अमेरिका द्वारा ईरान का भया दोहन, ट्रंप ईरान में वेनेजुएला की तरह नियंत्रण चाहते हैं

अमेरिका और ईरान के बीच गत कुछ महीनों में तनाव एक नए शिखर पर पहुँच गया है

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अमेरिका और ईरान के बीच गत कुछ महीनों में तनाव एक नए शिखर पर पहुँच गया है। जिसमें न केवल कूटनीतिक, वाणिज्यिक दबाव बल्कि विस्तृत सैन्य तैयारियों और खुले रूप से युद्ध की धमकियाँ भी शामिल हैं।  पिछले कई महीनों की घटनाओं से यह स्पष्ट नजरिया सामने आया।है कि यह केवल रीजनल तनाव नहीं रहा बल्कि वैश्विक राजनीति का एक प्रमुख केन्द्र बन गया है। अमेरिका अभी भी आर्थिक,सामरिक एवं राजनीतिक तौर पर शक्तिशाली राष्ट्र है।

और आर्थिक रूप से अमेरिका ने ईरान पर बड़े प्रतिबंध लगाए हुए हैं, जिसमें तेल निर्यात और वित्तीय लेन-देन को रोकने के साथ-साथ ईरान के सहयोगी देशों और संस्थाओं पर भी अतिरिक्त टैक्स तथा दंडात्मक कार्रवाई शामिल है। जिससे एजेंसी डेटा बताते हैं कि ईरान की निर्यात-आय सीमित हो रही है, जिससे व्यापक आर्थिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह प्रतिबंध और दबाव ईरान के न्यूक्लियर कार्यक्रम और क्षेत्रीय समर्थित आतंकवाद को रोकने के उद्देश्य से हैं, लेकिन ईरानी नेतृत्व इसे अपने संप्रभुत अधिकारों पर आक्रमण मानता है।

सैन्य दृष्टि से, अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपनी मौजूदगी बढ़ा दी है और तैनात नौसेना बलों को बड़ा आकार दे दिया है ट्रंप ने बयान दिया है कि यह बेड़ा उस से भी बड़ा है जो उसने वेनेजुएला पर उसकी कार्रवाई से पहले तैनात किया था, और यह बल अब्राहम लिंकन जैसे युद्धपोतों के साथ समुद्री और वायु समूहों को शामिल करता है।  अमेरिका का यह बल ‘निर्दिष्ट मिशन के लिये तैयार, इच्छुक और सक्षम’ बताया जा रहा है और ट्रंप इसे ईरान को बातचीत की मेज़ पर लाने के लिये दबाव का हिस्सा मानते हैं, यह कहते हुए कि “हम उम्मीद करते हैं कि ईरान सौदा करना चाहेगा”। अमेरिका के सभी विकल्प खुले रहने की बात करने से यह संकेत भी मिलता है कि सैन्य हमले की संभावना को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा रहा है।

ईरान ने जवाब में अपनी सैन्य तैयारियाँ तेज कर रखी हैं, जिसमें रिपोर्टें बताती हैं कि उसने हजारों बैलिस्टिक मिसाइलें तैनात की हैं और अपनी क्षमता को बढ़ाया है, साथ ही यह कहा है कि किसी भी हमले का उत्तर ‘तुरंत और अप्रत्याशित’ रूप से दिया जाएगा।  इरानी नेतृत्व ने युद्ध नहीं चाहने का दावा किया है, लेकिन सजग चेतावनी दी है कि “हम देश को युद्ध की राह पर नहीं ले जाना चाहते” और आरोप लगाया है कि अमेरिका ईरान को ‘निगल’ जाना चाहता है, जो तनाव को भावनात्मक रूप से और बढ़ाता है।

हालांकि कुछ विश्लेषक और अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारी यह मानते हैं कि सैन्य हमले की संभावना “एक बार तय” जैसे दृष्टिकोण में पहु‍ँच चुकी है और यह समय की बात है कि हमला कब होगा, न कि क्या होगा, जिससे युद्ध की तैयारी का माहौल और गहराता जा रहा है।  इसी बीच ईरान के भीतर भी व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए हैं, जिनमें सैकड़ों लोगों की मौत की खबरें आईं हैं और यह स्थिति आंतरिक असंतोष तथा अमेरिका-के खिलाफ रुख को एक साथ बढ़ा रही कूटनीतिक रूप से, ताज़ा सूचनाओं के अनुसार ईरानी अधिकारियों ने कहा है कि वे अमेरिका के साथ एक ‘न्यायसंगत’ बातचीत के लिये तैयार हैं, बशर्ते वह धमकियों के साये में न हो।,

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शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों ने संकेत दिया है कि बातचीत के आयोजन के लिये प्रगति हो रही है। यह दर्शाता है कि खुले युद्ध के साथ-साथ कूटनीतिक प्रयास भी चल रहे हैं। अरब देश, तुर्की और अन्य क्षेत्रीय शक्तियाँ भी संघर्ष को रोकने के लिये सक्रिय मध्यस्थता कर रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि किसी भी बड़े खुला युद्ध का प्रभाव केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा।

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यदि हम अमेरिका के सैन्य तैनाती और आर्थिक दबाव की तुलना वेनेजुएला से करें, तो स्पष्ट रूप से अमेरिका ने पहले वेनेजुएला के खिलाफ ऑपरेशन सदर्न स्पियर जैसे अभियान में नौसेना तथा सैन्य बल का इस्तेमाल किया था, जिसमें राष्ट्रपति मादुरो को पकड़ने और शासन को बदलने की कोशिश की गई थी, जिसमें कूटनीतिक विवाद और अंतरराष्ट्रीय आलोचना भी उत्पन्न हुई थी। ट्रंप के बयान के अनुसार, ईरान के लिये जो सैन्य समूह भेजा जा रहा है वह उससे भी बड़ा है, जो संकेत देता है कि अमेरिकी प्रशासन इसे वेनेजुएला की तरह एक सीमित राजनैतिक,सैन्य ऑपरेशन से भी आगे देख रहा है।

लेकिन यह भी ध्यान देने योग्य है कि ट्रंप ने खुले तौर पर कहा है कि वे चाहते हैं ईरान बातचीत करे और यह कि “हम युद्ध नहीं चाहते”, जैसा कि कुछ मीडिया रिपोर्टों ने उद्धृत किया है।  ट्रंप की इस दोहरे रणनीति को कुछ विश्लेषक ‘ब्रिंकमैनशिप’  नीति कह रहे हैं, जहां खुला युद्ध अंतिम विकल्प रखा जाता है पर बातचीत को भी कायम रखा जाता है।

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यहाँ यह समझना जरूरी है कि ईरान जैसे क्षेत्रीय शक्ति पर अमेरिका का दबाव केवल सीधा सैन्य संघर्ष नहीं बल्कि व्यापक आर्थिक प्रतिबंध, वैश्विक कठोर राजनैतिक दबाव तथा सैन्य रणनीतिक तैयारियों का संयोजन है। ईरान भी केवल कूटनीतिक रूप से नहीं बल्कि सामरिक रूप से भी तैयार दिख रहा है। मिसाइल कार्यक्रम, बलों की तैनाती, और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया रूस और चीन जैसे देशों द्वारा कभी-कभी समर्थन का संकेत — यह संकेत देते हैं कि— यानी बातचीत को युद्ध की कगार पर ले जाकर समझौता करने की ईरान अकेला नहीं है, और एक सीधा युद्ध बहुत खतरनाक और व्यापक बन सकता है।

वेनेजुएला की तुलना में ईरान अन्तरराष्ट्रीय महत्व और रणनीतिक स्थितियों की वजह से कहीं बड़ा मामला है। वेनेजुएला में अमेरिका ने मुख्यतः दक्षिण अमेरिका में राजनीतिक नियंत्रण और ऊर्जा साधनों पर प्रभाव के लिये कदम उठाये, जबकि ईरान मध्य पूर्व में तेल मार्ग, न्यूक्लियर कार्यक्रम तथा सामरिक प्रभाव के केन्द्र में है। अगर ट्रंप ईरान को वेनेजुएला की तरह कब्जे या शासन परिवर्तन के लिये ले जाने की कोशिश करे, तो यह केवल एक राष्ट्र का सैनिक अधिपत्य नहीं बल्कि एक वैश्विक प्रतिद्वंदी शक्ति को नियंत्रित करने का प्रयास होगा, जिसका परिणाम क्षेत्रीय युद्ध, तेल की वैश्विक कीमतों में उछाल, और विश्व राजनीति में और गहरी विभाजन की स्थिति हो सकता है।

इस समय ताज़ा हालात यह संकेत देते हैं कि अमेरिका पूरी सैन्य तैयारी के साथ खड़ा है, ईरान भी कठोर प्रतिक्रिया के लिये तैयार है, और कूटनीतिक प्रयास संघर्ष को नियंत्रण में रखने के लिये जारी हैं ।लेकिन खुला युद्ध अभी टल नहीं पाया है और दोनों पक्षों की कठिन स्थिति वैश्विक राजनीति के लिये बेहद महत्वपूर्ण है।

क्या ट्रंप ईरान को वेनेजुएला की तरह अपने अधिपत्य में ले सकता है? वर्तमान संकेत यह दिखाते हैं कि सैन्य नियंत्रण के बजाय अमेरिका अधिकतर दबाव और बातचीत के द्वारा ही परिणाम चाहता है, पर यह भी स्पष्ट है कि अगर ईरान बातचीत में मुख्य शर्तें नहीं मानता तो सैन्य विकल्पों को पूरी तरह से खारिज नहीं किया गया है और यह सम्भावना वैश्विक राजनीति के लिये गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है।

संजीव ठाकुर

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