यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

यह फैसला उस समय आया है जब देश लगातार यह प्रश्न पूछ रहा है कि क्या हम सचमुच समानता की ओर बढ़ रहे हैं

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महेन्द्र तिवारी

सुप्रीम कोर्ट द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने से जुड़े नए नियमों पर अंतरिम रोक लगाना केवल एक कानूनी आदेश नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज, संविधान और शिक्षा व्यवस्था के भविष्य से जुड़ा एक गहरा संकेत है। यह फैसला उस समय आया है जब देश लगातार यह प्रश्न पूछ रहा है कि क्या हम सचमुच समानता की ओर बढ़ रहे हैं या फिर समानता के नाम पर नई दीवारें खड़ी कर रहे हैं। न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि सामाजिक न्याय की भावना तभी सार्थक हो सकती है जब वह सबके लिए हो, न कि किसी एक वर्ग को केंद्र में रखकर शेष समाज को हाशिए पर डाल दे।

उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव एक कड़वी सच्चाई रही है और इसे नकारा नहीं जा सकता। अनेक घटनाएं, आत्महत्याएं और शिकायतें इस बात की गवाही देती हैं कि कमजोर और वंचित वर्गों को आज भी अपमान, उपेक्षा और मानसिक उत्पीड़न झेलना पड़ता है। इसी पृष्ठभूमि में समानता को बढ़ावा देने वाले नए नियम बनाए गए थे, जिनका उद्देश्य था कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के छात्रों को एक सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण मिले। मंशा निस्संदेह सही थी, लेकिन न्यायालय का कहना है कि मंशा के साथ-साथ मार्ग भी सही होना चाहिए।

न्यायालय के समक्ष यह प्रश्न प्रमुख रूप से उभरा कि क्या कोई नियम केवल कुछ वर्गों को ही पीड़ित मानकर चल सकता है। संविधान की मूल भावना यह कहती है कि कानून की नजर में सभी समान हैं। यदि कोई नियम यह मानकर बनाया जाए कि भेदभाव केवल एक ही दिशा में संभव है, तो वह समानता के सिद्धांत को कमजोर करता है। न्यायालय ने इसी बिंदु पर चिंता जताई कि नए नियम सामान्य वर्ग के छात्रों को पूरी तरह नजर अंदाज करते हैं और उन्हें किसी भी प्रकार के भेदभाव से संरक्षण देने की बात ही नहीं करते। इससे यह संदेश जाता है कि कुछ छात्रों का अपमान, उत्पीड़न या मानसिक शोषण कानून की दृष्टि में महत्वहीन है, जो कि स्वीकार्य नहीं हो सकता।

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एक और गंभीर चिंता नियमों की अस्पष्टता को लेकर सामने आई। भेदभाव, उत्पीड़न और रैगिंग जैसे शब्दों की स्पष्ट सीमा तय न होने से यह आशंका पैदा होती है कि उनका दुरुपयोग हो सकता है। न्यायालय ने संकेत दिया कि यदि परिभाषाएं धुंधली होंगी तो शिकायत और अपराध के बीच की रेखा मिट जाएगी। इससे न केवल निर्दोष छात्रों के फंसने का खतरा बढ़ेगा, बल्कि शिक्षा संस्थानों का वातावरण भी भय और अविश्वास से भर जाएगा। शिक्षा का उद्देश्य संवाद, प्रश्न और विचारों का आदान प्रदान है, लेकिन जब हर शब्द और हर व्यवहार पर कानूनी तलवार लटकती हो तो यह उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता।

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मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियां इस पूरे विवाद की आत्मा को उजागर करती हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि उत्पीड़न एक बड़ी बुराई है और इसे किसी भी रूप में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी पूछा कि क्या नियम केवल जाति आधारित अपमान तक ही सीमित रहेंगे। यदि किसी छात्र को उसकी भाषा, क्षेत्र या सांस्कृतिक पहचान के कारण नीचा दिखाया जाए तो क्या वह भेदभाव नहीं है। इस प्रश्न के माध्यम से न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि भेदभाव के रूप अनेक हैं और उन्हें केवल जाति के चश्मे से देखना वास्तविकता को अधूरा समझना है।

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न्यायालय ने यह भी विचार किया कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी यदि हर नीति जाति की पहचान को और गहरा करती जाए तो क्या हम सच में एक जाति विहीन समाज की ओर बढ़ रहे हैं। आज के विश्वविद्यालयों में छात्र एक साथ रहते हैं, पढ़ते हैं और सपने देखते हैं। अंतरजातीय विवाह बढ़ रहे हैं और नई पीढ़ी कई मामलों में पुरानी दीवारों को तोड़ रही है। ऐसे समय में यदि संस्थागत नीतियां फिर से कठोर वर्गीकरण पर आधारित होंगी तो यह सामाजिक एकता के लिए खतरा बन सकती हैं।

एक महत्वपूर्ण टिप्पणी यह भी रही कि आरक्षित वर्गों के भीतर भी असमानता मौजूद है। हर अनुसूचित या पिछड़ा छात्र समान परिस्थितियों से नहीं आता। कुछ के पास संसाधन हैं, कुछ के पास नहीं। यदि नीतियां इस आंतरिक विविधता को नजर अंदाज करेंगी तो वे वास्तविक जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाएंगी। इससे सामाजिक न्याय का उद्देश्य कमजोर होगा और नए प्रकार का असंतोष जन्म लेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने नए नियमों को पूरी तरह खारिज नहीं किया, बल्कि उन्हें फिलहाल रोककर पुराने नियमों को लागू रहने दिया। यह एक संतुलित कदम है। न्यायालय ने न तो भेदभाव की समस्या से इनकार किया और न ही सामाजिक न्याय की आवश्यकता को नकारा। उसने केवल यह कहा कि नियम ऐसे होने चाहिए जो न्याय, समानता और एकता तीनों को साथ लेकर चलें। केंद्र सरकार और संबंधित संस्थाओं से जवाब मांगकर न्यायालय ने यह अवसर दिया है कि वे नियमों की समीक्षा करें, उन्हें अधिक स्पष्ट, समावेशी और संतुलित बनाएं।

यह फैसला आरक्षण और समानता की बहस को एक नई दिशा देता है। अब सवाल केवल यह नहीं है कि किसे संरक्षण मिले, बल्कि यह भी है कि संरक्षण कैसे दिया जाए। क्या हम ऐसी व्यवस्था बना सकते हैं जिसमें हर छात्र, चाहे वह किसी भी वर्ग से हो, अपमान और उत्पीड़न के खिलाफ सुरक्षित महसूस करे। क्या हम ऐसी नीतियां बना सकते हैं जो शिकायत करने वाले को न्याय दें और झूठे आरोपों से निर्दोष को बचाएं। यही वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर आने वाले समय में तलाशना होगा।

शिक्षा संस्थान समाज का दर्पण होते हैं। वहां जो मूल्य पनपते हैं, वही भविष्य के समाज की नींव रखते हैं। यदि वहां भय, अविश्वास और वर्ग विभाजन का माहौल बनेगा तो उसका असर पूरे देश पर पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि समानता केवल कानून से नहीं आती, बल्कि दृष्टि और संवेदनशीलता से आती है। नियम आवश्यक हैं, लेकिन उनसे अधिक आवश्यक है यह समझ कि हर छात्र एक इंसान है, जिसकी गरिमा समान है।

अंततः यह निर्णय हमें एक चेतावनी और एक अवसर दोनों देता है। चेतावनी इस बात की कि अच्छे इरादे भी गलत ढांचे में अन्याय पैदा कर सकते हैं, और अवसर इस बात का कि हम ऐसी नीतियां गढ़ें जो सचमुच समावेशी हों। यदि इस फैसले से यह संवाद शुरू होता है कि सामाजिक न्याय और समानता को कैसे संतुलित किया जाए, तो यह केवल एक अदालती आदेश नहीं रहेगा, बल्कि एक ऐतिहासिक मोड़ साबित होगा।

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