क्रिकेट का कब्रिस्तान पाकिस्तान, पाकिस्तान सरकार का आत्मघाती कदम

विगत 10 से12 वर्षों में क्रिकेट पाकिस्तान के लिए बोझ बनता जा रहा है

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पाकिस्तान सरकार ने आगामी T20 वर्ल्ड कप 26 को श्रीलंका में होने वाले भारत-पाकिस्तान मैच में शामिल नहीं होने का फैसला कर लिया है। पाकिस्तान ने इस तरह पाकिस्तान क्रिकेट की कब्र ही खोद दी है। विगत 10 से12 वर्षों में क्रिकेट पाकिस्तान के लिए बोझ बनता जा रहा है और आगामी टी-20 वर्ल्ड कप 2026 में 15 फरवरी को भारत के विरुद्ध मैच खेलने से पाकिस्तान सरकार के इनकार ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। कयास यह लगाई जा रहे हैं कि भारत से डर कर पाकिस्तान ने मैच खेलने से इनकार कर दिया है गौरतलाप है कि वर्ल्ड कप T20 में आठ में से 7 मैच भारत जीता है और केवल एक मैच पाकिस्तान जीत पाया है। ऐसी परिस्थितियों में यह फैसला खेल से अधिक राजनीति से प्रेरित प्रतीत होता है और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट व्यवस्था में इसके दूरगामी आर्थिक, कूटनीतिक और संस्थागत दुष्परिणाम निश्चित हैं। भारत पाक मुकाबला केवल एक मैच नहीं बल्कि वैश्विक क्रिकेट का सबसे बड़ा व्यावसायिक इवेंट माना जाता है। जिससे आईसीसी, मेज़बान देश, ब्रॉडकास्टिंग कंपनियां, प्रायोजक और स्वयं दोनों क्रिकेट बोर्डों को भारी राजस्व प्राप्त होता है। इन परिस्थितियों में यदि पाकिस्तान इस मैच से पीछे हटता है तो पहला सीधा झटका इंटरनेशनल ब्रॉडकास्टर्स को लगेगा जिन्होंने अरबों रुपये का निवेश इस टूर्नामेंट के अधिकारों में किया है। विज्ञापन अनुबंध, स्लॉट बुकिंग और व्यूअरशिप अनुमानों की रीढ़ भारत-पाक मैच पर ही टिकी होती है। मैच रद्द या पाकिस्तान की अनुपस्थिति की स्थिति में ब्रॉडकास्टिंग कंपनियां आईसीसी से मुआवज़े की मांग करेंगी और यह स्वाभाविक है कि आईसीसी उस क्षतिपूर्ति का बोझ संबंधित बोर्ड यानी पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड और अंततः पाकिस्तान सरकार पर डालने का प्रयास करेगा। विभिन्न मीडिया अनुमानों और पूर्व अनुभवों के आधार पर यह नुकसान लगभग 250 से 300 करोड़ रुपये तक आंका जा रहा है, जो पहले से कर्ज, महंगाई, विदेशी मुद्रा संकट और आईएमएफ की शर्तों से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए अत्यंत गंभीर आर्थिक आघात होगा। इतना ही नहीं यदि आईसीसी इसे टूर्नामेंट की अखंडता और अनुबंध उल्लंघन के रूप में देखती है तो उस पर अतिरिक्त जुर्माना भी लगाया जा सकता है। जिससे कुल नुकसान और बढ़ेगा, इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा शिकार पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड होगा जो पहले ही आर्थिक रूप से कमजोर स्थिति में है और जिसकी आय का बड़ा हिस्सा आईसीसी के वितरण और भारत-पाक सीरीज की अप्रत्यक्ष लोकप्रियता पर निर्भर करता है। यदि आईसीसी पाकिस्तान को गैर-पेशेवर व्यवहार या राजनीतिक हस्तक्षेप के लिए दोषी मानती है तो उस पर भविष्य के टूर्नामेंटों की मेजबानी से वंचित किया जा सकता है या पांच वर्ष तक के प्रतिबंध जैसी कठोर कार्रवाई की संभावना भी बन सकती है, जो पीसीबी के लिए लगभग विनाशकारी सिद्ध होगी क्योंकि तब न केवल राजस्व रुकेगा बल्कि खिलाड़ियों का अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर भी सीमित हो जाएगा। पाकिस्तान का यह तर्क कि उसने बांग्लादेश के भारत न आकर खेलने के फैसले के समर्थन में यह कदम उठाया है, तो यह फैसला अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट जगत में ज्यादा वजन नहीं रखता क्योंकि आईसीसी का ढांचा द्विपक्षीय राजनीतिक समर्थन नहीं बल्कि लिखित अनुबंधों और तय कार्यक्रमों पर आधारित होता है। खेल की वैश्विक संस्था भावनात्मक या वैचारिक समर्थन से नहीं बल्कि व्यावसायिक अनुशासन से चलती है।  पाकिस्तान का यह निर्णय उसे नैतिक ऊंचाई नहीं बल्कि प्रशासनिक अविश्वसनीयता की श्रेणी में खड़ा करता है। भारत की स्थिति इस पूरे विवाद में अपेक्षाकृत मजबूत है क्योंकि बीसीसीआई न केवल आर्थिक रूप से दुनिया का सबसे ताकतवर बोर्ड है बल्कि आईसीसी की आय का सबसे बड़ा स्रोत भी है। इसलिए किसी भी विवाद में आईसीसी संतुलन साधने का प्रयास करेगी लेकिन अंततः नुकसान उसी को उठाना पड़ेगा जो आयोजन को बाधित कर रहा है। पाकिस्तान में क्रिकेट को लेकर पहले ही अस्थिरता रही है,कभी सुरक्षा कारण, कभी सरकार का हस्तक्षेप, कभी बोर्ड की अंदरूनी राजनीति इन सबने मिलकर पाकिस्तान क्रिकेट की विश्वसनीयता को कमजोर किया है और यह फैसला उसी कड़ी का अगला अध्याय लगता है। यदि पाकिस्तान वास्तव में क्रिकेट को “कब्रिस्तान” बनने से बचाना चाहता है तो उसे यह समझना होगा कि आधुनिक क्रिकेट केवल खेल नहीं बल्कि वैश्विक उद्योग है जहां भावनाओं से अधिक अनुबंध और पेशेवर प्रतिबद्धता मायने रखती है, भारत के खिलाफ न खेलने का निर्णय घरेलू राजनीति में भले ही तालियां बटोर ले, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह पाकिस्तान को अलग-थलग करने की दिशा में एक और कदम साबित हो सकता है। अंततः नुकसान केवल सरकार या बोर्ड का नहीं होगा बल्कि उन खिलाड़ियों का होगा जिनके करियर, मेहनत और सपने इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ेंगे, इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि इस फैसले ने पाकिस्तान ने अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी नहीं बल्कि क्रिकेट रूपी आखिरी सहारे पर भी गहरी चोट कर दी है। यदि समय रहते आत्ममंथन नहीं हुआ तो आने वाले वर्षों में पाकिस्तान क्रिकेट इतिहास के पन्नों में गौरव से नहीं बल्कि चेतावनी के उदाहरण के रूप में दर्ज हो सकता है।

संजीव ठाकुर

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