राजनीति
रक्षा खर्च नहीं, राष्ट्रीय निवेश: भारत की शक्ति-निर्माण यात्रा
[शक्ति का लोकतंत्रीकरण: स्वदेशी भारत] [हथियार नहीं, आत्मविश्वास खरीदा गया है इस बजट में]
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
पिछले वर्ष के ₹6.81 लाख करोड़ की तुलना में यह वृद्धि असाधारण अवश्य है, परंतु वर्तमान परिस्थितियों में पूरी तरह अनिवार्य भी है। विशेष रूप से पूंजीगत व्यय का ₹2.19 लाख करोड़ तक पहुंचना और उसमें 22% की तेज छलांग यह दर्शाती है कि भारत अब तात्कालिक जरूरतों से ऊपर उठकर दीर्घकालिक शक्ति निर्माण की दिशा में आगे बढ़ चुका है। ऑपरेशन सिंदूर ने यह निर्विवाद रूप से सिद्ध कर दिया कि आधुनिक युद्ध में तकनीक, तैयारी और आत्मनिर्भरता ही विजय की कुंजी होती हैं। इसी कारण यह बजट आंकड़ों से आगे बढ़कर एक सशक्त रणनीतिक संदेश बन जाता है।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने जिस निर्णायक ढंग से दुश्मन के हवाई क्षेत्र में प्रभुत्व स्थापित किया, उसने क्षेत्रीय शक्ति संतुलन की परंपरागत धारणाओं को बदल दिया। शत्रु ठिकानों का सटीक और प्रभावी विनाश तथा संघर्षविराम के लिए विवश करना केवल सैन्य सफलता नहीं, बल्कि एक स्पष्ट रणनीतिक चेतावनी थी। अब यह बजट उसी चेतावनी को स्थायी सामरिक शक्ति में रूपांतरित करने का साधन बन रहा है। प्रत्येक प्लेटफॉर्म, प्रत्येक प्रणाली और प्रत्येक हथियार को स्वदेशी बनाने की दिशा में यह एक निर्णायक और दूरदर्शी कदम है।
रक्षा मंत्री द्वारा इसे “रणनीतिक अनिवार्यता” करार देना वर्तमान वैश्विक यथार्थ की सटीक और स्पष्ट व्याख्या है। मई 2025 के सीमित किंतु तीव्र संघर्ष ने यह उजागर कर दिया कि आतंक और अस्थिरता की जड़ें पड़ोसी भूभागों में गहराई तक फैली हुई हैं। ऐसे वातावरण में केवल रक्षात्मक रुख पर्याप्त नहीं, बल्कि आक्रामक, आधुनिक और तकनीकी रूप से सक्षम सैन्य शक्ति की नितांत आवश्यकता है। इसी रणनीतिक सोच के अनुरूप इस बजट में विमानन, एयरो इंजन और अगली पीढ़ी की युद्ध प्रणालियों पर विशेष और स्पष्ट बल दिया गया है।
विमान और एयरो इंजन के लिए ₹63,733 करोड़ तथा नौसेना के बेड़े के लिए ₹25,023 करोड़ का आवंटन भारत की बहु-आयामी और संतुलित सैन्य तैयारी का स्पष्ट संकेत है। अगली पीढ़ी के फाइटर जेट, एईडब्ल्यू एंड सी प्रणालियां, एमएलआरएस, बीवीआर मिसाइलें और लोइटरिंग मुनिशन्स अब कागजी योजनाएं नहीं, बल्कि ठोस अधिग्रहण की प्राथमिक सूची में शामिल हो चुके हैं। कुल पूंजीगत बजट का 75% घरेलू उद्योग से खरीद के लिए निर्धारित किया जाना आत्मनिर्भर भारत की नीति को विचार से निकालकर ठोस जमीन पर स्थापित करता है।
स्वदेशी रक्षा उत्पादन अब केवल एक आकांक्षा नहीं, बल्कि सशक्त और स्थापित वास्तविकता का रूप ले चुका है। ₹1.39 लाख करोड़ से बढ़कर ₹1.64 लाख करोड़ तक घरेलू खरीद का विस्तार यह स्पष्ट करता है कि भारतीय रक्षा उद्योग पर सरकार का भरोसा पहले से कहीं अधिक मजबूत हुआ है। डीआरडीओ के लिए ₹29,100 करोड़ का आवंटन, जिसमें ₹17,250 करोड़ पूंजीगत अनुसंधान और विकास के लिए निर्धारित हैं, भविष्य की युद्ध तकनीकों की नींव रखता है। यह निवेश अनुसंधान प्रयोगशालाओं को सीधे रणभूमि की आवश्यकताओं से जोड़ने वाला साबित होगा।
आत्मनिर्भरता की इस रणनीतिक यात्रा में निजी क्षेत्र, स्टार्टअप और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका लगातार अधिक निर्णायक होती जा रही है। रक्षा अनुसंधान बजट का 25% इन क्षेत्रों के लिए खोलना नवाचार, प्रतिस्पर्धा और तकनीकी आत्मविश्वास को नई ऊर्जा प्रदान करता है। ड्रोन स्वार्म, साइबर डिफेंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित प्रणालियां और स्पेस वारफेयर जैसी क्षमताएं अब भारत की प्राथमिक सामरिक सूची में शामिल हो चुकी हैं। यह बजट भारत को तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि सशक्त निर्माता और संभावित निर्यातक बनाने की दिशा में आगे बढ़ाता है।
रक्षा निर्यात में लगातार हो रही वृद्धि इस नीति की सफलता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। भारत अब वैश्विक रक्षा बाजार में एक भरोसेमंद और सक्षम साझेदार के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है। राजस्व व्यय के लिए ₹3.65 लाख करोड़ और पेंशन के लिए ₹1.71 लाख करोड़ का प्रावधान यह दर्शाता है कि सैनिकों और पूर्व सैनिकों का कल्याण भी उतनी ही प्राथमिकता में है। ईसीएचएस में 45% की बढ़ोतरी कर ₹12,100 करोड़ का आवंटन सैनिक परिवारों के प्रति राष्ट्र की स्थायी और सशक्त प्रतिबद्धता को और मजबूती प्रदान करता है।
वैश्विक परिदृश्य पर दृष्टि डालें तो चीन का निरंतर सीमा दबाव, पाकिस्तान की अस्थिर और आक्रामक रणनीति तथा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव भारत के समक्ष जटिल और बहुस्तरीय चुनौतियां खड़ी करता है। ऐसे परिवेश में जीडीपी का लगभग 2% रक्षा पर व्यय करना भारत को विश्व के शीर्ष रक्षा व्यय करने वाले देशों की अग्रिम पंक्ति में स्थापित करता है। क्वाड और आई2यू2 जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भारत की भूमिका लगातार सशक्त हो रही है, और यह रक्षा बजट उस भूमिका को आवश्यक सैन्य आधार और विश्वसनीयता प्रदान करता है।
ऑपरेशन सिंदूर ने यह निर्विवाद संदेश दिया कि शांति की सबसे ठोस और विश्वसनीय गारंटी सशक्त, सजग और सक्षम सेना ही होती है। यह रक्षा बजट उसी सीख को संकल्प से नीति में रूपांतरित करता है। सुरक्षा और विकास के बीच संतुलन साधते हुए यह आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना को ठोस गति प्रदान करता है। विकसित भारत@2047 के दृष्टिकोण से जुड़ा यह बजट केवल वर्तमान की आवश्यकता नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की राष्ट्रीय सुरक्षा की मजबूत नींव रखता है।
₹7.85 लाख करोड़ का यह रक्षा बजट भारत की नई सामरिक पहचान का स्पष्ट घोषणापत्र है। यह पहचान भय से नहीं, आत्मविश्वास और सामर्थ्य से गढ़ी गई है। स्वदेशी हथियारों से सुसज्जित, तकनीकी रूप से सक्षम और रणनीतिक रूप से एकजुट भारतीय सेनाएं आज राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति बन चुकी हैं। हर रुपये में राष्ट्रभक्ति और हर निर्णय में अडिग संकल्प झलकता है। यह बजट स्पष्ट करता है कि भारत अब केवल परिस्थितियों पर प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि अपने भविष्य की दिशा स्वयं निर्धारित करता है।

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