एम्स गोरखपुर में ‘रिसर्च स्मार्ट’ कार्यशाला, नेत्र अनुसंधान में एआई और नवाचार पर जोर

विशेषज्ञों ने कहा—गुणवत्तापूर्ण शोध और आधुनिक तकनीक से चिकित्सा क्षेत्र में बढ़ेंगी संभावनाएं

शत्रुघन मणि त्रिपाठी  Picture
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सिटी रिपोर्टर गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)

गोरखपुर। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) गोरखपुर के नेत्र विज्ञान विभाग द्वारा 3 मई 2026 को ‘रिसर्च स्मार्ट’ (अनुसंधान पद्धति) कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम कार्यकारी निदेशक मेजर जनरल (डॉ.) विभा दत्ता के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ, जिसका उद्देश्य स्नातकोत्तर एवं वरिष्ठ रेजिडेंट्स को प्रभावी शोध के लिए आवश्यक कौशल और दृष्टिकोण से सुसज्जित करना रहा।

कार्यशाला में एम्स नई दिल्ली के आरपी सेंटर की प्रोफेसर डॉ. एम. वनथी और एसजीपीजीआईएमएस लखनऊ के अतिरिक्त प्रोफेसर डॉ. वैभव जैन मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। डॉ. वनथी ने कहा कि युवा चिकित्सकों को वास्तविक अनुसंधान के लिए प्रेरित करना और उन्हें सही मार्गदर्शन देना अत्यंत आवश्यक है, जिससे उनके शोध प्रतिष्ठित जर्नल्स में प्रकाशित हो सकें।

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कार्यक्रम के दौरान डॉ. रमा शंकर रथ, डॉ. तेजस के. पटेल, डॉ. मोहन राज, डॉ. विजेता बाजपेयी, डॉ. प्रदीप खार्या, डॉ. हीरालाल भल्ला और डॉ. यू. वेंकटेश ने शोध पद्धति के विभिन्न आयामों पर विस्तार से चर्चा की। विशेषज्ञों ने चिकित्सा अनुसंधान में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करते हुए बताया कि आधुनिक तकनीक से जटिल रोगों की पहचान और उपचार अधिक सटीक हो सकेगा।

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डॉ. वैभव जैन ने वीडियो प्रस्तुति के माध्यम से जटिल ग्लूकोमा के उपचार में ग्लूकोमा ड्रेनेज उपकरणों की उपयोगिता को समझाया। वहीं एएफ अस्पताल, गोरखपुर की डॉ. शबरीन सुल्ताना ने प्रतिभागियों के लिए प्रश्नोत्तरी का आयोजन किया, जिससे कार्यक्रम में उत्साह और सहभागिता बढ़ी।

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इस कार्यशाला में एम्स गोरखपुर, बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर, राज नेत्र अस्पताल सहित विभिन्न मेडिकल संस्थानों के रेजिडेंट्स ने भाग लिया। साथ ही गोरखपुर नेत्र विज्ञान संघ के कई वरिष्ठ चिकित्सक भी उपस्थित रहे।

कार्यकारी निदेशक डॉ. विभा दत्ता ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए प्रतिभागियों को सक्रिय सहभागिता और जिज्ञासा के माध्यम से अधिकतम लाभ उठाने की प्रेरणा दी। संकाय प्रभारी डॉ. अलका त्रिपाठी ने कहा कि कार्यशाला को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि प्रतिभागी शोध के हर चरण में दक्ष बन सकें। वहीं डॉ. ऋचा अग्रवाल ने इसे नेत्र चिकित्सा में वैज्ञानिक सोच और नवाचार को बढ़ावा देने वाली महत्वपूर्ण पहल बताया।

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