नवीनतम
फीचर्ड
आखिर किस दिशा मे जा रहे आज के युवा
बीते दिनों अहमदाबाद के सेवन्थ डे स्कूल में एक 9वीं कक्षा के छात्र ने 10वीं कक्षा मे पढ़ने वाले छात्र की चाकू मारकर हत्या कर दी और उसके बाद बिना किसी पछतावे के अपने एक दोस्त व्हाट्सएप पर चैट करते हुए कह रहा कि उसने खून कर दिया है और उसे कोई परवाह नहीं है | इस घटना के बाद जहां एक तरफ पूरे स्कूल की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे वही दूसरी ओर इस बात पर भी सबका ध्यान जाना चाहिए कि इतनी छोटी सी उम्र मे इतने कुत्सित कदम कैसे उठा ले रहे , आखिर परवरिश में कहीं कमी है या बच्चों का समाजीकरण इस तरीके से हो रहा कि उन्हे सही और गलत के बीच का अंतर ही नहीं समझ मे आ रहा है| इस तरीके की वारदात कोई अकेली नहीं है बल्कि कुछ दिनों से लगातार ऐसी एक दो घटनाएं अपनी खबरों मे अपनी जगह बनाती जा रही हैं |
इनमे से कुछ और घटनाओ पर नजर डालते हैं मसलन इसी अगस्त माह मे उत्तराखंड के काशीपुर मे ही एक 9वीं के छात्र ने अपने अध्यापक को बंदूक से गोली मार दी क्यूंकी अध्यापक ने उसे दंडित किया था , उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर जिले मे छात्रों के बीच आपस मे ही लड़ाई हों गई जिससे एक छात्र की मौत और चार छात्र घायल भी हों और हम वर्ष 2017 मे दिल्ली के रेयॉन इंटरनेशनल स्कूल मे हुई घटना को कैसे भूल सकते है जिसने पूरे देश को झकझोर के रख दिया था महज सात वर्ष के छात्र प्रद्युम्न को 11 वीं के छात्र ने चाकू से हमला किया था और उसकी जान चली गई थी |
अब सबसे अहम बात ये है कि हमारे बच्चे कहाँ सुरक्षित हैं ? क्या स्कूल में बच्चों को भेजने के बाद भी अभिभावक चैन की सांस नहीं ले सकते है ? क्या प्राइवेट स्कूल जो इतनी महंगी फीस लेने के बाद भी एक सुरक्षित वातावरण नहीं दे पा रहे हैं? वही दूसरी ओर बच्चों मे इतनी आक्रामकता क्यू बढ़ रही है इस पर भी व्यापक विचार विमर्श किए जाने की आवश्यकता है | आजकल संयुक्त परिवार की संख्या विरले ही देखने को मिलती है और शहरों मे तो यह विलुप्त ही हों गया है , ऐसे मे जब छोटी उम्र में ही बच्चों के माता पिता दोनों ही नौकरीपेशा हों और दोनों देर से ही घर आए और उसके बाद बच्चों को समय ना दे पाए और उनसे यह न पूछ पाए कि आज का दिन कैसा रहा , स्कूल मे कोई परेशानी तो नहीं हुई , किसी ने तंग तो नहीं किया, यह सब नहीं पूछ पाते हैं , और इससे कहीं ना कहीं उनके मनोविज्ञान पर असर डाल रहा | लेकिन केवल माता पिता ही जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि कहीं ना कहीं समाज और सिनेमा भी जिम्मेदार हैं |
आजकल सोशल मीडिया पर ऐसे अनगिनत मात्रा मे सामग्री मिल जाएगी जो एक दूषित प्रभाव बच्चों के ऊपर डालते हैं | ऑनलाइन गेम्स जैसे कि पब जी और ब्लू ह्वैल जैसे गेम्स मे भी हिंसा को नॉर्मल तरीके से दिखाया जाता है बच्चे काल्पनिकता मे ही सही लेकिन वे हथियरों को खरीदते हैं और दुश्मनों को उन घातक हथियारों से मरते भी हैं , देखने मे ये भले ही ये साधारण लगे लेकिन इसका परिणाम उनके व्यक्तित्व मे दिखाई देने लगता है | फिल्मों ने इस तरीके की घटनाओं को बढ़ाने मे आग मे घी का काम किया है , आजकल की फिल्मों मे इस बात की होड है कि कौन कितनी ज्यादा मार काट और हिंसा दिखा सकता है , फिल्मों को R श्रेणी मे रखा जाने लगा है जिसका मतलब ही है कि पूरी फिल्म में भर भर के खून खराबा दिखाया गया है |
दर्शकों की मांग भी अब ऐसी ही फिल्मे हैं, ऐसा लगता ही कि सामाजिक और पारिवारिक फिल्मों का जमाना चला गया है और अब वह बीते दिनों की बात हों गई जिसमे कुछ संदेश छिपा हुआ रहता था | पहले फिल्मे समाज का आईना हुआ करती थी अब समाज फिल्मों का आईना हों गया है | आज ऐनमल,पुष्पा, केजीएफ और मार्को जैसी फिल्मों की भारी मांग है और इनकी कमाई अरबों मे हों रही है और कालीधर लापता, आइ वॉन्ट टू टॉक, वनवास जैसी फिल्मे कब आती है और चली जाती हैं पता ही नहीं चलता इन्हे शोज ही नहीं मिलते हैं | इसके साथ ही सोशल मीडिया ने भी बच्चों के मनोविज्ञान पर असर डाला है, किसी भी प्लेटफॉर्म की कोई निश्चित गाइडलाइंस नहीं है, अभिभावक को यह देखना चाहियर कि उनका बच्चा मोबाईल पर क्या देख रहा , कही उसके व्यवहार मे कोई परिवर्तन तो नहीं आ रहा |अतः यह आवश्यक है कि समाज के सभी जिम्मेदार लोग अपनी जिम्मेदारी समझे, जरूरत पड़े तो बच्चे की कॉउन्सलिंग करिए क्यूंकी हर एक बच्चा अनमोल है |


Comments