बढ़ती महंगाई, बढ़ते खर्चे कर रहे आम आदमी की जेब ढीली
अन्यथा बढ़ते खर्चे न केवल जेब ढीली करेंगे, बल्कि सपनों को भी कुचलते जाएंगे
संपादक/लेखक: राजीव शुक्ला
मजदूर दिवस के मौके पर देश के करोड़ों आम नागरिकों को महंगाई का नया झटका लगा है। आज से कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में औसतन ₹993 की भारी बढ़ोतरी कर दी गई है। दिल्ली में 19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर की कीमत अब ₹3,071.50 हो गई है। हालांकि घरेलू 14.2 किलो सिलेंडर की कीमत में फिलहाल कोई बदलाव नहीं हुआ है, लेकिन अप्रत्यक्ष प्रभाव से रसोई का खर्चा और दैनिक जरूरतों का बोझ बढ़ना तय है।
यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव, स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में संकट और ईरान-अमेरिका-इजराइल संघर्ष के कारण आई है। भारत अपना बड़ा हिस्सा कच्चा तेल और एलपीजी इसी क्षेत्र से आयात करता है। वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में उछाल आने से घरेलू बाजार पर दबाव बढ़ गया है। मार्च 2026 में खुदरा महंगाई दर (CPI) बढ़कर 3.40 प्रतिशत हो गई, जो पिछले एक साल में सबसे ऊंचा स्तर है। खाद्य महंगाई भी 3.87 प्रतिशत पर पहुंच गई है।
आम आदमी की जेब पर क्या असर?
छोटे होटल, ढाबे और रेस्टोरेंट: चाय, नाश्ता, खाना बनाने में इस्तेमाल होने वाले कमर्शियल सिलेंडर महंगे होने से खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं। कई छोटे व्यापारी पहले से ही लागत बढ़ने से जूझ रहे थे। परिवहन और माल ढुलाई: ईंधन की महंगाई से ट्रक, बस और ऑटो का खर्च बढ़ेगा, जिसका सीधा असर किराने की चीजों, सब्जी-फल और दूध पर पड़ेगा।
मध्यम वर्गीय परिवार:घरेलू सिलेंडर पर सब्सिडी बनी हुई है, लेकिन रेस्तरां, बाहर का खाना और अप्रत्यक्ष महंगाई से मासिक बजट बिगड़ रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन के खर्चे पहले ही बढ़े हुए हैं। मजदूर वर्ग :दिहाड़ी और सैलरी वाले लोगों के लिए खाने-पीने का खर्चा बढ़ना सबसे बड़ा बोझ है। सरकार का पक्ष है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार की मजबूरी है और रूस से सस्ता तेल खरीदने तथा रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व से कुछ राहत दी जा रही है। विपक्ष इसे “जनविरोधी” बता रहा है और कह रहा है कि महंगाई पर काबू नहीं पा रही सरकार।
व्यापक चुनौती
बढ़ती महंगाई केवल एलपीजी तक सीमित नहीं है। गर्मी की लहर, अनियमित मानसून की आशंका और वैश्विक ऊर्जा संकट ने मिलकर आम आदमी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पिछले कुछ महीनों में कमर्शियल सिलेंडर पर कई बार बढ़ोतरी हो चुकी है — मार्च और अप्रैल में भी सैकड़ों रुपये का इजाफा देखा गया।
बढ़ती महंगाई और बढ़ते खर्चे सचमुच आम आदमी की जेब ढीली कर रहे हैं। जब एक मजदूर या छोटा दुकानदार अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा बस खाने-पीने और ईंधन पर खर्च कर रहा हो, तब विकास और प्रगति के दावे कितने खोखले लगते हैं। महंगाई कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है — यह नीतिगत फैसलों, आयात निर्भरता और वैश्विक भू-राजनीति का नतीजा है।
सरकार को अब ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को असली प्राथमिकता देनी चाहिए। नवीकरणीय ऊर्जा (सौर और पवन) को तेज गति से बढ़ावा, घरेलू तेल-गैस अन्वेषण, हाइड्रोजन मिशन और पाइप्ड नैचुरल गैस का विस्तार — ये कदम जरूरी हैं। सब्सिडी का स्मार्ट और टारगेटेड उपयोग भी आम आदमी को राहत दे सकता है।
मजदूर दिवस पर हम श्रम की गरिमा की बात करते हैं, लेकिन जब श्रमिक की कमाई महंगाई की आग में जल रही हो तो यह सम्मान खोखला हो जाता है। समय आ गया है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण के लिए ठोस रणनीति बनाएं। केवल अंतरराष्ट्रीय कारणों को दोष देने से काम नहीं चलेगा।
आम आदमी की जेब को मजबूत बनाने के लिए नीतिगत स्थिरता, ऊर्जा विविधीकरण और उत्पादन बढ़ाने पर जोर देना होगा। तभी ‘सबका साथ, सबका विकास’ का मंत्र सार्थक होगा। अन्यथा बढ़ते खर्चे न केवल जेब ढीली करेंगे, बल्कि सपनों को भी कुचलते जाएंगे।


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