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स्मार्ट शहर में गौमाता...!
स्मार्ट शहर की चकाचौंध में, खो गई गौमाता, सीमेंट की सड़कों पर, किसे याद है वो नाता।
स्मार्ट शहर की चकाचौंध में, खो गई गौमाता,
सीमेंट की सड़कों पर, किसे याद है वो नाता।
पहले आँगन में बंधकर, घर की शान कहाती,
ट्रैफिक में भटकती छाया, बाधा बन है जाती।
पहली रोटी उसके नाम की, परंपरा थी प्यारी,
पिज़्ज़ा-बर्गर युग में, वह बातें लगती हैं भारी।
गोबर से लिपते जो घर, अब डर्टी कहलाते हैं,
एसी कमरों में बैठे हम, संस्कार भूल जाते हैं।
गौ-रक्षक की बातें गूंजें, भाषणो-अखबारों में,
भूखी गायें ढूंढती हैं रोटी, कूड़े ढेर-किनारों में।
नारे ऊँचे व भावनाएँ भी, सच थोड़ा कड़वा है,
सेल्फी में जो दिखता प्यार, धरा पे कम सा है।
कृष्ण की वो बंसी रोती है, गोकुल भी है हैरान,
जहाँ चरती थीं गायें, वहाँ पे मॉल और दुकान।
स्मार्ट बनने की होड़ में, इतने आगे हैं बढ़ आए,
गौमाता को भूलें, खुद को आधुनिक बतलाए।
सोचो, विकास की दौड़ में, क्या-2 'पीछे' छूटा,
जिसने हमें जीवन दिया, वही रास्ते में है छूटा।
स्मार्ट शहर की माया में, सवाल खड़ा है होता,
क्या सच आगे बढ़े, इंसानियत का दम घुटता?


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