प्रदेश के किसान फसलों के अवशेष जलाएं नहीं बल्कि खेत में सड़ाएं, भूमि को बनाएं उपजाऊ

प्रदेश सरकार द्वारा कृषि यंत्रों में विशेष छूट, किसानों के आय में वृद्धि हेतु संकल्पित

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फसलों के उर्वराशक्ति में बढ़ावा, किसानों से अपील

अजित सिंह / राजेश तिवारी ( ब्यूरो रिपोर्ट) 

सोनभद्र / उत्तर प्रदेश-

प्रदेश का प्रतिवेदित क्षेत्रफल 235.14 लाख हे० है, जिसमे 165 लाख हे० से अधिक में खरीफ एवं रबी की फसलें उगाई जाती है। खरीफ में लगभग 58.96 लाख हे० धान जबकि रबी में लगभग 97.88 लाख हे० में गेहूँ की फसल बोई जाती है। प्रदेश में धान, गेहूँ के अतिरिक्त 21 लाख हे0 क्षेत्र में गन्ने की फसल बोई जाती है। इन फसलों की कटाई के उपरान्त पर्याप्त मात्रा में पुआल, भूसा एव गन्ने की पत्तियों के अवशेष बचते हैं। इनमें से गेहूँ/जौ फसल अवशेषों का भूसा पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है, जबकि चारे का पुआल एवं गन्ने की सुखी पत्तियां सामान्य पशुओं (गाय भैंस) के चारे साथ-साथ बिछावने के रूप में प्रयोग किया जाता है।

विगत कुछ वर्षों से मजदूरों की समस्यायें एवं आधुनिक कृषि यंत्रों यथा कम्बाइन हार्वेस्टर के प्रयोग से कटाई करने पर लगभग 01 से 1.5 फिट की ऊँचाई के फसल अवशेष अथवा सूखी पत्तियां खेत में रह जाती है जिन्हें जलाने की प्रवृत्ति प्रदेश के कतिपय जनपदों में होती रही। इन फसल अवशेषों के जलाये जाने से न केवल पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, बल्कि खेतों में मित्र कीटो, मित्र जीवों के साथ-साथ मृदा स्वास्थ्य/ उर्वरता पर प्रतिकूल प्रभाव भी परिलक्षित हो रहे हैं।

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पौधों के बढ़वार हेतु 16 पोषण तत्वों की आवश्यकता होती है, जिसमें कार्बन, हाइड्रोजन, आक्सीजन प्रकृति से प्राप्त होता है। ये तत्व पौधों के लगभग 95 प्रतिशत भाग के निर्माण में सहायक है। उक्त के अतिरिक्त नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फर तथा सूक्ष्म पोषण तत्व के रूप में लोहा, जिंक, आयरन, बोरॉन, मॉलिब्डेनम, कॉपर, क्लोरीन जैसे तत्व पौधों के बढ़वार एवं उत्पादन में सहायक होते हैं। जब किसान भाई खरीफ, रबी, जायद की फसलों की कटाई, मढ़ाई करते है तो जड़ तना, पत्तियों के रूपों में पादप अवशेष भूमि के अन्दर एवं भूमि के ऊपर उपलब्ध होते हैं।

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इनको यदि लगभग 20 किग्रा. यूरिया प्रति एकड़ की दर से मिट्टी पलटाने वाले हल से / रोटोवेटर से जुताई/पलेवा के समय मिला देने से पादप अवशेष लगभग बीस से तीस दिन के भीतर जमीन में सड़ जाते हैं जिससे मृदा में कार्बनिक पदार्थों एवं अन्य तत्वों की बढ़ोत्तरी होती हैं। फलस्वरूप फसलों के उत्पादन पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। फसल अवशेष को खेत में सडाने से फसल उत्पादन में कई लाभ होते है। एकीकृत पोषण तत्व प्रबंधन के घटक के रूप में फसल अवशेष भी अहम योगदान प्रदान करता है। फलस्वरूप मृदा में कार्बनिक पदार्थ की बढ़ोतरी से मृदा जीवाणु की क्रियाशीलता बढ़ती है जिसके कारण उत्पादन पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।

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वातावरण को विपरीत परिस्थितियों से बचाने में सहायक दलहनी फसलों के फसल अवशेष भूमि में नत्रजन एवं अन्य पोषण तत्वों की मात्रा बढ़ाने में सहायक होते है। फसल अवशेष कम्पोस्ट खाद बनाने में सहायक है जो कि मृदा की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक क्रियाओं में लाभदायक है। पादप अवशेष मल्च के रूप में प्रयोग करने में मृदा जल संरक्षण के साथ-साथ फसलों को खरपतवारों से बचाने में सहायक होते है।

मृदा के जीवांश में हो रहें लगातार ह्यस को कम करने में योगदान करता है। मृदा जलधारण क्षमता में बढ़ोत्तरी होती है। मृदा वायु संचार में बढ़ोत्तरी होती है। कृषक भाई फसल अवशेष जलाते हैं तो उनसे कई हानियां होती है। फसलों के अवशेषों को जलाने से उनके जड़ तना, पत्तियों में संचित लाभदायक पोषण तत्व नष्ट हो जाते है। फसल अवशेषों को जलाने से मृदा ताप में बढ़ोत्तरी होती हैं जिसके कारण मृदा के भौतिक, रसायनिक एवं जैविक दशा पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। पादप अवशेषों में लाभदायक मित्र कीट जलकर मर जाते हैं जिसके कारण वातावरण पर विपरीत प्रभाव भी पड़ता है। पशुओं के चारे की व्यवस्था पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। प्रदेश सरकार ने फसलों के अवशेष जलाने पर प्रतिबन्ध लगाया है।

फसलो की जड़ से कटाई हेतु हार्वेस्टिंग मशीन के साथ स्ट्रारीपर विद बाइण्डर के प्रयोग करने पर बल दिया गया है। प्रदेश सरकार इसके लिए विभिन्न कृषि यन्त्रों में किसानों को आवश्यक छूट भी दे रही है। सीटू, योजना में यन्त्रों को सुगमता से कस्टम हायरिंग केन्द्र एवं फार्म मशीनरी बैंक से यन्त्र प्राप्त कर किसान भाई खेत की पराली/अवशेष का प्रबंधन कर सकते हैं। रबी फसल के भूसे को बेचकर आय अर्जित कर सकते है। किसानों के लिए यह लाभदायक भी है। जनपदों के किसान इसका लाभ ले रहे हैं। किसानों की पराली संग्रह कर गौशालाओं में रखने हेतु सरकार ने मनरेगा अथवा वित्त आयोग से धनराशि की व्यवस्था की है। यह गौशालाओं में चारे व बिछावन के उपयोग में लाई जायेगी, जिससे खाद भी बनेगी। प्रदेश में स्थापित सीबीजी प्लान्ट एवं अन्य फसल अवशेष आधारित जैव ऊर्जा इकाइयों द्वारा धान की पराली क्रय की जाती है। किसान भाई इन्हें पराली देकर पर्यावरण, मृदा उर्वरक एवं सूक्ष्म जीव बचाव के साथ अतिरिक्त आय भी प्राप्त कर सकते हैं।

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