर पल्ला झाड़ लेती है कि योजना स्वैच्छिक है, लेकिन पिछले पांच-छह सालों के आंकड़े बताते हैं कि किसानों की भागीदारी बेहद धीमी रही है।
 
 पिछले बजट के 6 बड़े ऐलान, बजट फाइल से गुम  
 
यही कहानी कई दूसरी कृषि योजनाओं की भी है। पिछले किसान बजट में खेती के नाम पर 6 बड़े ऐलान किए गए थे—दलहन मिशन के लिए ₹1,000 करोड़, सब्ज़ी मिशन के लिए ₹500 करोड़, मखाना बोर्ड के लिए ₹100 करोड़ और कॉटन टेक्नोलॉजी मिशन के लिए ₹500 करोड़। इसके अलावा प्रधानमंत्री धन-धान्य योजना और नेशनल मिशन ऑन हाइब्रिड सीड्स जैसी योजनाओं को किसानों के भविष्य का रास्ता बताया गया। खासकर प्रधानमंत्री धन-धान्य योजना के लिए तो यह कहा गया था कि छह साल तक हर साल ₹24,000 करोड़ दिए जाएंगे। लेकिन नए बजट में इन योजनाओं का नाम तक नहीं मिलता। यानी जिन योजनाओं को पिछले साल गाजे-बाजे के साथ पेश किया गया था, वे कागज़ों से बाहर ही नहीं निकल पाईं। 
 
यही है आज के किसान बजट की असली तस्वीर—हर साल नई योजनाओं के नाम गिनाए जाते हैं, बड़े आंकड़े उछाले जाते हैं, उम्मीदें बोई जाती हैं, बजट के दिन योजनाएं सुर्खियां बनकर रह जाती हैं और अगले साल बजट की नई मोटी फाइल में कहीं दफ़न हो जाती हैं। न कोई हिसाब, न कोई जवाब।
 
खेती-किसानी आज भी उसी असुरक्षा, कर्ज़ और अनिश्चितता में खड़ी है जहां वह सालों पहले थी। न आय बढ़ी, न लागत घटी, न भविष्य को लेकर भरोसा पैदा हुआ। इस बजट की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि किसान अब सरकार की प्राथमिकता तो दूर, उसकी औपचारिक चिंता का विषय भी नहीं रह गया है।
 
प्रत्यक्ष मिश्रा 
 
(लेखक पब्लिक पॉलिसी रिसर्चर हैं )

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