युवाओं के भविष्य पर डाका: पेपर लीक, अरबों का खेल और 'उम्मीदों' का अंतहीन स्कैम

 कोचिंग हब: असफलता को भुनाने वाला बाज़ार  बुनियाद पर चोट: सरकारी बनाम निजी स्कूलों का गोरखधंधा

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आज के दौर में देश के युवाओं के साथ होने वाला सबसे बड़ा और संगठित स्कैम 'पेपर लीक' बन चुका है। यह संकट सिर्फ एक परीक्षा के रद्द होने भर का नहीं है, बल्कि इसके पीछे करोड़ों युवाओं के सपनों, समय और उनके परिवारों की गाढ़ी कमाई की सुनियोजित लूट का एक ऐसा चक्रव्यूह है, जिसका सच बेहद खौफनाक है।

 100 करोड़ का गणित: आवेदन के नाम पर धन-उगाही

यदि पुलिस और चुनिंदा शिक्षक भर्तियों को छोड़ दिया जाए, तो अमूमन किसी भी विभाग में 500 से अधिक पद नहीं निकलते। चतुर्थ श्रेणी या लेखपाल जैसी भर्तियों का उदाहरण लें, तो चंद सौ या हजार पदों के लिए 25 लाख से लेकर 1 करोड़ तक आवेदन आते हैं। यह स्थिति स्वतः स्पष्ट करती है कि 99% से अधिक आवेदकों के हिस्से सिर्फ असफलता ही आनी है।

लेकिन खेल इसके पीछे के 'परीक्षा शुल्क' का है। यदि प्रति छात्र औसतन 400 रुपये भी फीस मानी जाए और 25 लाख आवेदन आएं, तो यह रकम **100 करोड़ रुपये** बनती है।

तमाशा देखिए:पेपर लीक होता है, परीक्षा रद्द होती है। युवा अपना समय, किराया और उम्मीदें गंवाकर वहीं का वहीं खड़ा रह जाता है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में सरकारी आयोग के अध्यक्ष को अपना पूरा वेतन मिल चुका होता है और परीक्षा कराने वाली प्राइवेट एजेंसियां अपना 80% तक भुगतान डकार चुकी होती हैं। नुकसान हुआ तो सिर्फ देश के युवा का।

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 कोचिंग हब: असफलता को भुनाने वाला बाज़ार

इस बड़े असफल समूह को निशाना बनाकर आज देश में अरबों रुपयों का 'कोचिंग व्यवसाय' खड़ा किया गया है। कोचिंग संस्थान भी भली-भांति जानते हैं कि नौकरियां चुनिंदा लोगों को ही मिलनी हैं। इसलिए, अपनी साख बचाने के लिए ये संस्थान दोहरी चाल चलते हैं:

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 परीक्षा से पहले: कई बार व्यवस्था में सेंध लगाने या अनुचित लाभ उठाने के प्रयास। 
परीक्षा के बाद: गड़बड़ी का बढ़-चढ़कर प्रचार, ताकि जब छात्र असफल हों, तो उनका ध्यान कोचिंग की नाकामी से हटकर व्यवस्था की कमी पर चला जाए।

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यह सरकारी तंत्र को क्लीन चिट देने का बहाना नहीं है, बल्कि यह समझने का जरिया है कि युवा चारों तरफ से बिचौलियों से घिरा हुआ है।

 बुनियाद पर चोट: सरकारी बनाम निजी स्कूलों का गोरखधंधा

इस स्कैम की जड़ें और गहरी तब हो जाती हैं जब हम स्कूली शिक्षा के स्तर पर देखते हैं। सरकारी विद्यालयों के विलय (Merger) की नीति एक बड़ी सामाजिक समस्या बन रही है। गाँवों के स्कूल बंद होने से गरीब परिवारों के बच्चे, विशेषकर बालिकाएं, शिक्षा से महरूम हो रही हैं, क्योंकि सुरक्षा कारणों से लोग बेटियों को दूर के स्कूलों में भेजने से कतराते हैं।

दूसरी ओर, निजी स्कूलों का एक बड़ा गोरखधंधा चल रहा है। अधिकांश बड़े निजी शिक्षण संस्थानों के पीछे किसी न किसी रसूखदार 'नेताजी' का हाथ होता है। अब ज़रा सोचिए:

एक तरफ सरकारी स्कूल से सिर्फ "साक्षर होने वाला गरीब का बच्चा है।
 दूसरी तरफ महंगे निजी स्कूल से "शिक्षित" होने वाला अमीर का बच्चा है।

जब इन दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा (Competition) कराई जाएगी, तो परिणाम पहले से तय है। अमीर और अमीर होता जाएगा, और गरीब का बच्चा उसी दुष्चक्र में फंसा रहेगा।

  राजनीति का मौन और अंतिम धोखा

यदि इन तमाम झंझावातों, असमानताओं और अभावों को पार करके कोई गरीब या मध्यमवर्गीय युवा भर्ती परीक्षा तक पहुंच भी जाता है, तो वहाँ उसे 'पेपर लीक' का अंतिम और सबसे क्रूर धोखा मिलता है। फॉर्म भरने से लेकर कोचिंग की फीस और शहरों में रहने के खर्च के नाम पर लाखों रुपये गंवाने के बाद युवाओं के हिस्से केवल निराशा या फिर से 'जीरो' से तैयारी करने की मजबूरी आती है।

इस पूरे तंत्र में सिस्टम के शीर्ष पर बैठे लोग सुरक्षित हैं—आयोग के अध्यक्ष अपना वेतन लेते हैं, राजनेता रैलियों में अपनी पीठ थपथपाते हैं और निजी एजेंसियां अपना मुनाफा समेटती हैं। पेपर लीक जैसे संवेदनशील और युवाओं के जीवन को तबाह करने वाले मुद्दों पर सत्ताधीशों का मौन या ढीला रवैया यह साफ संकेत देता है कि इस सामूहिक लूट का कोई न कोई सिरा व्यवस्था के रक्षकों को भी पोषित कर रहा है। यह धोखा सिर्फ एक छात्र को नहीं, बल्कि सीधे इस देश के भविष्य को दिया जा रहा है।

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