गुरुकुल से गूगल तक : ज्ञान की नहीं, चेतना की यात्रा

फिर साधन बना और अब उपभोग की वस्तु होता जा रहा है

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गुरुकुल से गूगल तक की यात्रा को  केवल शिक्षा-पद्धति के परिवर्तन के रूप में नहीं देखा जा सकता है, यह यात्रा वास्तव में मनुष्य की अंतःचेतना की यात्रा है। पहले ज्ञान साधना था, फिर साधन बना और अब उपभोग की वस्तु होता जा रहा है। यह यात्रा स्मृति से स्क्रीन तक, मौन से शोर तक और बोध से सूचना तक फैली हुई है।

गुरुकुल भारतीय संस्कृति की वह आयाम था जिसमें शिक्षा जीवन से अलग कोई संरचना नहीं थी। गुरु वहाँ केवल विषय का ज्ञाता नहीं, बल्कि जीवन की लय से जुड़ा हुआ पथप्रदर्शक था। शिष्य की आँखों में जिज्ञासा होती थी, उतावलापन नहीं। ज्ञान वहाँ धीरे-धीरे उतरता था - जैसे वर्षा की बूँदें मिट्टी में समाकर उसे उर्वर बनाती हैं। वहाँ शिक्षा का उद्देश्य उत्तर देना नहीं, प्रश्न को परिपक्व करना था।

गुरुकुल का वातावरण प्रकृति के सान्निध्य में रचा गया था। वृक्ष, नदी, अग्नि और आकाश - सब शिक्षा के मौन सहपाठी थे। गुरु का एक वाक्य, एक दृष्टि, कभी-कभी केवल मौन, शिष्य के भीतर दीर्घकालिक स्पंदन उत्पन्न कर देता था। वहाँ ज्ञान का संचय नहीं, संस्कारों का बीजारोपण होता था। इसलिए शिक्षा आचरण बनती थी, जीवन का स्वभाव बनती थी।

समय के साथ समाज की गति बदली। नगर बसे, व्यवस्थाएँ जटिल हुईं और शिक्षा संस्थानों में सीमित होने लगी। यह परिवर्तन आवश्यक था, क्योंकि ज्ञान को व्यापक होना था। पुस्तकों ने स्मृति को विस्तार दिया, विश्वविद्यालयों ने विचारों को मंच दिया, और विज्ञान ने मनुष्य को प्रश्न करने का साहस दिया। यह वह काल था जहाँ शिक्षा ने मनुष्य को बाह्य जगत को समझने और रूपांतरित करने की क्षमता दी।

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परंतु गूगल के युग में प्रवेश करते-करते शिक्षा का स्वरूप पुनः बदल गया। अब ज्ञान साधना नहीं, तत्काल उपलब्धता है। प्रश्न पूछने से पहले उत्तर स्क्रीन पर चमक उठता है। स्मृति की जगह खोज ने ले ली है और अनुभूति की जगह सूचना ने। आज मनुष्य बहुत कुछ जानता है, पर कम ही समझता है।

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गूगल युग की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि ज्ञान सतही हो गया है, बल्कि यह है कि मनुष्य का ठहराव खो गया है। वह जानने की प्रक्रिया में नहीं, केवल परिणाम में रुचि रखता है। पढ़ना अब संवाद नहीं रहा, स्क्रॉल बन गया है। सोचने से पहले हम खोजते हैं, और खोजने के बाद सोचने की आवश्यकता महसूस नहीं करते।

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गुरुकुल में गुरु ज्ञान का संस्कारकर्ता था - गूगल में ज्ञान निराकार, अनिर्दिष्ट और निर्वैयक्तिक है। वहाँ सत्य-असत्य का भेद शिष्य की चेतना के स्तर पर होता था; यहाँ वह एल्गोरिद्म और प्रवृत्ति के हवाले है। चयन का अधिकार हमारे पास है, पर चयन की क्षमता  (विवेक) दिनोंदिन क्षीण होती जा रही है।

फिर भी यह कहना उचित नहीं कि गूगल युग केवल पतन का प्रतीक है। प्रत्येक युग अपनी संभावनाएँ लेकर आता है। गूगल ने ज्ञान के द्वार सबके लिए खोल दिए हैं। प्रश्न यह नहीं कि माध्यम क्या है - प्रश्न यह है कि हम उससे क्या बनने का साहस रखते हैं।

आज आवश्यकता गुरुकुल की भौतिक पुनर्स्थापना की नहीं, बल्कि उसकी आत्मा को बचाए रखने की है। हमें ऐसे गुरु चाहिए जो सूचना के इस अरण्य में दिशा दे सकें। ऐसे शिक्षण-संस्कार चाहिए जो तकनीक का उपयोग करें, पर मनुष्य को मशीन न बनने दें। जहाँ प्रश्न पूछना फिर से साहस हो, और मौन फिर से अर्थवान बने।

गुरुकुल से गूगल तक की यात्रा तब ही पूर्ण और सार्थक होगी, जब तकनीक मनुष्य की चेतना को संकुचित नहीं, विस्तृत करे; जब शिक्षा रोजगार से आगे बढ़कर उत्तरदायित्व सिखाए; और जब मनुष्य यह समझ सके कि जान लेना ही पर्याप्त नहीं है, समझकर जीना ही ज्ञान का चरम है।

निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि यह ​यात्रा लंबी है - मिट्टी की सोंधी सुगंध से लेकर डेटा के निर्जीव सर्वर तक। परंतु ज्ञान की सार्थकता सूचनाओं के अंबार में नहीं, बल्कि उनके चरित्र में रूपांतरण में है। यदि हम गूगल की असीम शक्ति को गुरुकुल के संयम और अनुशासन के साथ जोड़ सकें, तो हम एक ऐसी सभ्यता का निर्माण करेंगे जो न केवल बुद्धिमान होगी, बल्कि प्रज्ञावान भी होगी।

​यह समय तकनीक को त्यागने का नहीं, बल्कि तकनीक को 'संस्कारित' करने का है। तभी हम गर्व से कह पाएंगे कि हम केवल सूचनाओं के उपभोक्ता नहीं, बल्कि बोध के वास्तविक उत्तराधिकारी हैं। गुरुकुल की आत्मा और गूगल की गति का यह संगम ही आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

डॉ स्नेहलता श्रीवास्तव 

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