संसद का बजट सत्र और लोकतांत्रिकविमर्श की कसौटी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव से उभरते सत्ता-विपक्ष के तर्क

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा इसी परंपरा का केंद्रीय पड़ाव है

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संसद के बजट सत्र का चौथा दिन भारतीय लोकतंत्र के उस जीवंत पक्ष को सामने लाता है, जहां सरकार और विपक्ष एक ही मंच पर देश की दिशा, प्राथमिकताओं और नीतिगत दावों पर खुली बहस करते हैं। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा इसी परंपरा का केंद्रीय पड़ाव है। यह केवल औपचारिक धन्यवाद नहीं, बल्कि सरकार के पूरे एजेंडे पर संसद की सामूहिक प्रतिक्रिया होती है। लोकसभा में सांसद सर्बानंद सोनोवाल द्वारा प्रस्ताव पेश किए जाने के साथ शुरू हुई यह बहस 18 घंटे तक चलेगी, जिसमें सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियों का बखान करेगा तो विपक्ष अपने सवालों और आपत्तियों के साथ सरकार को कठघरे में खड़ा करेगा। इसी बहस के बीच प्रधानमंत्री का 4 फरवरी को जवाब और वित्त मंत्री का 11 फरवरी को बजट से जुड़े प्रश्नों पर उत्तर, सत्र की दिशा तय करेंगे।
 
इस वर्ष का बजट सत्र दो चरणों में विभाजित है, जो संसदीय कामकाज की व्यापकता और गंभीरता को रेखांकित करता है। पहले चरण में राष्ट्रपति का अभिभाषण, आर्थिक सर्वेक्षण और आम बजट प्रस्तुत हुआ, जबकि दूसरे चरण में मंत्रालयों की अनुदान मांगों पर विस्तृत चर्चा, वोटिंग और वित्तीय विधेयकों का पारित होना तय है। यह संरचना बताती है कि बजट केवल आंकड़ों का दस्तावेज नहीं, बल्कि नीतियों, प्राथमिकताओं और राजनीतिक संकल्पों का समुच्चय है, जिसे संसद की कसौटी पर परखा जाता है।
 
धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान सत्ता और विपक्ष के बीच वैचारिक टकराव स्वाभाविक है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी सहित कई वरिष्ठ नेता इस बहस में भाग ले रहे हैं। राहुल गांधी ने अपने वक्तव्य की शुरुआत एक आत्मीय धन्यवाद के साथ की और तत्काल एक प्रतीकात्मक संदर्भ चुना पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे की आत्मकथा। यह चयन अपने आप में संदेश देता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, देशभक्ति और संस्थागत दृष्टिकोण जैसे विषय विपक्ष के विमर्श के केंद्र में हैं। हालांकि, उनके वक्तव्य के दौरान हंगामा भी हुआ, जो संसद की उस वास्तविकता को दर्शाता है जहां तीखे आरोप-प्रत्यारोप अक्सर संवाद को बाधित कर देते हैं।
 
विपक्ष की रणनीति स्पष्ट दिखती है। एक ओर वह बजट की सामाजिक-आर्थिक प्राथमिकताओं पर सवाल उठा रहा है, दूसरी ओर सरकार के नैरेटिव को चुनौती दे रहा है। मनरेगा जैसे कार्यक्रमों का उल्लेख कर कांग्रेस यह बताने की कोशिश कर रही है कि पूर्ववर्ती नीतियों ने ग्रामीण रोजगार और सामाजिक सुरक्षा में परिवर्तनकारी भूमिका निभाई थी, जबकि नई योजनाओं में खामियां हैं। केरल के सांसदों का प्रदर्शन और राज्य के प्रति उपेक्षा के आरोप संघीय ढांचे में केंद्र-राज्य संबंधों की पुरानी बहस को फिर से सामने लाते हैं। विपक्ष के लिए यह मंच न केवल आलोचना का, बल्कि अपने वैकल्पिक दृष्टिकोण को रखने का अवसर भी है।
 
सत्ता पक्ष का रुख भी उतना ही आक्रामक और आत्मविश्वासी है। भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या का लंबा वक्तव्य सरकार की वैचारिक दिशा और उपलब्धियों को रेखांकित करता है। उन्होंने कांग्रेस के पिछले दस वर्षों के भाषणों में संस्कृति, स्टार्ट-अप, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और विकसित भारत जैसे शब्दों की अनुपस्थिति का उल्लेख कर यह तर्क दिया कि देश की आकांक्षाएं बदली हैं और वर्तमान सरकार ने उन आकांक्षाओं को शब्द और दिशा दी है। यूपीआई, आईपीओ और डिजिटल अर्थव्यवस्था का उदाहरण देकर उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की कि युवाओं की शब्दावली और सपने कैसे बदले हैं। यह बहस केवल आंकड़ों की नहीं, बल्कि दृष्टिकोणों की है।एक ओर परंपरागत कल्याणकारी राज्य का मॉडल, दूसरी ओर विकास, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर जोर।
 
तेजस्वी सूर्या का सांस्कृतिक विमर्श भी उल्लेखनीय है। मंदिरों के विकास, राम मंदिर के उद्घाटन और सांस्कृतिक आत्मविश्वास की बात करते हुए उन्होंने यह संदेश दिया कि सरकार केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण को भी अपनी उपलब्धि मानती है। इसके साथ ही कांग्रेस की चुनावी पराजयों का उल्लेख कर राजनीतिक बढ़त का दावा किया गया। ऐसे वक्तव्य संसद को एक ऐसे मंच में बदल देते हैं जहां नीतिगत चर्चा के साथ-साथ राजनीतिक संदेश भी जनता तक पहुंचाया जाता है।
 
राज्यसभा की कार्यवाही भी इसी व्यापक तस्वीर का हिस्सा है। धन्यवाद प्रस्ताव का पेश होना, प्रश्नकाल में न्यायिक भर्ती के लिए राष्ट्रीय प्रणाली की मांग, जयललिता को भारत रत्न देने की मांग जैसे मुद्दे यह दिखाते हैं कि संसद केवल बजट तक सीमित नहीं, बल्कि विविध राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सवालों का केंद्र है। प्रश्नकाल के दौरान स्पीकर की यह टिप्पणी कि सवाल और जवाब संक्षिप्त होने चाहिए, संसदीय दक्षता और प्रभावशीलता की ओर संकेत करती है।
 
इस पूरे सत्र की पृष्ठभूमि में 1 फरवरी को प्रस्तुत आम बजट की छाया स्पष्ट दिखती है। 85 मिनट का बजट भाषण सरकार की आर्थिक प्राथमिकताओं का खाका था, जबकि आर्थिक सर्वेक्षण ने देश की अर्थव्यवस्था का रिपोर्ट कार्ड पेश किया। अब धन्यवाद प्रस्ताव की बहस उस खाके और रिपोर्ट कार्ड की राजनीतिक समीक्षा है। विपक्ष जहां सामाजिक न्याय, रोजगार और संघीय संतुलन पर जोर दे रहा है, वहीं सरकार बुनियादी ढांचे, नवाचार, वैश्विक भूमिका और सांस्कृतिक पहचान को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है।
 
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि बजट सत्र लंबा और चरणबद्ध है। पहले चरण के बाद अवकाश और फिर दूसरे चरण में अनुदान मांगों पर चर्चा, यह सुनिश्चित करता है कि वित्तीय प्रस्तावों की गहन जांच हो सके। मंत्रालयों की डिमांड पर ग्रांट की चर्चा और वोटिंग लोकतांत्रिक जवाबदेही का मूल तत्व है, क्योंकि यहीं सरकार को यह स्पष्ट करना होता है कि सार्वजनिक धन का उपयोग कैसे और क्यों किया जाएगा।
 
धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान उठे विवाद, आरोप और हंगामे संसद की सीमाओं को भी उजागर करते हैं। संवाद की जगह शोर, और तर्क की जगह नारे जब हावी हो जाते हैं, तो लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर पड़ता है। फिर भी, यही बहसें लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण भी हैं। विभिन्न विचारों का टकराव, असहमति का खुला प्रदर्शन और अंततः प्रधानमंत्री का जवाब यह सब मिलकर संसदीय प्रक्रिया को पूर्णता देता है।
 
प्रधानमंत्री का 4 फरवरी को प्रस्ताव पर उत्तर इस सत्र का निर्णायक क्षण होगा। परंपरागत रूप से यह उत्तर न केवल विपक्ष के सवालों का जवाब होता है, बल्कि सरकार की भविष्य की दिशा का संकेत भी देता है। इसी तरह वित्त मंत्री का बजट पर उत्तर वित्तीय बहस को समेटने का काम करेगा। इन दोनों जवाबों से यह स्पष्ट होगा कि सरकार आलोचनाओं को कैसे देखती है और किन प्राथमिकताओं के साथ आगे बढ़ना चाहती है।
 
कुल मिलाकर, संसद का बजट सत्र और राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा भारतीय लोकतंत्र का वह आईना है, जिसमें देश की राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बहसें एक साथ प्रतिबिंबित होती हैं। यहां केवल कानून और बजट नहीं बनते, बल्कि विचार गढ़े जाते हैं, दावे परखे जाते हैं और जनता के सामने सत्ता का लेखा-जोखा रखा जाता है। यही कारण है कि इस सत्र की कार्यवाही केवल संसदीय रिकॉर्ड नहीं, बल्कि समकालीन भारत की कहानी भी है।एक ऐसी कहानी जिसमें विकास की आकांक्षा, सामाजिक न्याय की मांग, सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, सभी एक साथ चलती हैं।
कांतिलाल मांडोत

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