आशा और चुनौती के बीच भारत का बजट तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ते कदमों की कसौटी
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फरवरी की पहली तारीख को पेश होने वाला आम बजट केवल आय–व्यय का लेखा-जोखा नहीं होगा, बल्कि यह उस दिशा का संकेत देगा, जिस ओर भारत अगले दशक में बढ़ना चाहता है। दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के बाद अब भारत की नजर तीसरे स्थान पर है और इसी लक्ष्य की नींव रखने वाला यह बजट माना जा रहा है। वैश्विक अनिश्चितताओं, बदलती भू-राजनीति, संरक्षणवाद के बढ़ते रुझान और अमेरिकी टैरिफ नीति जैसी चुनौतियों के बीच भारत को संतुलन साधते हुए आगे बढ़ना है। ऐसे समय में बजट से उम्मीदें भी बहुत हैं और आशंकाएं भी।
पिछले दस बारह वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था ने जिस तेजी से आकार बढ़ाया है, उसने दुनिया का ध्यान खींचा है। लगभग 4.18 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के साथ भारत आज चौथे पायदान पर है और 2030 तक जर्मनी को पीछे छोड़कर तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य रखा गया है। इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए आने वाले तीन बजट बेहद अहम माने जा रहे हैं और मौजूदा बजट उसी श्रृंखला की पहली मजबूत कड़ी बन सकता है। सरकार की मंशा स्पष्ट है कि विकास की गति को बनाए रखते हुए आत्मनिर्भर भारत, निर्यात वृद्धि और निवेश को बढ़ावा दिया जाए, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती है बढ़ता सार्वजनिक कर्ज।
देश पर कर्ज का बोझ अब एक ऐसे स्तर पर पहुंच चुका है, जहां उसे नजरअंदाज करना संभव नहीं रहा। पिछले एक दशक में कुल कर्ज 53 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर करीब 185 लाख करोड़ रुपये को पार कर चुका है और अनुमान है कि मार्च 2025 तक यह 196 से 200 लाख करोड़ रुपये के बीच पहुंच सकता है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक तथ्य यह है कि हर साल लगभग 12 लाख करोड़ रुपये केवल ब्याज चुकाने में खर्च हो रहे हैं। यानी सरकार की कमाई का एक बड़ा हिस्सा विकास कार्यों की बजाय पुराने कर्ज की भरपाई में चला जाता है। यह स्थिति लंबे समय में विकास की रफ्तार पर ब्रेक लगा सकती है।
हालांकि, यह भी सच है कि कर्ज अपने आप में बुरा नहीं होता, अगर उसका इस्तेमाल उत्पादक क्षेत्रों में किया जाए। समस्या तब खड़ी होती है, जब कर्ज का बोझ इतना बढ़ जाए कि वह नीतिगत फैसलों की स्वतंत्रता को सीमित करने लगे। भारत आज विश्व बैंक से कर्ज लेने वाले देशों में अग्रणी है और दुनिया के बड़े कर्जदार देशों में सातवें स्थान पर है। भले ही अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली जैसे देश भारत से कहीं अधिक कर्जदार हों, लेकिन भारत जैसे विकासशील देश के लिए कर्ज का संतुलन बनाए रखना कहीं ज्यादा जरूरी हो जाता है। ऐसे में इस बजट से उम्मीद की जा रही है कि सरकार कर्ज नियंत्रण की स्पष्ट रणनीति सामने रखेगी।
बजट का आकार भी अपने आप में एक बड़ा संकेत है। पिछले बारह साल में केंद्र सरकार का बजट 15 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 50 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो चुका है। इस साल इसमें करीब 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ 54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। यह बढ़ोतरी बताती है कि सरकार विकास के लिए खर्च करने को तैयार है, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या यह खर्च टिकाऊ वित्तीय ढांचे के साथ किया जाएगा। इंफ्रास्ट्रक्चर, आईटी, निर्माण, रक्षा उत्पादन और कृषि जैसे क्षेत्रों पर सरकार का फोकस पहले से रहा है और आगे भी इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ने की संभावना है। चुनौती यह है कि इन निवेशों से वास्तविक रोजगार और उत्पादन कैसे बढ़ाया जाए।
वैश्विक परिदृश्य भी इस बजट को खास बनाता है। अमेरिका और अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में संरक्षणवादी नीतियों का असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ रहा है। टैरिफ को कूटनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति ने निर्यात-आयात के समीकरणों को जटिल बना दिया है। भारत के लिए यह खतरा भी है और अवसर भी। अगर सही नीतियां अपनाई जाएं, तो भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी भूमिका मजबूत कर सकता है। इसके लिए बजट में निर्यात प्रोत्साहन, एमएसएमई को सस्ता कर्ज और तकनीकी उन्नयन जैसे कदम अहम हो सकते हैं।
रक्षा क्षेत्र भी इस बजट का एक महत्वपूर्ण पहलू रहेगा। बदलते वैश्विक हालात और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए रक्षा बजट में बढ़ोतरी की मांग लंबे समय से हो रही है। आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करता है, बल्कि रोजगार और तकनीकी विकास को भी बढ़ावा देता है। सरकार पहले ही इस दिशा में कई कदम उठा चुकी है, लेकिन बजट के जरिए इस रफ्तार को और तेज किया जा सकता है।
आम आदमी की नजर से देखें तो बजट की सबसे बड़ी कसौटी राहत की उम्मीदों पर टिकी है। आयकर दाताओं को टैक्स स्लैब में बदलाव या छूट की आस है, वहीं महंगाई से जूझ रहे मध्यम और गरीब वर्ग को रोजमर्रा की चीजों में राहत चाहिए। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने और चांदी की कीमतों में तेज उछाल ने ज्वेलरी उद्योग को संकट में डाल दिया है। सट्टेबाजी का बाजार गरम है और इसका असर आम उपभोक्ता पर भी पड़ रहा है। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती है कि वह बाजार में स्थिरता लाने के उपाय करे।
कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी इस बजट का अहम हिस्सा होंगी। देश की बड़ी आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है और ग्रामीण मांग मजबूत हुए बिना समग्र विकास संभव नहीं है। किसानों की आय बढ़ाने, सिंचाई, भंडारण और मार्केटिंग व्यवस्था को सुधारने के लिए बजट में ठोस प्रावधान जरूरी हैं। इसके साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सामाजिक क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना भी दीर्घकालीन विकास के लिए अनिवार्य है।
यह बजट ऐसे समय में आ रहा है, जब भारत आशा और निराशा के एक बड़े मोड़ पर खड़ा है। चौथी अर्थव्यवस्था बनने की दौड़ पूरी हो चुकी है, लेकिन तीसरी अर्थव्यवस्था बनने का रास्ता अभी चुनौतीपूर्ण है। कर्ज, वैश्विक अनिश्चितताएं और घरेलू मांग की मजबूती इन सबके बीच संतुलन साधना आसान नहीं होगा। फिर भी, अगर बजट विकास, वित्तीय अनुशासन और सामाजिक न्याय के बीच सही तालमेल बैठा पाता है, तो यह आने वाले वर्षों के लिए मजबूत आधार बन सकता है।
अंततः, एक अच्छा बजट वही होता है जो केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि आम लोगों के जीवन में बदलाव लेकर आए। यह बजट भारत की आर्थिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकता है, जहां उम्मीदें भी हैं और चुनौतियां भी। देश की निगाहें टिकी हैं कि सरकार इस मौके को किस तरह अवसर में बदलती है और क्या वाकई यह बजट भारत को तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर मजबूती से आगे बढ़ा पाता है।
कांतिलाल मांडोत
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