रील की लत से बीमार होता युवा

अगर तुमने एक बार सैड वीडियो देखी, तो अगले 20 वीडियो उसी मूड की होंगी

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सोशल मीडिया पर रील का बुखार दिन रात बढ़ता जा रहा है ऐसे में वो युवा वर्ग जिसने रील को ही अपना कैरियर मान लिया है बीमार होता जा रहा, 15  सेकंड की रील के कारण अनगिनत बीमारी का शिकार होता जा रहा है। इस पर शीघ्र ही प्रभावी कदम उठाने होंगे नहीं तो स्थिति आगे चलकर बहुत बिगड़ सकती है। पहले हम खाना खाते वक्त बात करते थे। अब खाना ठंडा हो जाता है, लेकिन रील नहीं रुकती।

15 सेकंड की वीडियो ने युवा दिमाग को ऐसे पकड़ा है कि घंटों निकल जाते हैं और पता भी नहीं चलता। रील्स डोपामिन का शॉर्टकट हैं। हर नई वीडियो पर दिमाग को छोटा सा "रिवॉर्ड" मिलता है। असल जिंदगी की मेहनत वाले काम - पढ़ाई, प्रोजेक्ट, रिश्ते - में रिजल्ट देर से मिलता है। दिमाग आसान वाला रास्ता चुन लेता है। ध्यान का बिखराव- 2 मिनट से ज्यादा एक काम पर टिकना मुश्किल लगने लगता है। नींद का बिगड़ना रात 2 बजे तक स्क्रॉल करना और सुबह उठ न पाना आम हो गया है।

तुलना का जहर- दूसरों की हाईलाइट रील देखकर अपनी जिंदगी फीकी लगने लगती है। लक्षण जो दिखने लगे हैं- यह सिर्फ "टाइम वेस्ट" नहीं रहा। अब ये मानसिक सेहत पर दिखने लगा है। बिना वजह चिड़चिड़ापन और बेचैनी जब फोन पास न हो- अकेले बैठे रहना, दोस्तों से मिलने का मन न करना - पढ़ाई या काम में रुचि कम होना, प्रोक्रास्टिनेशन बढ़ना, आत्मविश्वास में गिरावट क्योंकि हर कोई "परफेक्ट" लग रहा है। कई युवा खुद कहते हैं - "पता है नुकसान हो रहा है, पर छोड़ नहीं पाता"। यही लत की निशानी है। अगर तुमने एक बार सैड वीडियो देखी, तो अगले 20 वीडियो उसी मूड की होंगी। तुम्हारा कंट्रोल कम, प्लेटफॉर्म का कंट्रोल ज्यादा।

दूसरा कारण है खालीपन। असली उपलब्धि, मेहनत, बातचीत में टाइम लगता है। रील्स तुरंत एंटरटेनमेंट देती हैं। खाली दिमाग सबसे पहले वहीं जाता है। इससे निकलने का रास्ता बहुत ही आसान है लेकिन लोग प्रयास ही नहीं करते। पूरी तरह छोड़ना जरूरी नहीं, पर कंट्रोल वापस लेना जरूरी है। स्क्रीन टाइम को देखो- फोन में ही पता चल जाता है कितना वक्त जा रहा है। नंबर देखकर झटका लगता है। रील के लिए टाइम फिक्स करो- दिन में 20 मिनट, बस। बाकी टाइम ऐप लॉक कर दो। रिप्लेसमेंट ढूंढो-  जो खालीपन रील भरती है, उसे किताब, जिम, दोस्ती, कोई स्किल से भरो। खाली मत छोड़ो।

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नोटिफिकेशन बंद करो- हर नॉटिफिकेशन दिमाग को खींचता है। हिम्मत करके बंद कर दो। हाथ से फोन दूर रखो सोने से 1 घंटा पहले और उठने के 1 घंटे बाद फोन मत छुओ। इसके लिए अपने आप से ही सवाल करना होगा। रील देखकर तुम्हें क्या मिल रहा है? 1 घंटे बाद कैसा महसूस होता है - रिलैक्स या खालीपन। अगर जवाब "खालीपन" है, तो समझो ये एंटरटेनमेंट नहीं, एस्केप है। दिमाग एक मसल है। अगर तुम उसे सिर्फ 15 सेकंड के शॉट्स खिलाओगे, तो वो लंबी रेस नहीं दौड़ेगा। कॉलेज, करियर, रिश्ते - सब लंबी रेस हैं।

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रील बुरा नहीं है। बुरा है जब रील तुम्हारी जिंदगी चला रही हो। कंट्रोल वापस लो, वरना 5 साल बाद पछतावा ज्यादा और समय कम बचेगा। तुम्हारे हिसाब से रील्स पर सबसे ज्यादा टाइम कहां चला जाता है - एंटरटेनमेंट, इंफो, या बस स्क्रॉल करने की आदत में। आज के दौर में सोशलमीडिया पर मानसिक स्वास्थ्यक्षको लेकर चर्चा शुरू हो चुकी है।

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मनोवैज्ञानिक बातों को रील के जरिये 30 सेकंड के वायरल कंटेंट में बदल दिया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका नतीजा यह हो रहा है कि युवा पीढ़ी थेरेपी स्पीक में घिरती चली जा रही है, लेकिन असली खतरनाक है 30 सेकंड की रील थेरेपी विशेषज्ञों के अनुसार, सोशल मीडिया पर 30 सेकंड की रील देखने या इंस्टाग्राम पोस्ट को कोट करने से किसी व्यक्ति की मानसिक परेशानी या अंदर की भावनात्मक उलझन ठीक नहीं हो जाती।

रील ने गंभीर मनोवैज्ञानिक बातों को एक बिकने वाली चीज बना दिया है। भावनात्मक समझ के मामले में वे कमजोर होते जा रहे हैं। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन ने 1,055 जेन-जी पर एक सर्वे किया गया। इसमें हर चार में से एक युवा ने माना कि एक महीने में उनके अच्छे दिनों के मुकाबले बुरे दिन ज्यादा होते। हैं। काम करने वाले लगभग 40 फीसदी युवा यह स्वीकार करते हैं कि उन्हें हर हफ्ते कई बार गंभीर चिंता या डिप्रेशन के लक्षण महसूस होते हैं। पिछली पीढ़ियों के मुकाबले आज के युवाओं में तनाव या अवसाद की बात खुलकर स्वीकार करने और मदद मांगने की। संभावना सबसे ज्यादा देखी गई है।

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