चोपन नगर पंचायत में शासनादेशों की अनदेखी ,शिलापट्टों पर नाम की राजनीति और वित्तीय जांच की मांग
नगर पंचायत में साफ तौर पर परिवाद की झलक, लोगों में आक्रोश
अजित सिंह/ राजेश तिवारी ( ब्यूरो रिपोर्ट)
नगर पंचायत चोपन एक बार फिर विवादों के घेरे में है। इस बार मामला विकास कार्यों के शिलापट्टों (पत्थरों) पर शासनादेशों के उल्लंघन और जनप्रतिनिधियों के नामों के असमान प्रदर्शन से जुड़ा है। आरोप है कि नगर पंचायत प्रशासन ने उत्तर प्रदेश शासन के स्पष्ट निर्देशों को ताक पर रखकर शिलापट्टों पर चोपन नगर पंचायत अध्यक्ष का नाम अन्य जनप्रतिनिधियों की तुलना में अत्यधिक बड़े अक्षरों में अंकित कराया है।

नगर विकास विभाग, उत्तर प्रदेश शासन द्वारा जारी विभिन्न शासनादेशों (399/2016, 6711/2021, 7158/2023, 3104/2025) और प्रमुख सचिव नगर विकास के पत्रांक 4589 (दिनांक 31 जुलाई 2025) में यह स्पष्ट निर्देश हैं कि मुख्यमंत्री एवं मंत्रियों के अतिरिक्त, अन्य सभी जनप्रतिनिधियों (सांसद, विधायक, अध्यक्ष) के नाम समान फॉन्ट साइज (आकार) में होने चाहिए। शिलापट्टों पर किसी भी अधिकारी का नाम अंकित नहीं किया जाएगा।
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इन नियमों का उल्लंघन सीधे तौर पर अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है। प्रमुख सचिव नगर विकास के पत्र के निर्देश संख्या-6 का हवाला देते हुए अब नगर पंचायत चोपन के कार्यों की विस्तृत जांच की मांग उठ रही है। उक्त निर्देश के अनुसार, यदि शिलापट्टों में शासनादेश का उल्लंघन मिलता है, तो संबंधित निकाय को दी गई समस्त धनराशि, संपन्न कार्यों और किए गए भुगतानों की गहन जांच अनिवार्य है। इसी आधार पर वित्तीय वर्ष 2024-25 सहित पूर्व वर्षों के वित्तीय आवंटन की ऑडिट की मांग तेज हो गई है।

शिकायत में यह बिंदु प्रमुखता से उठाया गया है कि जुलाई 2012 से नगर पंचायत चोपन की सत्ता एक ही परिवार के इर्द-गिर्द घूम रही है। पहले इम्तियाज अहमद, फिर उनकी पत्नी फरीदा बेगम और वर्तमान में उस्मान अली अध्यक्ष पद पर काबिज हैं। आरोप है कि इस लंबे कार्यकाल के दौरान नगर के अधिकांश शिलापट्टों पर परिवारवाद की झलक दिखी और अध्यक्ष का नाम सबसे प्रमुखता से लिखवाया गया, जो प्रोटोकॉल का उल्लंघन है।
शिकायतकर्ता ने मुख्यमंत्री कार्यालय और नगर विकास विभाग को भेजे पत्र में मांग की है कि चोपन नगर पंचायत के सभी वार्डों में लगे शिलापट्टों की वार्ड-वार जांच कराई जाए। जब तक जांच पूरी नहीं होती, तब तक निकाय को मिलने वाली आगामी धनराशि और नए आवंटन पर तत्काल रोक लगाई जाए। अब सबकी निगाहें शासन की कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि जांच होती है, तो यह न केवल शिलापट्टों के विवाद को सुलझाएगी बल्कि पिछले कई वर्षों के विकास कार्यों और उनके वित्तीय लेनदेन की सच्चाई भी सामने लाएगी।

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