तीन देशों का महायुद्ध और भारत के शांति प्रयासों की भूमिका

भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देश महँगाई और आपूर्ति संकट से गहराई से प्रभावित हो रहे हैं,

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युद्ध कभी भी किसी भी परिस्थिति में वैश्विक विकास के लिए एक बड़ा अवरोध ऐतिहासिक रूप से साबित हुआ है। युद्ध किसी भी बात का विकल्प नहीं है। युद्ध,हिंसा और संघर्ष प्राचीन काल से मानवीय सभ्यता के लिए एक बड़ा खतरा साबित हुए हैं। इतिहास गवाह है कि कई देशों को युद्ध और हिंसा ने ही भूगोल से अदृश्य कर दिया है। तीन देशों इज़रायल, ईरान और अमेरिका के बीच छिड़ा महायुद्ध आज केवल सीमाओं और सामरिक वर्चस्व का संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह समूची मानव सभ्यता के संतुलन को डगमगाने वाला एक भयावह वैश्विक संकट बन चुका है, इस युद्ध की जड़ें वर्षों से चले आ रहे वैचारिक मतभेदों, क्षेत्रीय प्रभुत्व की आकांक्षाओं और सामरिक गठबंधनों में छिपी रही हैं,

जो अब खुलकर एक भीषण सैन्य टकराव का रूप ले चुकी हैं, इज़रायल की आक्रामक सैन्य रणनीतियाँ, ईरान की जवाबी कार्रवाई और अमेरिका की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भागीदारी ने इस संघर्ष को वैश्विक स्तर पर विस्तारित कर दिया है, इस महायुद्ध का सबसे अधिक दुष्प्रभाव मध्य पूर्व के देशों—इराक, सीरिया, लेबनान और यमन—पर पड़ रहा है जहाँ पहले से ही अस्थिरता और संघर्ष की स्थिति थी और अब यह युद्ध उनके लिए मानवीय संकट का रूप ले चुका है, इसके अतिरिक्त सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देश भी सुरक्षा और आर्थिक दबाव से जूझ रहे हैं, जबकि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देश महँगाई और आपूर्ति संकट से गहराई से प्रभावित हो रहे हैं,

वैश्विक अर्थव्यवस्था इस संघर्ष के कारण गंभीर संकट में फँस गई है, कच्चे तेल और गैस की कीमतों में उछाल ने परिवहन, उद्योग और दैनिक जीवन को महँगा बना दिया है, खाद्यान्न संकट ने गरीब देशों में भूख और कुपोषण का खतरा बढ़ा दिया है, अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्ग असुरक्षित हो गए हैं, निवेशकों का विश्वास डगमगा रहा है और विश्व आर्थिक मंदी की आशंका गहराती जा रही है, जनजीवन पर इसका प्रभाव अत्यंत पीड़ादायक है,

युद्धग्रस्त क्षेत्रों में लोग अपने घरों से विस्थापित होकर शरणार्थी बनने को मजबूर हैं, लाखों बच्चों की शिक्षा बाधित हो चुकी है, अस्पतालों में संसाधनों की कमी ने जीवन को संकट में डाल दिया है, वहीं अन्य देशों में बेरोजगारी, महँगाई और मानसिक असुरक्षा का वातावरण गहराता जा रहा है, इस भीषण परिस्थिति में भारत ने शांति और संतुलन की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं, भारत ने सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को अपनाते हुए संवाद और कूटनीति का मार्ग प्रशस्त किया है, संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत ने लगातार युद्धविराम, शांतिपूर्ण समाधान और वार्ता की आवश्यकता पर बल दिया है, मानवीय सहायता के माध्यम से प्रभावित क्षेत्रों में राहत पहुँचाने के प्रयास भी किए गए हैं और यह संदेश दिया गया है कि युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता,

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भारत की यह संतुलित और दूरदर्शी नीति वैश्विक शांति के लिए एक सकारात्मक पहल के रूप में देखी जा रही है, आज जब पूरा विश्व इस महायुद्ध के दुष्परिणामों से जूझ रहा है तब यह आवश्यक हो जाता है कि सभी राष्ट्र अपने संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठकर मानवता के व्यापक हित को प्राथमिकता दें और इज़रायल, ईरान तथा अमेरिका जैसे राष्ट्र संवाद, संयम और सहयोग का मार्ग अपनाएँ, क्योंकि अंततः युद्ध केवल विनाश, पीड़ा और असंतुलन की कहानी लिखता है, जबकि शांति ही वह मार्ग है जो विश्व को स्थिरता, समृद्धि और मानवीय संवेदनाओं से जोड़ सकता है।

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