लोहड़ी 13 जनवरी अग्नि, सूर्य और फसल का उत्सव लोहड़ी

परंपरा, प्रकृति और सामूहिक उल्लास का जीवंत पर्व लोहड़ी

लोहड़ी 13 जनवरी अग्नि, सूर्य और फसल का उत्सव लोहड़ी

सूर्य हमारे जीवन का मूल आधार है। उसी के प्रकाश, ताप और ऊर्जा से प्रकृति का चक्र चलता है, ऋतुएँ बदलती हैं और जीवन की निरंतरता बनी रहती है। भारतीय संस्कृति में सूर्य केवल एक खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि देवत्व का प्रतीक है। सूर्योपासना के विविध आयाम भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न पर्वों के रूप में दिखाई देते हैं। दक्षिण भारत में पोंगल, असम में माघ बिहु, बंगाल में संक्रांति, उत्तर भारत में मकर संक्रांति और पंजाब में लोहड़ी।ये सभी पर्व मूलतः सूर्य, ऋतु परिवर्तन और कृषि जीवन से जुड़े हुए हैं। इन्हीं में से लोहड़ी एक ऐसा पर्व है, जो मस्ती, उमंग और सामूहिक उल्लास का प्रतीक बन चुका है।
 
लोहड़ी का पर्व पौष मास की कड़कड़ाती ठंड में आता है, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करने की तैयारी करता है। यह वह समय होता है, जब सूर्य की गति दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर मुड़ती है। इसी खगोलीय परिवर्तन के कारण दिन धीरे-धीरे बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं। भारतीय परंपरा में इस परिवर्तन को शुभ माना गया है, क्योंकि यह शीत की जड़ता को तोड़कर नई ऊर्जा, नई चेतना और नई उम्मीद का संकेत देता है। लोहड़ी, जो मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले 13 जनवरी की रात को मनाई जाती है, इसी परिवर्तन का उत्सव है।
 
आज भी लोहड़ी पूरे उत्साह और धूमधाम के साथ मनाई जाती है, क्योंकि इसके पीछे केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन से जुड़े गहरे कारण हैं। यह पर्व सीधे-सीधे किसान जीवन से जुड़ा हुआ है। पंजाब को भारत की रोटी की टोकरी कहा जाता है। यहाँ रबी की फसल, विशेषकर गेहूं, इसी समय खेतों में लहलहा रही होती है। फसल अभी पक रही होती है, कटाई में समय होता है, लेकिन मेहनत का परिणाम साफ दिखाई देने लगता है। ऐसे समय में किसान का मन आशा, संतोष और खुशी से भर उठता है। लोहड़ी उसी भावना की अभिव्यक्ति है। यह आने वाली समृद्धि का स्वागत है और धरती, सूर्य व अग्नि के प्रति कृतज्ञता का पर्व है।
 
लोहड़ी की सबसे प्रमुख रस्म है अग्नि प्रज्ज्वलन। सूर्य ढलते ही घर के सामने या खुले स्थान पर लकड़ियाँ इकट्ठा कर आग जलाई जाती है। यह अग्नि केवल ठंड से बचने का साधन नहीं, बल्कि पवित्रता, ऊर्जा और जीवन शक्ति का प्रतीक है। लोग इस अग्नि की परिक्रमा करते हैं और उसमें रेवड़ी, मूंगफली, गजक, तिल, पॉपकॉर्न और सूखे मेवे अर्पित करते हैं। यह अर्पण नई फसल, नई मिठास और नई शुरुआत का प्रतीक होता है। लोकमान्यता है कि इससे भूमि की उर्वरता बढ़ती है और आने वाला वर्ष सुख-समृद्धि से भरपूर होता है।
 
लोहड़ी के साथ जुड़ी लोकपरंपराएँ इसे और भी जीवंत बनाती हैं। बच्चों का घर-घर जाकर लोहड़ी लूट मांगना, लोकगीत गाना और बड़ों से आशीर्वाद लेना समाज के भीतर आपसी जुड़ाव को मजबूत करता है। यह परंपरा केवल रस्म अदायगी नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच संवाद और संस्कारों के हस्तांतरण का माध्यम है। जब बच्चे हँसी-खुशी गीत गाते हुए लोहड़ी मांगते हैं और बड़े उन्हें स्नेहपूर्वक देते हैं, तो समाज में अपनत्व और सामूहिकता की भावना स्वतः पनपती है।
लोहड़ी के गीतों में दुल्ला भट्टी का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। दुल्ला भट्टी पंजाब के लोकनायक थे, जिन्हें गरीबों का मसीहा कहा जाता है। वे अमीरों से लूटकर गरीबों की मदद करते थे और अन्याय के खिलाफ खड़े रहते थे। कहा जाता है कि उन्होंने एक गरीब लड़की की शादी अपनी बहन की तरह करवाई थी। उनकी यही उदारता और साहस लोकगीतों के माध्यम से आज भी जीवित है। लोहड़ी के गीतों में दुल्ला भट्टी का स्मरण यह बताता है कि यह पर्व केवल फसल या ऋतु परिवर्तन का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, करुणा और साहस के मूल्यों का लभी उत्सव है।
 
अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या लोहड़ी केवल पंजाब का पर्व है। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से देखें तो लोहड़ी का जन्म जरूर पंजाब की मिट्टी में हुआ, लेकिन इसकी आत्मा पूरे भारत की साझा संस्कृति से जुड़ी है। सूर्य, अग्नि और फसल का उत्सव भारत के हर क्षेत्र में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। नाम अलग हैं, रस्में अलग हैं, लेकिन भाव वही है। इसलिए लोहड़ी को केवल एक प्रांतीय पर्व मानना इसकी व्यापक सांस्कृतिक भावना को सीमित करना होगा। आज महानगरों में, यहाँ तक कि पंजाब से बाहर भी, लोग लोहड़ी को पूरे उत्साह से मनाते हैं। यह इसके सार्वभौमिक स्वरूप का प्रमाण है।
 
किसानों के लिए लोहड़ी का महत्व विशेष है। यह पर्व उन्हें प्रकृति के साथ उनके रिश्ते का एहसास कराता है। किसान जानता है कि उसकी मेहनत अकेले पर्याप्त नहीं है, सूर्य का ताप, धरती की उर्वरता और मौसम की अनुकूलता भी उतनी ही जरूरी है। लोहड़ी के माध्यम से वह इन सभी शक्तियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। यह कृतज्ञता ही किसान को नई ऊर्जा देती है और कठिन परिश्रम के लिए प्रेरित करती है। यही कारण है कि लोहड़ी के समय खेतों में काम करने वाले किसानों के चेहरे पर अलग ही चमक दिखाई देती है।
 
सामाजिक दृष्टि से लोहड़ी उल्लास का पर्व है। कड़कड़ाती ठंड और घने कोहरे के बीच जब लोग जलती आग के चारों ओर इकट्ठा होकर हँसते-गाते हैं, तो जीवन की कठिनाइयाँ कुछ समय के लिए पीछे छूट जाती हैं। भंगड़ा और गिद्दा की थाप पर थिरकते कदम केवल नृत्य नहीं, बल्कि जीवन के प्रति उत्साह की अभिव्यक्ति होते हैं। यह सामूहिक आनंद समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और आपसी रिश्तों को और मजबूत बनाता है।
लोहड़ी की प्रासंगिकता आज के समय में और भी बढ़ जाती है।
 
आधुनिक जीवन की भागदौड़, तनाव और व्यक्तिवाद के बीच यह पर्व हमें सामूहिकता और प्रकृति से जुड़ाव का संदेश देता है। यह याद दिलाता है कि हमारी खुशियाँ केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों में नहीं, बल्कि साझा उत्सवों और सामूहिक अनुभवों में भी छिपी हैं। लोहड़ी का असली कारण यही है कि मनुष्य प्रकृति के चक्र को समझे, उसका सम्मान करे और समाज के साथ मिलकर जीवन का उत्सव मनाए।
 
अंत में लोहड़ी केवल आग जलाने, मिठाइयाँ खाने या नाच-गाने का पर्व नहीं है। यह सूर्य के उत्तरायण होने का स्वागत है, किसान की मेहनत का सम्मान है, लोकनायकों की स्मृति है और समाज के भीतर उल्लास व एकता का प्रतीक है। यही कारण है कि आज भी, सदियों बाद, लोहड़ी उसी जोश और उमंग के साथ मनाई जाती है। यह पर्व हमें सिखाता है कि परंपरा तभी जीवित रहती है, जब वह जीवन से जुड़ी हो और लोहड़ी इस सच्चाई का सबसे सुंदर उदाहरण है।
 
कांतिलाल मांडोत

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