जीवन की कीमत पर मौत की अठखेलियाँ 

10 अप्रैल को यूपी के वृंदावन में एक नाव पलटने से सोलह धार्मिक पर्यटको की नदी में डूबकर मौत हुई।

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मनोज कुमार अग्रवाल 
 
 
 
सिर्फ पंद्रह दिन के अन्तराल पर जल पर्यटन के दौरान खुशिया मना रहे बेगुनाह पर्यटकों के मौत के आगोश में समाने की दूसरी वारदात सामने आई है इससे पहले 10 अप्रैल को यूपी के वृंदावन में एक नाव पलटने से सोलह धार्मिक पर्यटको की नदी में डूबकर मौत हुई। पंजाब के लुधियाना और मुक्तेश्वर से श्रद्धालुओं का दल मथुरा वृंदावन के दर्शन करने के लिए पहुंचा था. 10 अप्रैल को वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर निधिवन घूमने के बाद श्रद्धालु यमुना नदी में सैर करने की इच्छा जताई. 37 श्रद्धालु दो नाव में केसी घाट से घूमने के लिए निकले थे.तभी स्टीमर पलट गया और सोलह लोगों की मौत हो गई। इस हादसे से कोई सबक नहीं लिया गया और ठीक बीस दिन के अंतराल के बाद 
 
मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में बरगी डैम के पास हुआ क्रूज नाब हादसा केवल एक दुःखद दुर्घटना नहीं, बल्कि हमारी पर्यटन व्यवस्था, सुरक्षा संस्कृति और प्रशासनिक जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़ा करने वाली त्रासदी है। एक सुखद सैर के लिए निकले लोग कुछ ही मिनटों में मौत और जिंदगी के बीच संघर्ष करने लगे। नौ लोगों की मौत, कई लोगों का लापता होना और रेस्क्यू के दौरान सामने आई मां-बेटे की वह हृदयविदारक तस्वीर, जिसमें मौत के बाद भी मां अपने मासूम बच्चे को सीने से लगाए रही, किसी भी संवेदनशील समाज को भीतर तक झकझोर देने के लिए पर्याप्त है।
 
यह दृश्य केबल मातृत्व की अमर करुणा का प्रतीक नहीं, बल्कि व्यवस्था की असफलता का मौन अभियोग भी है। बरगी डैम लंबे समय से पर्यटन का आकर्षण रहा है। वर्ष 2006 से यहां क्रूज सेवा संचालित हो रही थी और इसे सुरक्षित माना जाता था। लेकिन किसी सेवा का लंबे समय तक चलना उसकी सुरक्षा की गारंटी नहीं हो सकता। सुरक्षा कोई दिखावटी व्यवस्था नहीं, बल्कि लगातार सतर्कता, प्रशिक्षण, उपकरणों की तैयारी और मौसम संबंधी चेतावनियों के पालन से जुड़ी जिम्मेदारी है।
 
इस हादसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जब मौसम विभाग ने एक दिन पहले 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की तेज हवाओं की चेतावनी दी थी, तब क्रूज संचालन की अनुमति क्यों दी गई? क्या पर्यटन से होने वाली  आय यात्रियों की जान से अधिक महत्वपूर्ण हो गई थी? घटना के समय क्रूज में लगभग 40 यात्री सवार थे, जबकि उसकी क्षमता करीब 90 लोगों की बताई गई। पहली नजर में यह लग सकता है कि क्षमता से कम यात्री होने के कारण जोखिम कम होना चाहिए था, लेकिन नाव या क्रूज की सुरक्षा केवल यात्रियों की संख्या से तय नहीं होती। मौसम, हवा की गति, पानी की स्थिति, यात्रियों की आवाजाही, संतुलन और आपातकालीन तैयारी, ये सभी कारक समान रूप से महत्वपूर्ण होते हैं। जब तेज तूफान आया और यात्री ऊपर वाले डेक पर चले गए, तब वजन का संतुलन बिगड़ना स्वाभाविक था।
 
घबराहट में लोगों का एक तरफ से दूसरी तरफ भागना स्थिति को और खतरनाक बना गया। लेकिन यही तो वह स्थिति थी जिसके लिए क्रूज प्रबंधन को पहले से तैयार होना चाहिए था। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि हादसे के समय लाइफ जैकेट यात्रियों के शरीर पर नहीं, बल्कि सीलबंद पन्नियों में बंद थीं। यह दृश्य सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविकता को उजागर करता है। लाइफ जैकेट कोई सजावटी वस्तु नहीं है जिसे आपातकाल आने पर पैकेट से निकाला जाए। ऐसे जल परिवहन में यात्रियों को यात्रा शुरू होने से पहले ही लाइफ जैकेट पहनाना अनिवार्य होना चाहिए। यदि क्रूज के कर्मचारी हादसे के समय सीलबंद पैकेट फाड़कर जैकेट निकाल रहे थे, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सुरक्षा नियमों की खुली अवहेलना है। जब तक उपकरण उपयोग योग्य स्थिति में यात्रियों तक नहीं पहुंचते, तब तक उनका होना भी न होने के बराबर है। चश्मदीदों के अनुसार, करीब आधे घंटे तक लोग पानी और मौत से लड़ते रहे।
 
यह आधा घंटा उन परिवारों के लिए जीवन का सबसे भयावह समय रहा होगा। किसी ने सीट पकड़ी होगी, किसी ने अपने बच्चे को बचाने की कोशिश की होगी, कोई मदद के लिए चीखा होगा, कोई प्रार्थना कर रहा होगा। लेकिन ऐसी स्थिति में सामान्य यात्री क्या कर सकता है? उसका जीवन पूरी तरह उन लोगों पर निर्भर होता है जिन पर संचालन, सुरक्षा और बचाव की जिम्मेदारी होती है। यदि वे प्रशिक्षित न हों, यदि सुरक्षा अभ्यास नियमित न हो, यदि आपातकालीन योजना केवल कागज पर हो, तो दुर्घटना के समय पूरी व्यवस्था बिखर जाती है। हादसे के बाद प्रशासन ने कुछ कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कीं, कुछ अधिकारियों को निलंचित किया और उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की। यह कार्रवाई आवश्यक है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इतनी कार्रवाई पर्यास है? हर बड़े हादसे के बाद जांच समितियां बनती हैं, निलंबन होते हैं, बयान जारी होते हैं और भविष्य में सख्त नियम बनाने की घोषणा की जाती है।
 
लेकिन कुछ समय बाद वही डिलाई, वही लापरवाही और वहीं भूल फिर किसी दूसरी जगह नए हादसे का कारण बन जाती है। देश में अनेक दुर्घटनाओं का इतिहास बताता है कि हमारी समस्या नियमों की कमी से अधिक, नियमों के पालन की कमी है। पर्यटन विभाग द्वारा क्रूज संचालन के लिए नए और सख्त नियम तैयार करने की घोषणा स्वागत योग्य है, लेकिन यह घोषणा तभी सार्थक होगी जब इसे जमीन पर ईमानदारी से लागू किया जाए। हर जल पर्यटन सेवा में मौसम संबंधी चेतावनी के आधार पर संचालन रोकने का स्पष्ट नियम होना चाहिए। क्रूज या नाव में सवार होने से पहले प्रत्येक यात्री के लिए लाइफ जैकेट अनिवार्य होनी चाहिए। यात्रियों को यात्रा शुरू होने से पहले दो मिनट का सुरक्षा निर्देश दिया जाना चाहिए। क्रूज स्टाफ को नियमित प्रशिक्षण और मॉक ड्रिल से गुजरना चाहिए।
 
हर यात्रा से पहले सुरक्षा उपकरणों की जांच होनी चाहिए और उसका रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए। केवल टिकट बेचकर यात्रियों को पानी में भेज देना पर्यटन नहीं, गैरजिम्मेदारी है। इस हादसे ने यह भी दिखाया कि पर्यटन स्थलों पर सुरक्षा को अक्सर औपचारिकता समझ लिया जाता है। चमकदार रिसॉर्ट, सुंदर टिकट काउंटर, आकर्षक प्रचार और मनोरंजन सुविधाएं तो बना दी जाती हैं, लेकिन सबसे जरूरी व्यवस्था मानव जीवन की सुरक्षा पीछे छूट जाती है। जब तक सुरक्षा को खर्च नहीं, निवेश माना जाएगा, तब तक ऐसे हादसों को रोका नहीं जा सकेगा। पर्यटन की सफलता केवल पर्यटकों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षित वापसी से मापी जानी चाहिए। बरगी हादसा हमें यह याद दिलाता है कि लापरवाही कभी छोटी नहीं होती। बह धीरे-धीरे जमा होती है और एक दिन त्रासदी बनकर सामने आती है। मौसम चेतावनी को नजरअंदाज करना, यात्रियों को बिना लाइफ जैकेट यात्रा कराना, आपातकालीन तैयारी की कमी, प्रशिक्षित स्टाफ का अभाव और निगरानी की ढिलाई, ये सब मिलकर मौत का कारण बने। इसलिए जिम्मेदारी केवल एक पायलट, हेल्पर या टिकट प्रभारी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
 
पूरी व्यवस्था की जवाबदेही तय होनी चाहिए। अब जरूरी है कि इस हादसे को केवल शोक और मुआवजे तक सीमित न किया जाए। मृतकों के परिवारों को न्याय, घायलों को सहायता और लापता लोगों के परिजनों को हर संभव सहयोग मिलना चाहिए। साथ ही, ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए जिसमें किसी भी पर्यटन सेवा को मौसम चेतावनी, सुरक्षा उपकरण और प्रशिक्षित स्टाफ के बिना संचालन की अनुमति न मिले। बरगी डैम की त्रासदी से यदि व्यवस्था ने सचमुच सबक नहीं लिया, तो यह उन नौ मृतकों की स्मृति के साथ भी अन्याय होगा। यह हादसा एक चेतावनी है, पर्यटन आनंद दे सकता है, लेकिन सुरक्षा के बिना वही आनंद मृत्यु का सफर बन सकता है।
 
बरगी की डूबी हुई नाव केवल पानी में नहीं डूबी; उसके साथ व्यवस्था की लापरवाही, सुरक्षा की खोखली तैयारी और जवाबदेही को कमी भी उजागर हो गई। अब जरूरत है कि यह हादसा केवल खबर बनकर न रह जाए, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था में स्थायी बदलाव की शुरुआत बने।यदि इन हादसों से सरकारों ने कोई सबक नही लिया तो यह सिलसिला खत्म नही होगा क्या पर्यटक जान की कीमत पर मौत के साए में पर्यटन की अठखेलियाँ कर जान गंवाते रहेंगे? (लेखक राष्ट्रवादी चिंतक वरिष्ठ पत्रकार हैं पिछले 38 वर्ष से लेखन और पत्रकारिता से जुड़े हैं) सम्पर्क 9219179431

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