जंजीरो में प्रेस,लोकतंत्र का चौथा स्तंभ क्यों रहा है टूट ?
विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026 में भारत 157वें स्थान पर – सवाल है, क्या हम सच सुनने को तैयार हैं?
संपादक/लेखक: राजीव शुक्ला
विश्व की सबसे बड़ी लोकतंत्र व्यवस्था में प्रेस की स्वतंत्रता लगातार सिकुड़ती जा रही है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) द्वारा जारी विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026 में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर पहुंच गया है। पिछले वर्ष 151वें स्थान से छह पायदान की यह गिरावट महज एक आंकड़ा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नींव पर उठता सवाल है।
आरएसएफ की रिपोर्ट में भारत को 'बहुत गंभीर' स्थिति वाली श्रेणी में रखा गया है। रिपोर्ट स्पष्ट कहती है – पत्रकारों के खिलाफ बढ़ती हिंसा, मीडिया स्वामित्व का अत्यधिक केंद्रीकरण, सरकारी कानूनों का दुरुपयोग और राजनीतिक संरेखण प्रेस स्वतंत्रता को गहरी चोट पहुंचा रहे हैं। 2014 से सत्ता में आई सरकार के दौरान बड़े मीडिया घरानों के साथ सत्ता की निकटता ने स्वतंत्र पत्रकारिता को चुनौती दी है
आरएसएफ ने इस वर्ष कानूनी संकेतक में भारत की स्थिति में भारी गिरावट दर्ज की है। राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी कानून, सूचना प्रौद्योगिकी नियम और डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट जैसे प्रावधानों का इस्तेमाल आलोचनात्मक आवाजों को दबाने के लिए हो रहा है। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के पत्रकार सबसे अधिक असुरक्षित हैं। धमकियां, हमले और मुकदमों की झड़ी लगातार जारी है, जबकि दोषियों पर कार्रवाई न के बराबर।
मीडिया स्वामित्व की सांद्रता भी चिंता का विषय है। कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों के हाथ में समाचार संस्थान केंद्रित होते जा रहे हैं, जिनकी सत्ता से निकटता स्पष्ट है। परिणामस्वरूप, कई चैनल और समाचार पत्र सरकारी विज्ञापनों की निर्भरता और राजनीतिक दबाव में स्व-संयम बरतने को मजबूर हैं। 'गोदी मीडिया' शब्द अब आम बोलचाल का हिस्सा बन चुका है।
पड़ोसी देशों से पिछड़ना
भारत अब पाकिस्तान (153वें), बांग्लादेश (152वें) और श्रीलंका (134वें) जैसे पड़ोसियों से भी पीछे है। नेपाल और भूटान भी बेहतर स्थिति में हैं। यह तुलना भारत की लोकतांत्रिक छवि के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
हालांकि सरकार का तर्क है कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संवैधानिक रूप से सुरक्षित है और मीडिया विविधतापूर्ण है, लेकिन वास्तविकता अलग कहानी बयान करती है। विपक्षी दलों के शासनकाल में भी दबाव के उदाहरण मिलते हैं, किंतु पिछले दशक में इसकी व्यवस्थित और व्यापक प्रकृति बढ़ी है।
प्रेस स्वतंत्रता लोकतंत्र की रीढ़ है। जब जनता को निष्पक्ष, जांच-परक और सत्यपूर्ण सूचना नहीं मिलेगी, तो मतदाता सूचित निर्णय कैसे लेगा? सरकार को पत्रकार सुरक्षा कानून को मजबूत करने, पुराने दमनकारी प्रावधानों की समीक्षा करने और मीडिया स्वामित्व की पारदर्शिता सुनिश्चित करने की जरूरत है। मीडिया जगत को भी कॉरपोरेट हितों और TRP की दौड़ से ऊपर उठकर पेशेवर मर्यादा अपनानी होगी।
प्रेस की जंजीरें तोड़ने का समय आ गया है। लोकतंत्र तभी सशक्त होता है जब उसकी आवाज निर्भीक हो। 157वां स्थान चेतावनी है – यदि समय रहते सुधार नहीं हुए तो विश्व पटल पर भारत की लोकतांत्रिक गरिमा और कमजोर होगी। क्या हम इस सच्चाई को स्वीकार कर सुधार की दिशा में कदम उठाएंगे? यह सवाल हर नागरिक, हर पत्रकार और हर नेता से पूछा जाना चाहिए।


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