क्या सचमुच अहंकार से आहत है  संघ परिवार

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नयी सरकार बनने के बाद से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने ' अहंकार ' शब्द को लेकर एक अभियान शुरू कर दिया है।  संघ प्रमुख डॉ मोहन भागवत ने अपनी ' संघीय भागवत' ' में जो नया अध्याय  जोड़ा है उसका नाम है ' अहंकार '। डॉ भगवत की भागवत में  ' हाँ ' में ' हाँ ' मिलाने के लिए उनके अवर सह संघ चालक  श्रीमान इंद्रेश   कुमार जी ने भी 'अहंकार ' को लेकर अपनी व्याख्या दी है। पूरा देश इस भ्रम में है कि क्या ' अहंकार ' को लेकर  संघ और भाजपा और माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी के बीच अनबन हो गयी है ?
देश के लोग पिछले दस साल से भाजपा और उसके शीर्ष नेतृत्व के मन में उपज रहे 'अहंकार ' के पौधे को देख रहे है।

यह अहंकार अब वटवृक्ष बन गया है। संघ को तो ' अहंकार का ये वटवृक्ष अच्छा लगता है लेकिन देश की जनता को नहीं। देश की जनता ने वर्ष 2024  में जो जनादेश दिया उससे जाहिर है कि जनता ' अहंकार से आहत है। सत्ताधीशों के अहंकार का कदाचित लाभ प्रतिपक्ष को भी मिला है और संघ के असंतोष की यही असली वजह है। संघ चाहता था कि सत्ता का अहंकार भी बना रहे और भाजपा बिना बैशाखियों के सतत चलती रहे लेकिन ऐसा हो नहीं सका।

देश का विपक्ष ' अहंकार ' के इस मुद्दे को अपना हथियार बनाये इससे पहले ही संघ ने खुद इस मुद्दे को अपने हाथ में ले लिया ताकि भाजपा की लंगड़ी -लूली सरकार के सामने ' अहंकार ' कोई मुद्दा न बन जाए। जनता समझे कि संघ अब खुद ही प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्ढा के खिलाफ हो गयी है ,जबकि हकीकत ये नहीं है ।  संघ और भाजपा में कोई अनबन नहीं है ।  ये दोनों एक-दूसरे के बिना एक पल जीवित नहीं रह सकते। हाँ इतना अवश्य है कि संघ परिवार ने मोदी परिवार का मुखौटा लगाकर एक बड़ी भूल कर दी।

मोदी परिवार की अवधारणा साधारण संघियों की समझ में नहीं आयी। उन्हें लगा कि मोदी जी संघ परिवार को हड़प रहे हैं ,इसलिए वे आम चुनाव में जहाँ -तहाँ पीछे हट गए और इसका खमियाजा संघ और भाजपा को उठाना पड़ा। यदि आप गौर करें तो पाएंगे कि संघ और भाजपा का नेतृत्व इस समय जो पीढ़ी कर रही है वो खुद स्वभाव से 'अहंकारी ' है। डॉ भागवत और मोदी जी ही  नहीं बल्कि इंद्रेश कुमार भी आक्रामकता के लिए जाने जाते है। तीनों  हमउम्र हैं ।  ऐसा भ्रम    फैलाया जा रहा है कि मोशा की भाजपा ,संघ का नहीं बल्कि अपना ' हिडन एजेंडा ' चला रही है,जबकि ये सौ फीसदी गलत है।

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 भाजपा का अपना कोई एजेंडा नहीं है। आज भी संघ इतनी शक्ति रखता है कि मोदी जी को एक झटके में सत्ता से अलग कर दे लेकिन उसके पास मोदी जी जैसी आक्रामकता के साथ संघ के एजेंडे पर काम करने वाला कोई दूसरा नेता है नही।  अमित शाह का खलनायकत्व भी साफ़ झलकता है। संघ चाहता है कि जब तक उसका एजेंडा पूरा न हो जाये भाजपा येन-केन सत्ता में बनी रहे।  भले ही इसके लिए उसे आने वाले दिनों में बैशाखियाँ और ' वॉकर '  ही इस्तेमाल  क्यों न करना पड़े ?

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आपको बता दूँ कि डॉ भागवत ने अहंकार से पहले मणिपुर का मुद्दा भी उठाया जबकि मणिपुर में सत्तारूढ़ भाजपा नहीं बल्कि संघ नाकाम हुआ ।  भाजपा के सत्ता में आते ही मणिपुर में पूर्णकालिक प्रचारक की नियुक्ति की गयी थी। बी भगैया जैसे प्रचारक वहां तैनात किये गए थे ,लेकिन मणिपुर में संघ का पासा उलटा पड़ गया और जिस तरह की हिंसा हुई उसे संघ अपने पक्ष में भुना नहीं पाया। संघ यदि सचमुच मणिपुर की हिंसा से द्रवित होता तो डॉ भागवत जिस तरह से आज मोशा सरकार को हिदायत या उपदेश दे रहे हैं

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पिछले साल ही दे सकते थे। प्रधानमंत्री को मणिपुर जाने से यदि किसी ने रोका तो वो संघ ही है। मणिपुर समेत पूर्वोत्तर में अपने पांव जमाने में नाकाम रहा संघ अब चाहता है कि   वहां हालात मामूल पर आएं और शायद इसीलिए वहां के विकास के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे सुदर्शन और ऊर्जावान संसद को पूर्वोत्तर मामलों का मंत्री बनाया गया है।

आम चुनाव में भाजपा के कमजोर होकर उभरने से भाजपा के प्रति जनता में अनास्था और न बढ़े इसलिए संघ ने अपना पैंतरा बदलते हुए न सिर्फ मणिपुर का राग अलापा बल्कि ' अहंकार 'को भी मुद्दा बनाया। संघ लगातार भ्रम पैदा करने की कोशिश करता रहता है ।  संघ प्रमुख गोरखपुर में उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ गुफ्तगू कर ये भ्रम भी फैलाना चाहता है कि संघ मोदी का विकल्प खोज रहा है। जबकि मोदी का विकल्प खुद मोदी जी ही है।  वे हिटलर की राह पर चलते हुए बहुत आगे जा चुके हैं और संघ यही चाहता भी था । दरअसल मोदी जी ने वो कर दखाया है जो गुरु गोलवलकर भी नहीं दिखा पाए थे।

 मोदी से पहले अटल बिहाई बाजपेयी को भी संघ ने मौक़ा दिया था किन्तु प्रधानमंत्री के रूपमें वे मोदी की तरह संघ की कार्यसूची पार काम नहीं कर पाए उलटे उन्होंने सत्ता में वापसी का मौका भी गंवा दिया। आने वाले दिनों में आप देखेंगे कि भाजपा  और संघ मिलकर देश को उसी दिशा में आगे धकेलेंगे जो पहले से तय है। संसद में शक्ति कम होने की वजह से संघ और भाजपा की यात्रा की रफ्तार थोड़ी धीमी जरूर हो सकती है लेकिन ये रुकने वाली नहीं है। संघ आम चुनाव में घायल हुए मोदी और अमित शाह की जोड़ी की मरहम -पट्टी खुद ही कर उन्हें पीछे से ताकत देने का काम करती रहेगी और ये भ्रम भी बनाये रहेगी की भाजपा और संघ में अनबन है।

ये बात सही है कि माननीय  मोदी जी जैसे  कुछ नेता  अत्यधिक अहंकार के कारण विश्व का परम् सत्य जाने की कोशिश करते हैं । वे खुद को अविनाशी घोषित  कर नर से नारायण बनने की इच्छा करते हैं ।  परमात्मा से भी ऊपर ब्रह्म बनना चाहते हैं ।लेकिन  स्वयं के भीतर की आत्मा को परमात्मा मानते है।  लेकिन उन्हें भी  अंत में ज्ञात हो जाता है कि उसकी ही आत्मा ,परमात्मा है वह ही ब्रह्म है तथा वही नर है वही नारायण है।
मोदी जी को अब तब तक अविनाशी बने रहना पडेगा जब तक की वे स्वयं ही अपने आपको भस्म नहीं कर लेते।

उन्हें नाचना सिखाने वाले ईश्वर किस   मोहनी बनकर खुद उनसे ही उनके सर पर उनका हाथ रखवा कर उन्हें भस्म  होने के लिए विवश कर देंगे। ये न संघ जानता है और न दूसरा कोई। एक बात और की भाजपा को रामजी ने कोई नुक्सान नहीं पहुंचाया ,भाजपा को जो नुकसान पहुंचा है वो इस देश की जनता की और से पहुंचा है ,वो भी जनादेश के रूपमे। इंद्रश कुमार का ये कहना बिलकुल गलत है कि रामजी ने भाजपा को या अहंकारियों  को 242  सीटों पर लेकर दण्डित किया है। रामजी तो बड़े उदार हैं। फिर भी इंद्रेश जी को लगता है कि राम जी ने भाजपा को इंद्र के पुत्र जयंत की तरह सीता जी के पेअर में चैंच मारने की सजा एक नयन कर दी है ,तो ठीक है। वैसे डॉ भागवत हों या इंद्रेश कुमार दोनों ने रामचरित मानस पढ़ी है ।  वे जानते हैं कि -

 नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं।

 प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं।।
माननीय नरेंद्र दामोदर दास मोदी भी इसका अपवाद नहीं हैं भले ही वे अपने आपको बायलोजिकल पैदाइश न मानते हों। वैसे आप कहीं लिखकर रख लीजिये कि मोदी जी को अहंकार से बचने कि सलाह देने वाले इंद्रेश जी ही मोदी कि पसंद से संघ के अगले अलम्बरदार बनने वाले हैं।
राकेश अचल

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