राजनीति
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गणेश शंकर विद्यार्थी की पत्रकारिता
वे केवल एक पत्रकार नहीं थे, बल्कि एक ऐसी संस्था थे जिन्होंने पत्रकारिता को 'मिशन' बनाया और अपनी लेखनी से ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिला दीं।
महेन्द्र तिवारी
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल राजनीतिक आंदोलनों और सशस्त्र क्रांतियों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह उस 'चौथे स्तंभ' के जागरण की भी गाथा है, जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ जनमत बनाने में अभूतपूर्व भूमिका निभाई। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में जब भी 'कलम के सिपाहियों' का जिक्र होता है, तो गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम सबसे ऊपर चमकता है। वे केवल एक पत्रकार नहीं थे, बल्कि एक ऐसी संस्था थे जिन्होंने पत्रकारिता को 'मिशन' बनाया और अपनी लेखनी से ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिला दीं।
गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म 26 अक्टूबर, 1890 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ था। उनके व्यक्तित्व में एक अजीब सी कशिश थी एक तरफ वे गांधीजी के अहिंसात्मक आंदोलनों के समर्थक थे, तो दूसरी तरफ क्रांतिकारी भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद के मददगार और मार्गदर्शक भी थे। उनकी पत्रकारिता इन दोनों धाराओं का संगम थी।
गणेश शंकर विद्यार्थी की पत्रकारिता की यात्रा का केंद्र बिंदु उनका साप्ताहिक पत्र 'प्रताप' था। 1913 में, केवल 23 वर्ष की आयु में, उन्होंने कानपुर से 'प्रताप' का प्रकाशन शुरू किया। उस दौरान देश में असंतोष की लहर थी, लेकिन साथ ही साम्प्रदायिकता के बीज भी बोए जा रहे थे। कानपुर उस समय व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र था और यहां उदारवादी और प्रगतिशील विचारों की सख्त जरूरत थी।
'प्रताप' का उद्देश्य साफ था सत्य का प्रचार और अन्याय का प्रतिकार। उस समय के अधिकांश समाचार पत्र या तो अंग्रेजों की तारीफ में लिखते थे या फिर बहुत ही सीमित बौद्धिक वर्ग तक सीमित थे। विद्यार्थी जी ने 'प्रताप' को जनता की आवाज बनाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह पत्र निर्देशित नहीं होगा, बल्कि स्वयं एक निर्देशक बनेगा। उनके संपादकीयों में एक तीक्ष्णता थी, एक आक्रोश था, लेकिन साथ ही एक गहरा दर्द भी था। वे केवल खबरें देने वाले पत्रकार नहीं थे, वे समाज के मार्गदर्शक थे।
Read More खुशी का असली पैमाना,क्यों फिनलैंड बार-बार नंबर-1 बनता है और भारत अभी भी तलाश में है संतुलित मुस्कानविद्यार्थी जी की पत्रकारिता की सबसे बड़ी विशेषता उनकी लेखन शैली थी। उनकी भाषा सीधी-साधी, ठेठ देशज और बेबाक थी। वे कठिन शब्दों का प्रयोग नहीं करते थे, बल्कि ऐसे शब्दों का चयन करते थे जो सीधे पाठक के दिल पर चोट करें। उनका लेखन 'जनवादी' था। वे जानते थे कि स्वतंत्रता का सपना तभी साकार होगा जब किसान, मजदूर और आम जनता इसे अपना मानेगी।
ब्रिटिश शासन के दमन के खिलाफ लिखते समय उनकी कलम से आग झरती थी। वे कभी भी अलंकारों में बात नहीं कहते थे। जब भी कोई अन्याय होता, चाहे वह ब्रिटिश सरकार द्वारा किसानों पर लगाया गया अत्याचार हो या किसी रियासत में प्रजा का शोषण, विद्यार्थी जी उसे बेधड़क उठाते थे। उनके संपादकीय न केवल सरकार की नीतियों की आलोचना करते थे, बल्कि जनता को झकझोर कर जगाते थे। उनकी पत्रकारिता में 'कर्तव्य' का भाव था। वे मानते थे कि पत्रकार का कर्तव्य है कि वह सत्य को प्रकाश में लाए, चाहे इसके लिए उसे कितनी भी कीमत चुकानी पड़े।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश सरकार ने प्रेस पर कड़े प्रतिबंध लगाए हुए थे। 'वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट' जैसे काले कानूनों के तहत सरकार पत्रकारों को जेल भेज सकती थी और पत्रों का जमानत बंद कर सकती थी। ऐसे में अधिकांश पत्रकार डरकर सरकार की खुशामद में लग गए थे, लेकिन गणेश शंकर विद्यार्थी झुकने वालों में से नहीं थे।
उन्होंने ब्रिटिश नीतियों, विशेषकर 'रोलेट एक्ट' के विरोध में ऐसे तीखे लेख लिखे कि सरकार हमेशा उनके पीछे पड़ी रहती थी। उन पर मुकदमे चलाए गए, जुर्माने लगाए गए, और कई बार उन्हें जेल जाना पड़ा। लेकिन जेल जाना उनके लिए वीरता का पदक था। जब भी वे जेल से लौटते, 'प्रताप' को और अधिक तेजी से लिखना शुरू करते। उन्होंने यह दिखाया कि सच्ची पत्रकारिता भय से परे होती है। वे कहा करते थे कि "अगर सच बोलने के लिए जेल जाना पड़े, तो वह जेल स्वर्ग से कम नहीं।" उनके इस निडर रवैये ने कानपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों के युवाओं को प्रेरित किया और स्वतंत्रता आंदोलन में भारी जनसहभागिता बढ़ी।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रारंभिक दौर में राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से शिक्षित मध्यम वर्ग के हाथों में था। किसान और मजदूर वर्ग इसके किनारे खड़े थे। गणेश शंकर विद्यार्थी शायद पहले उन पत्रकारों में से थे जिन्होंने समझा कि आजादी की लड़ाई को तभी जीता जा सकता है जब यह लड़ाई आम आदमी की लड़ाई बन जाए।
'प्रताप' ने किसानों की पीड़ा को व्यक्त किया। विद्यार्थी जी ने किसानों पर हो रहे शोषण, लगान की मनमानी व्यवस्था और पुलिस के अत्याचारों को बड़े ही विस्तार से उजागर किया। उन्होंने मजदूरों के अधिकारों के लिए भी आवाज उठाई। कानपुर उस समय एक बड़ा औद्योगिक शहर था और यहां मजदूरों की स्थिति दयनीय थी। विद्यार्थी जी ने 'प्रताप' के माध्यम से मजदूरों में जागरूकता फैलाई और उन्हें संगठित होने की सलाह दी।
इस प्रकार की पत्रकारिता उस समय के लिए अभूतपूर्व थी। यह 'राजनीतिक पत्रकारिता' से आगे बढ़कर 'सामाजिक पत्रकारिता' थी। उन्होंने दिखाया कि स्वतंत्रता का अर्थ है- भूखे को रोटी मिलना और नंगे को कपड़ा। उनके पत्र में किसानों और मजदूरों की खबरें प्रमुखता से छापी जाती थीं, जिससे वे वर्ग अपने आपको राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ा हुआ महसूस करने लगा। यह एक रणनीतिक सफलता थी जिसने आंदोलन को व्यापक बनाया।
गणेश शंकर विद्यार्थी की पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनका क्रांतिकारियों के प्रति समर्थन था। यद्यपि वे स्वयं महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन से प्रभावित थे और कांग्रेस के कार्यकर्ता थे, लेकिन उन्होंने क्रांतिकारियों के साहस की भी सराहना की। जब भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अपनी कार्रवाई की, तो मुख्यधारा के मीडिया ने उन्हें 'आतंकवादी' कहा, लेकिन 'प्रताप' ने उन्हें 'देशभक्त' और 'स्वतंत्रता सेनानी' कहा।
विद्यार्थी जी ने अपने संपादकीयों में क्रांतिकारियों के बलिदान को जनता तक पहुंचाया। उन्होंने लिखा कि ये नौजवान देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर रहे हैं और उनका त्याग महान है। उन्होंने काकोरी कांड के अभियुक्तों के समर्थन में भी कई लेख लिखे। इसके लिए ब्रिटिश सरकार ने उन पर कड़ी नजर रखी और कई बार उन्हें 'देशध्रोह' का आरोप लगाया, लेकिन उन्होंने अपनी नीति नहीं बदली। उनकी पत्रकारिता ने जनता को यह समझने में मदद की कि स्वतंत्रता के लिए कई रास्ते हो सकते हैं और हर रास्ते पर चलने वाला देशभक्त है। उन्होंने क्रांतिकारी विचारों को मानसिक रूप से समर्थन देकर युवाओं के बीच देशभक्ति की जो लहर पैदा की, वह इतिहास में दर्ज है।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' की नीति के कारण देश में सांप्रदायिकता तेजी से फैल रही थी। ऐसे में गणेश शंकर विद्यार्थी की पत्रकारिता एक सेतु की तरह थी। 'प्रताप' ने हिंदू-मुस्लिम एकता को बनाए रखने के लिए लगातार प्रयास किए।
विद्यार्थी जी का मानना था कि अगर देश बंटा तो आजादी व्यर्थ है। उन्होंने अपने अखबार के माध्यम से सांप्रदायिक दंगों की निंदा की और लोगों से अपील की कि वे एक-दूसरे के घरों का सम्मान करें। उन्होंने उन अफवाहों का पर्दाफाश किया जो समुदायों के बीच नफरत फैला रही थीं। उनकी पत्रकारिता का यह पक्ष बहुत संवेदनशील था। वे कभी भी ऐसी खबरें नहीं छापते थे जो सांप्रदायिक तनाव बढ़ाए। इसके विपरीत, वे उन घटनाओं को प्रमुखता से प्रकाशित करते थे जिनमें हिंदू और मुस्लिम एक-दूसरे की मदद करते थे।
इसी सांप्रदायिक सद्भाव के प्रति समर्पण के कारण उन्हें अपने जीवन की कीमत चुकानी पड़ी। उन्होंने केवल लिखकर ही नहीं, बल्कि अपने कर्मों से भी यह सिद्ध किया कि पत्रकारिता सिर्फ दफ्तर में बैठकर नहीं की जाती, बल्कि मैदान में उतरकर होती है। जब 1931 में कानपुर में भीषण दंगे हुए, तो वे अपनी सुरक्षा की परवाह किए बिना जनता के बीच गए और शांति स्थापित करते हुए शहीद हो गए। उनकी मृत्यु ने यह संदेश दिया कि एक सच्चा पत्रकार अपने सिद्धांतों के लिए मर भी सकता है।
यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो पाएंगे कि 'प्रताप' अखबार ने कानपुर क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन को न केवल दिशा दी, बल्कि इसे गति भी प्रदान की। 1920 के दशक में जब महात्मा गांधी का असहयोग आंदोलन चल रहा था, तो 'प्रताप' ने इसे आम जनता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विद्यार्थी जी ने लोगों को विदेशी वस्तुओं का त्याग करने और खादी को अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने ब्रिटिश प्रशासन की नाकामियों, भ्रष्टाचार और जुल्म को बेनकाब किया। उनके लेखों ने जनता के मन में शासन के प्रति विद्रोह की भावना भरी, जो कानून तोड़ने से नहीं, बल्कि एक नैतिक जीत की इच्छा से उपजी थी। विद्यार्थी जी कांग्रेस के अंदरूनी मामलों से भी वाकिफ थे। उन्होंने पार्टी की नीतियों की आलोचना भी की जब उन्हें लगा कि जनता के हितों की अनदेखी हो रही है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि उनकी पत्रकारिता किसी दल या व्यक्ति की ज़िम्मेदार नहीं थी, बल्कि वह 'राष्ट्र' की थी।
गणेश शंकर विद्यार्थी अपने नाम के सच्चे अर्थों में विद्यार्थी थे। वे जीवन पर्यन्त सीखते रहे। उन्होंने पत्रकारिता के जो मानक स्थापित किए, वे आज भी प्रासंगिक हैं। वे किसी भी राजनीतिक दल या विचारधारा के कैदी नहीं थे। उन्होंने कांग्रेस की गलतियों को भी बेबाक होकर उजागर किया। वे स्वयं बड़े सादगीपूर्ण जीवन जीते थे। पत्रकारिता को उन्होंने कमाई का जरिया नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम बनाया। 'प्रताप' के कार्यालय में सादगी ही समृद्धि थी। उन्होंने सिखाया कि पत्रकार को भयमुक्त होना चाहिए। चाहे सत्ता हो या समाज के शक्तिशाली तत्व, पत्रकार को सत्य के साथ खड़ा रहना होता है।
गणेश शंकर विद्यार्थी की पत्रकारिता उस युग का दर्पण थी, जिसमें देश गुलामी की अंधेरी रात में रोशनी की तलाश में था। उन्होंने अपनी कलम से वह रोशनी फैलाई। उनका जीवन और उनका अखबार 'प्रताप' स्वतंत्रता संग्राम का एक अभिन्न अंग था। उन्होंने पत्रकारिता को एक व्यवसाय से उठकर एक 'मिशन' बनाया।
आज जब भारत स्वतंत्र है और पत्रकारिता एक सशक्त संस्था के रूप में विकसित हो चुकी है, तब विद्यार्थी जी के मूल्यों को याद करना और भी अधिक आवश्यक हो जाता है। वर्तमान समय में जब पत्रकारिता पर वाणिज्यिकरण और पक्षपात के आरोप लगते हैं, विद्यार्थी जी का जीवन हमें याद दिलाता है कि पत्रकारिता का धर्म क्या है।
उन्होंने अपने द्वारा स्थापित मानकों के अनुसार जीवन और मृत्यु दोनों को निभाया। 25 मार्च 1931 को दंगा प्रभावित क्षेत्र में जाकर शांति स्थापित करने का प्रयास, वास्तव में उनकी पत्रकारिता की अंतिम और सबसे बड़ी कहानी थी—एक कहानी जो बिना शब्दों के लिखी गई थी, खून से लिखी गई थी। गणेश शंकर विद्यार्थी की पत्रकारिता हमें सिखाती है कि शब्दों की ताकत अनंत है, और यदि उनका उपयोग सत्य, न्याय और मानवता के लिए किया जाए, तो वे साम्राज्यों को भी गिरा सकते हैं। वे हमेशा एक आदर्श के रूप में प्रेरित करते रहेंगे, एक ऐसे 'विद्यार्थी' के रूप में जिसने जीवन भर सत्य की परीक्षा में उत्तीर्ण होते रहने का प्रयास किया।


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