भाजपा का बढ़ता जनादेश: विपक्ष के लिए आत्ममंथन का समय

केवल विरोध की राजनीति करते रहना विपक्ष को और अधिक कमजोर ही करता जाएगा

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पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणामों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि नए युग का भारतीय मतदाता अब जात-पातनफरत और अहंकार की राजनीति से ऊपर उठ चुका है। आज का मतदाता विकास और सुरक्षा को सर्वोपरि मानता है। वह अपने गांवजनपदजिला पंचायतविधानसभा और लोकसभा में ऐसे प्रतिनिधि को चुनना चाहता है जो उसके जीवन स्तर को बेहतर बनाने और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की ठोस गारंटी दे सके। इन चुनाव परिणामों को यदि खुले मन से विश्लेषित किया जाएतो यह भी स्पष्ट होता है कि हारने वाले कई दल अपनी पराजय का ठीकरा चुनाव आयोगईवीएम या सरकारी तंत्र पर फोड़ने का प्रयास करते हैं। किंतु यह केवल आत्मसंतोष का एक माध्यम है। वास्तविकता यह है कि यदि ये दल ईमानदारी से आत्ममंथन करेंतो उन्हें अपनी हार के कारण अपने भीतर ही मिल जाएंगे।

वर्तमान भारतीय राजनीति की यह विडंबना बन चुकी है कि जनप्रतिनिधि अपने ही क्षेत्र में जनता द्वारा नकारे जाने के बाद भी अपनी कमियों का आत्मविश्लेषण करने के बजाय बाहरी कारणों को दोष देते हैं। यही कारण है कि विपक्षी दल लगातार चुनाव दर चुनाव कमजोर होते जा रहे हैं। बिना गंभीर आत्ममंथन के केवल औपचारिक समीक्षा कर पुनः चुनावी मैदान में उतरना उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हो रही है। इसके विपरीतभारतीय जनता पार्टी की सफलता का प्रमुख आधार उसका सतत आत्ममंथन और संगठनात्मक अनुशासन है। भाजपा की कार्यप्रणाली शुरू से ही ऐसी रही है कि वह छोटे से छोटे चुनावी पराजय का भी गहन विश्लेषण कर भविष्य की रणनीति तैयार करती है। इस दल में व्यक्ति से अधिक संगठन को महत्व दिया जाता हैजिसके कारण एक सामान्य कार्यकर्ता भी उच्च पदों तक पहुंचकर अपनी पहचान बना सकता है।

यह भी स्पष्ट है कि जातिधर्मधनबल या बाहुबल के सहारे मतदाता को सीमित समय तक ही प्रभावित किया जा सकता है। यदि किसी राजनीतिक दल को दीर्घकाल तक जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता बनाए रखनी हैतो उसे विकास और सुरक्षा की ठोस गारंटी बनना होगा। आज का मतदाता जागरूक है और वह राजनीतिक दलों की नीतियों तथा उनके व्यवहार का गहराई से आकलन करता है। वर्तमान समय में नफरत और अहंकार की राजनीति के लिए कोई स्थान नहीं बचा है। राष्ट्र का विकास और सुरक्षा ही अब राजनीति का केंद्र बिंदु बन चुके हैं। जो भी दल इन मूल मुद्दों से भटकता हैउसे जनता अपने मत के माध्यम से नकार देती है। वैश्विक अस्थिरता और राष्ट्रीय चुनौतियों के इस दौर में विपक्ष से यह अपेक्षा की जाती है कि वह राष्ट्रहित के मुद्दों पर सरकार के साथ खड़ा रहे। किंतु जब विपक्ष संकीर्ण राजनीति करता हैतो जागरूक मतदाता उसे भली-भांति पहचान लेता है।

लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष का होना अत्यंत आवश्यक हैलेकिन दुर्भाग्यवश वर्तमान परिदृश्य में विपक्ष निरंतर कमजोर होता जा रहा है। इसका प्रमुख कारण सकारात्मक राजनीति के स्थान पर नकारात्मकता और व्यक्तिवाद को प्राथमिकता देना है। आज आवश्यकता इस बात की है कि विपक्षी दल भाजपा के बढ़ते जनादेश से ईर्ष्या करने के बजाय उससे सीख लें। उन्हें जनता के बीच जाकर यह विश्वास दिलाना होगा कि वे भी विकास और जनहित के लिए प्रतिबद्ध हैं। साथ हीराष्ट्रहित के मुद्दों पर एकजुट होकर सरकार के कार्यों पर रचनात्मक निगरानी रखना भी उनकी जिम्मेदारी है। अंततःयह कहना उचित होगा कि भाजपा का बढ़ता जनादेश विपक्ष के लिए एक स्पष्ट संदेश है यदि राजनीति में प्रासंगिक बने रहना हैतो आत्ममंथनसकारात्मक सोच और जनहित को सर्वोपरि रखना ही होगा। अन्यथाकेवल विरोध की राजनीति करते रहना विपक्ष को और अधिक कमजोर ही करता जाएगा।

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अरविंद रावल

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