दस्तावेजों से परे: भारतीयता का आत्मिक अन्वेषण

वास्तव में, 'भारतीय' होना भूगोल और राजनीति के मानचित्रों से कहीं परे एक चेतना है

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 (डॉ.) मनमोहन प्रकाश
 
​अक्सर जब हम 'भारतीय' होने की बात करते हैं, तो हमारा ध्यान नागरिकता, आधार कार्ड, पासपोर्ट या मतदाता पहचान पत्र जैसे वैधानिक दस्तावेजों की ओर मुड़ जाता है। संवैधानिक दृष्टिकोण से यह अनुचित भी नहीं है। भारत में नागरिकता मूलत  एक ऐसा सामाजिक अनुबंध है, जो हमें मताधिकार, सुरक्षा और विविध सुविधाएं प्रदान करता है। किंतु प्रश्न यह उठता है कि क्या 140 करोड़ से अधिक की जनसंख्या वाले इस जीवंत राष्ट्र की पहचान मात्र कागजी दस्तावेजों की सीमाओं में बांधी जा सकती है? कदाचित नहीं।
 
वास्तव में, 'भारतीय' होना भूगोल और राजनीति के मानचित्रों से कहीं परे एक चेतना है, एक 'भाव' है, एक 'संस्कार' है और जीवन जीने का एक विशिष्ट दर्शन है। नागरिकता जहां हमें निवास का वैधानिक पता देती है, वहीं भारतीयता हमें हमारी वास्तविक पहचान का बोध कराती है।यह पहचान उस 'असाधारण स्वीकार्यता' में निहित है, जो हमें सहस्रों भाषाओं, सैकड़ों बोलियों और विविध मत-पंथों के बावजूद एक अदृश्य, अटूट सूत्र में पिरोती है।
 
भारतीयता का वास्तविक मर्म उस समरसता में है, जहाँ मंदिर के घंटे की ध्वनि, मस्जिद की अज़ान, गुरुद्वारे की गुरबाणी, बौद्ध स्तूपों के 'धम्म-चक्र' और चर्च की प्रार्थना में एक ही शाश्वत सत्य की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। जब हम पंजाब के स्वर्णिम खेतों से लेकर केरल के शांत जलक्षेत्र तक, और कच्छ के श्वेत रण से लेकर पूर्वोत्तर की हरित पहाड़ियों तक फैली सांस्कृतिक विरासत को आत्मसात करते हैं, तब हम नागरिकता के संकीर्ण दायरे से निकलकर भारतीयता के उस वृहद आकाश को छूते हैं जहाँ कृत्रिम भेद मिट जाते हैं। 'विविधता में एकता' यहाँ केवल एक नारा नहीं, अपितु हमारी सामूहिक धड़कन है।
 
​वैश्वीकरण आज विश्व के लिए एक आधुनिक आर्थिक परिघटना हो सकती है, किंतु भारत की मिट्टी में 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का बीज युगों पूर्व रोपा जा चुका है। भारतीय होने का अर्थ है-अपने द्वार पर आए अतिथि में नारायण के दर्शन करना, अर्थात 'अतिथि देवो भव' की संस्कृति को जीना। अपनी थाली का एक अंश किसी क्षुधित के लिए सुरक्षित रखना;दीन-दुखियों, वंचितों और  जरुरतमंदों के लिए अपने हृदय के द्वार हमेशा खुले रखना हमारी मौलिक उदारता है। जाति, धर्म, भाषा और लिंग के पूर्वाग्रहों को त्यागकर दूसरों की पीड़ा में व्यथित होना ही वह 'सांस्कृतिक तत्व' है, जो हमें भीड़ से पृथक कर एक 'राष्ट्र' के रूप में परिभाषित करता है।
 
​भारतीयता विरोधाभासों के बीच अद्भुत संतुलन साधने की कला का नाम भी है। हम वह विलक्षण समाज हैं, जो 'मंगलयान' और 'चंद्रयान' जैसे जटिल वैज्ञानिक मिशनों की सफलता को अपनी प्राचीन परंपराओं के साथ मनाते हैं। हम अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़े रहकर अंतरिक्ष की गहराइयों को नापने का साहस रखते हैं।यही शौर्य और संकल्प हमारी सीमाओं पर और भी प्रखर हो उठता है।
 
जब हमारे वीर सैनिक शून्य से नीचे के तापमान या तपते रेगिस्तान में शत्रुओं का सामना करते हैं, तो उनकी रगों में दौड़ता 'भारतीयत्व' ही उनकी सबसे बड़ी शक्ति होता है। वे केवल शस्त्रों से नहीं, बल्कि अदम्य इच्छाशक्ति से लड़ते हैं। रणभूमि में जब वे प्राणों की बाजी लगाते हैं, तो 'भारत माता की जय' और 'वंदे मातरम्' के गगनभेदी जयघोष के साथ अपने 'इष्ट' और अपनी रेजिमेंट के 'ध्येय वाक्य' का उद्घोष करते हैं। यह राष्ट्रभक्ति और आत्मिक गौरव का वह दुर्लभ संगम है, जो एक साधारण नागरिक को 'वीर' और एक सैनिक को 'अजेय' बना देता है।
 
​अंततः, नागरिकता जहाँ अधिकारों का दावा करती है, वहीं भारतीयता कर्तव्यों का बोध कराती है तथा संविधान सम्मत आचरण के लिए प्रेरित करती है। जब कोई व्यक्ति सड़क पर पड़े कूड़े को यह सोचकर उठाता है कि "यह मेरा देश है," तब वह विधिक परिभाषाओं से ऊपर उठ जाता है। दस्तावेज हमें इस भू-भाग का वैधानिक निवासी बना सकते हैं, लेकिन हमारे कर्म, बंधुत्व और करुणा हमें 'भारतीय' बनाते हैं।
 
यह वह नैसर्गिक गौरव है जो राष्ट्रगान की प्रथम स्वरलहरी बजते ही रोंगटे खड़े कर देता है।​इसलिए, आइए हम केवल आंकड़ों वाले नागरिक न बनकर, अपने आचरण से सच्चे 'भारतीय' बनें। राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा रखें, उसकी कमियों को सुधारने का उत्तरदायित्व लें और अपना जीवन देश की आन-बान-शान के लिए समर्पित करें।

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