भारतीय पत्रकारिता जगत के भीष्म पितामह थे – मार्क टली

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आधुनिक भारत की युवा पीढ़ी के अधिकांश लोग भले ही मार्क टली के नाम से परिचित न होंलेकिन रेडियो और अख़बारों के दौर की पुरानी पीढ़ी के लिए मार्क टली पत्रकारिता जगत का वह निर्भीक नाम थेजो सत्ता की आँखों में आँखें डालकर सत्य की प्रमाणिक रिपोर्टिंग करते थे। मार्क टली भले ही ब्रिटिश नागरिक थेलेकिन उनका जन्म भारत की भूमि पर हुआ था। यही कारण था कि भारतउसकी संस्कृति और यहाँ के जनजीवन उनके रग-रग में बसे थे । वे न केवल उच्च कोटि के पत्रकार थेबल्कि एक प्रभावशाली लेखक भी थे । भारत में बीबीसी हिंदी की लोकप्रियता के पीछे मार्क टली का योगदान अतुलनीय रहा है ।

एक अंग्रेज होते हुए भी हिंदी भाषा पर उनकी पकड़ इतनी मज़बूत थी कि दुनिया भर में श्रोता और पाठक उन्हें सुनने-पढ़ने के लिए बेसब्री से प्रतीक्षा करते थे । उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे जमीनी पत्रकार थे । उन्होंने भारत के दुर्गम से दुर्गम क्षेत्रों की यात्रा कर वहाँ के नागरिकों की समस्याओं को सरकार तक पहुँचाया । आपातकाल होबांग्लादेश मुक्ति संग्रामऑपरेशन ब्लू स्टारइंदिरा गांधी हत्याकांडराजीव गांधी हत्याकांड या फिर 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की घटना मार्क टली ने हर ऐतिहासिक घटनाक्रम पर निर्भीकता और निष्पक्षता के साथ सत्यपरक रिपोर्टिंग की हे ।

इसी कारण वे कई बार सरकारों और संगठनों के निशाने पर भी मार्क टली की पत्रकारिता की सबसे बड़ी खूबसूरती यह थी कि वे किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकते थे । जान का जोखिम होने के बावजूद घटनास्थल पर जाकर रिपोर्टिंग करना उनका जुनून था । वे हर बड़ी घटना पर सीधे सरकार और समाज से सवाल पूछते थे और उन्हें सरलस्पष्ट और बेबाक हिंदी में प्रस्तुत करते थे । यही शैली उन्हें दूसरों से अलग और विशिष्ट बनाती है । इसी कारण उन्हें भारतीय पत्रकारिता जगत का भीष्म पितामह” कहा जाता है । उनकी ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित कियावहीं ब्रिटिश सरकार ने भी उन्हें नाइटहुड की उपाधि से सम्मानित किया।

मार्क टली का 90 वर्ष की आयु में 26 जनवरी को भारत के 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर निधन हो गया । भले ही वे शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं रहेलेकिन उनके विचार और मूल्य पत्रकारिता के क्षेत्र में सदैव गूंजते रहेंगे। उन्होंने भारतीय जीवन-दर्शनसंस्कृति और उसके विविध रंगों को बहुत करीब से देखा और अपनी पुस्तकों में सजीव रूप से उताराजो आज भी विश्वभर में चर्चित हैं । मार्क टली के निधन से भारतीय पत्रकारिता जगत में जो रिक्तता उत्पन्न हुई हैउसे भर पाना आसान नहीं होगा।

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अरविंद रावल

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