गणगौर - शिव-पार्वती के अनन्य प्रेम का पर्व बने नारी अस्मिता का उत्सव ?

उत्तर प्रदेश और हरियाणा के कई हिस्सों में भी इसकी गूंज सुनाई देती है।

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भारतीय सनातन संस्कृति में प्रत्येक पर्व का अपना विशिष्ट महत्व है। ये पर्व केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहींबल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के संवाहक भी हैं। इन्हीं में से एक है गणगौर एक ऐसा पावन उत्सवजो भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट प्रेमसमर्पण और वैवाहिक आदर्शों का प्रतीक माना जाता है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला यह पर्व विशेष रूप से मध्यप्रदेश और राजस्थान में व्यापक रूप से प्रचलित हैहालांकि उत्तर प्रदेश और हरियाणा के कई हिस्सों में भी इसकी गूंज सुनाई देती है।

गणगौर’ शब्द स्वयं में ही इस पर्व के सार को समेटे हुए है ‘गण’ अर्थात भगवान शिव और ‘गौर’ अर्थात माता पार्वती। यह शिव और शक्ति के दिव्य मिलन का उत्सव है। इस दिन महिलाएं अपने परिवार की सुख-समृद्धिपति की दीर्घायु और वैवाहिक जीवन की स्थिरता के लिए व्रत और पूजा करती हैं। अविवाहित कन्याएं योग्य वर की कामना से माता पार्वती की आराधना करती हैं। निस्संदेहयह पर्व नारी की श्रद्धाआस्था और पारिवारिक मूल्यों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम रहा है।

गणगौर उत्सव की शुरुआत होलिका दहन से होती हैजब महिलाएं जवारे बोती हैं। कई स्थानों पर यह उत्सव 16 दिनों तक चलता हैतो कहीं इसकी अवधि संक्षिप्त भी होती है। इस दौरान महिलाएं पारंपरिक श्रृंगार करती हैंमेहंदी रचाती हैं और लोकगीतों व नृत्यों के माध्यम से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करती हैं। अंतिम दिन सुसज्जित प्रतिमाओं की शोभायात्रा निकाली जाती है और विधि-विधान से विसर्जन किया जाता है। गांव-गांव में मेले और सांस्कृतिक आयोजन इस पर्व को सामुदायिक उत्सव का रूप दे देते हैं।

आधुनिक टेक्नोलॉजी से लेंस इस युग में सवाल यह है कि क्या गणगौर का अर्थ केवल “अच्छे पति की कामना” तक सीमित रह जाना चाहिए आधुनिक समय मेंजब समाज तीव्र गति से बदल रहा हैयह आवश्यक हो जाता है कि हम इस पर्व के मूल संदेश को नए दृष्टिकोण से समझें। गणगौर का वास्तविक भाव केवल वैवाहिक सुख तक सीमित नहीं है। यह नारी के आत्मबलउसकी इच्छाओं और उसके अस्तित्व के सम्मान का भी प्रतीक हो सकता है और होना चाहिए। यदि इस पर्व को केवल श्रृंगारमेहंदी और परंपरागत अनुष्ठानों तक सीमित कर दिया जाएतो इसके व्यापक सामाजिक संदेश के साथ अन्याय होगा।

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आज आवश्यकता इस बात की है कि गणगौर को नारी सशक्तिकरण के एक सशक्त माध्यम के रूप में पुनर्परिभाषित किया जाए। यह पर्व हमें याद दिला सकता है कि समर्पण के साथ-साथ सम्मान और समानता भी उतनी ही आवश्यक है। प्रेम तभी सार्थक होता हैजब उसमें आत्मसम्मान और अधिकारों की बराबरी शामिल हो। गांवों और शहरों में आयोजित मेलोंगीतों और उत्सवों के बीच हमें इस पर्व की आत्मा को नहीं भूलना चाहिए समर्पणप्रेम और संतुलन। लेकिन यह संतुलन तभी पूर्ण होगाजब उसमें समानता और गरिमा का समावेश हो।

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अंततःगणगौर केवल अतीत की परंपरा नहींबल्कि वर्तमान और भविष्य के समाज को दिशा देने वाला सांस्कृतिक अवसर है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसे केवल एक अनुष्ठान बनाए रखें या इसे नारी गरिमासमानता और सामाजिक प्रगति के उत्सव में परिवर्तित करें।

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अरविंद रावल

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