जिस समाज में बच्चे भी दरिंदे बनें, वह समाज कटघरे में है

मौन गलियां, खाली इमारतें और असुरक्षित बचपन, जब बचपन ही असुरक्षित हो जाए, तो देश कैसे सुरक्षित रहेगा

Swatantra Prabhat UP Picture
Published On

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

रात की खामोशी में दबा दी गई एक नन्ही बच्ची की चीख अब पूरे देश की अंतरात्मा को हिला रही है। 18 जनवरी 2026 की वह रात केवल दिल्ली के भजनपुरा (उत्तर-पूर्वी दिल्लीइलाके की त्रासदी नहीं थीबल्कि भारतीय समाज की नैतिक पराजय का प्रतीक बन चुकी है। वर्ष की एक मासूम बच्ची को नाबालिग लड़कों, जिनकी उम्र 10, 13 और 14-15 वर्ष थी, ने बहला-फुसलाकर एक सुनसान इमारत में ले जाकर अमानवीय हिंसा का शिकार बनाया। खाने-पीने या छोटे लालच में फंसाई गई बच्ची जब घर लौटीतो उसका शरीर जख्मों से भरा थाउसकी आवाज थम चुकी थी और उसके कदम साथ छोड़ चुके थे। यह केवल एक आपराधिक घटना नहींबल्कि समाज की सामूहिक असंवेदनशीलता का भयावह प्रमाण है।

यह घटना उस झूठे विश्वास को तोड़ देती है कि अपराध केवल वयस्कों द्वारा ही किए जाते हैं। सच्चाई यह है कि अपराध उम्र से नहींवातावरण और सोच से जन्म लेता है। प्रश्न केवल यह नहीं कि अपराध किसने कियाबल्कि यह है कि ऐसी मानसिकता को पनपने का अवसर किसने दिया। जब इतनी कम उम्र में करुणासहानुभूति और भय समाप्त हो जाएतो यह पूरे सामाजिक ढांचे पर गंभीर आरोप है। यदि आज इस सच्चाई को नजरअंदाज किया गयातो आने वाला कल हर घर के लिए असुरक्षा का संदेश होगा।

इस अमानवीय घटना के बाद अभिनेत्री भूमि पेडनेकर की प्रतिक्रिया एक साधारण सामाजिक पोस्ट तक सीमित नहीं रहीबल्कि वह पूरे समाज के लिए चेतावनी बनकर सामने आई। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा, “वेक अप इंडिया! यह बच्ची हमारी सड़कों पर सुरक्षित नहीं है।" उन्होंने अपराधियों को 'मॉन्स्टर्सकहते हुए उस सोच पर प्रहार कियाजो अपराध के बाद बच निकलने का भ्रम पालती है। उनकी आवाज अकेली नहीं थी। पीड़िता के परिजन सड़कों पर उतरेन्याय की मांग के साथ प्रदर्शन हुए और प्रशासन से जवाबदेही मांगी गई। मां ने बताया कि बच्ची घर पर हैलेकिन गहरे मानसिक आघात से जूझ रही है। यह आक्रोश तभी अर्थ पाएगाजब समाज इसे क्षणिक संवेदना नहींबल्कि दीर्घकालिक जिम्मेदारी में बदले।

भारत का 77 वां गणतंत्र बनाम स्त्री विमर्श Read More भारत का 77 वां गणतंत्र बनाम स्त्री विमर्श

नाबालिग अपराधी—यह शब्द अब केवल कानूनी शब्दावली नहीं रहाबल्कि सामाजिक भय का पर्याय बन चुका है। 10 वर्ष की उम्रजिसमें खेलकल्पनाएं और सपने होने चाहिएवहां हिंसा की विकृत छाया दिखाई दी। पुलिस जांच में सामने आया कि बच्ची को लालच देकर ले जाया गया और क्रूरता की सारी सीमाएं पार की गईं। इसके पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है—अनियंत्रित डिजिटल प्रभाव। अश्लील सामग्री तक सहज पहुंचमाता-पिता की निगरानी का अभाव और विद्यालयों में यौन शिक्षा की कमी बच्चों की सोच को विकृत कर रही है। ये बच्चे भी सामाजिक उपेक्षा और गलत दिशा के शिकार हैं। प्रश्न यह है कि क्या समाज केवल सजा देकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएगा।

अमेरिकी दबाव के बीच भारतीय बजट की बड़ी परीक्षा Read More अमेरिकी दबाव के बीच भारतीय बजट की बड़ी परीक्षा

कानून की भूमिका पर अब मौन घातक है। पॉस्को कानून और भारतीय न्याय संहिता के तहत मामला दर्ज किया गयालेकिन जुवेनाइल कानून की सीमाएं बार-बार सामने आती हैं। 16 वर्ष से कम उम्र के अपराधियों पर वयस्कों जैसा मुकदमा नहीं चलताचाहे अपराध कितना भी जघन्य क्यों न हो। पीड़िता का परिवार कठोरतम दंड की मांग कर रहा है। दूसरी ओरएक दृष्टिकोण यह भी है कि दंड के साथ पुनर्वास और मनोवैज्ञानिक उपचार आवश्यक है। न्याय केवल प्रतिशोध नहींबल्कि भविष्य की सुरक्षा भी है। यदि कानून अपराध को रोकने में असमर्थ हैतो उसमें परिवर्तन अपरिहार्य है।

एक खिलाड़ी से राष्ट्र तक: मुस्तफिजुर प्रकरण और टूटा विश्वास Read More एक खिलाड़ी से राष्ट्र तक: मुस्तफिजुर प्रकरण और टूटा विश्वास

इस क्रूर घटना की जड़ें केवल कानून की खामियों में नहींबल्कि समाज की बनावट में गहराई तक फैली हैं। रिपोर्ट्स के अनुसारआरोपी बच्चों में से कुछ पीड़िता के परिवार से परिचित थेलेकिन वही भरोसा हिंसा में बदल गया। यह विश्वासघात केवल व्यक्तिगत नहींसामाजिक है। परिवारों में संवाद की कमीहिंसा से भरा मनोरंजन और संवेदनहीन माहौल बच्चों को कठोर बना रहा है। भजनपुरा जैसे इलाकों में खाली इमारतें और अंधेरी गलियां सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करती हैं। विरोध प्रदर्शन जरूरी हैंलेकिन वास्तविक परिवर्तन आत्ममंथन से ही संभव है।

इस घटना का सबसे गहरा असर पीढ़ियों तक महसूस किया जाएगा। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि इतनी कम उम्र में हुआ यौन शोषण जीवन भर का मानसिक बोझ बन जाता है। भयलज्जा और अविश्वास पीड़िता के व्यक्तित्व का हिस्सा बन सकते हैं और इसका प्रभाव भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचता है। आरोपी बच्चों के परिवार भी टूट चुके हैं। एक पिता ने स्वयं अपने बेटे को पुलिस के हवाले किया। समाज उन्हें भी अलग-थलग करेगालेकिन समाधान बहिष्कार में नहींसमझ और सुधार में छिपा है। दंड से आगे बढ़कर मानवीय उपचार की आवश्यकता है।

मीडिया की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में निर्णायक हो जाती है। एक ओर उसने घटना को उजागर कर जागरूकता बढ़ाईदूसरी ओर सनसनीखेज प्रस्तुति ने संवेदनशीलता को क्षति पहुंचाई। ग्राफिक विवरण बच्चों और समाज दोनों पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। मीडिया को यह तय करना होगा कि वह केवल खबरों का व्यापारी बनेगा या सामाजिक बदलाव का माध्यम। सुधारपुनर्वास और सकारात्मक उदाहरण समाज को नई दिशा दे सकते हैं। नैतिक पत्रकारिता आज की अनिवार्य आवश्यकता है।

अब रोकथाम की दिशा में ठोस और व्यावहारिक कदम उठाने होंगे। हर मोहल्ले में सामुदायिक सतर्कता समूहबच्चों के लिए त्वरित सहायता प्रणाली और विद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य जांच अनिवार्य होनी चाहिए। खाली भवनों और असुरक्षित स्थानों की नियमित निगरानी की जाए। माता-पिता को बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखने के लिए जागरूक और प्रशिक्षित किया जाए। कानून और तकनीक का समन्वय बने। हम अक्सर प्रतिक्रिया देते हैंरोकथाम को नजरअंदाज कर देते हैं। बदलाव घर से शुरू होगा और संवाद से मजबूत बनेगा।

यह घटना केवल दिल्ली की नहींपूरे देश के विवेक पर पड़ा आघात है। ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी त्रासदियां अक्सर चुप्पी के अंधेरे में दबा दी जाती हैं। असली और अनकही सच्चाई है लैंगिक सामाजिककरण की कमीजहां लड़कों को भावनाएं व्यक्त करने के बजाय उन्हें दबाने की सीख दी जाती हैऔर वही दबाव आगे चलकर हिंसा का रूप ले लेता है। आज जेंडर-निरपेक्ष शिक्षा की शुरुआत अनिवार्य हो चुकी है। इतनी कम उम्र में आरोपी होना हमारी शिक्षा व्यवस्था पर सीधा सवाल है—क्या हम बच्चों को केवल प्रतिस्पर्धा सिखा रहे हैं या नैतिकता भीयह एक स्पष्ट चेतावनी है। अगर हमने इसे सुनातो समाज मजबूत होगाअन्यथा मासूमियत हमेशा खतरे में रहेगी। अब समय है कि समाज एकजुट हो और हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी समझे।

यह एक पुकार है—अब चुप नहींअब समझौता नहींउठोजागो और बदलाव लाओ। भूमि पेडनेकर के आक्रोश को क्षणिक भावनात्मक प्रतिक्रिया बनकर नहींबल्कि सामूहिक शक्ति में बदलना होगा। सख्त कानून की मांग जरूरी हैलेकिन उसकी शुरुआत खुद से होनी चाहिए। बच्चों को सम्मान देना सिखाओउनकी बात ध्यान से सुनो और उनके मन की उलझनों को समझो। परिवारविद्यालय और समाज—तीनों को मिलकर यह लड़ाई लड़नी होगी। दिल्ली की उस बच्ची की पीड़ा व्यर्थ नहीं जानी चाहिए। यह लेख एक सीधी चुनौती है—क्या हम सच में एक सुरक्षित भारत बनाने के लिए तैयार हैंक्रूरता तभी रुकेगीजब हम सब जागेंगे। उम्मीद अभी भी जीवित हैक्योंकि बदलाव आज भी संभव है।

About The Author

Post Comments

Comments