मुकदमों की पेंडिंग लिस्ट बढ़ने का सबसे बड़ा कारण जजों की संख्या है.।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में केवल 110 जज हैं. इन जजों के भरोसे ये 12 लाख पेंडिंग केस हैं. केस निपटाने को लेकर जजों पर

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स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में केवल 110 जज हैं. इन जजों के भरोसे ये 12 लाख पेंडिंग केस हैं. केस निपटाने को लेकर जजों पर प्रेशर भी है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के तहत केसों की पेंडिंसि खत्म करनी है.

इन्हीं दबावों के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी का बयान भी चर्चा में है. हाल ही में जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने एक सुनवाई के दौरान कहा था-मुझे भूख लग रही है, थकान महसूस हो रही है और मैं शारीरिक रूप से निर्णय देने में असमर्थ हूं. इसलिए फैसले की सुरक्षित रखा जाता है.

ऐसी बात कहने के पीछ जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की मजबूरी यह थी कि 24 फरवरी को ऋण वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी) के एक आदेश के खिलाफ सुनवाई के बाद न्यायाधीश ने तत्काल आदेश पारित करने के बजाय, टिप्पणी के साथ फैसला सुरक्षित रख लिया.

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24 फरवरी का दिन जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की अदालत के लिए बेहद व्यस्त रहा. उनकी लिस्ट में कुल 235 मामले लगे थे. इनमें 92 नए केस, 101 नियमित मामले, 39 विविध आवेदन और 3 एडिशनल लिस्ट के मामले शामिल थे. दोपहर 4:15 बजे तक जस्टिस विद्यार्थी केवल 29 नए मामलों की ही सुनवाई कर पाए थे.

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इसी बीच उन्हें सूचित किया गया कि अगला मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा रिमांड (वापस भेजा गया) किया गया है और इसकी समय सीमा 24 फरवरी को ही समाप्त हो रही है. इसके बाद जस्टिस विद्यार्थी ने इस विशेष मामले की सुनवाई शुरू की, जो लगातार शाम 7 बजे तक चली.

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जज की इस टिप्पणी ने एक नई बहस छेड़ दी है. यह वाकया दर्शाता है कि भारतीय अदालतों में जजों पर काम का कितना दबाव है. एक ही दिन में 200 से अधिक केस लिस्ट होना और फिर देर शाम तक सुनवाई करना किसी भी व्यक्ति के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण होता है.

दरअसल  सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक केस की बड़ी पेंडेंसी है. वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में लगभग 92800 मामले पेंडिंग हैं. जिनमें से 72000 मामले सिविल के हैं और 20800 मामले अपराधिक (फौजदारी) के हैं. पिछले एक साल में सुप्रीम कोर्ट में 10000 से अधिक पेंडेंसी बढ़ी है.

पूरे देश में सबसे ज्यादा पेंडेंसी इलाहाबाद हाईकोर्ट में है. इलाहाबाद हाईकोर्ट में लगभग 12 लाख केस पेंडिंग हैं. बड़ी बात यह है कि पूरे देश में हाईकोर्ट में जितने केस पेंडिंग हैं उसका 20% यानी की पांचवां हिस्सा अकेले इलाहाबाद हाईकोर्ट में है. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में 22265 मामले पेंडिंग हैं.

सुप्रीम कोर्ट में जजों के 34 पद हैं, जिनमें से 33 पदों पर वर्तमान में नियुक्तियां हैं, एक पद खाली है. निर्धारित पदों के सापेक्ष जजों की नियुक्ति होने के बावजूद भी पेंडेंसी 92828 है, जो यह दर्शाती है कि कोर्ट में आने वाले केसों की रफ्तार काफी तेज है. इलाहाबाद हाईकोर्ट की बात करें तो कुल 160 जजों के पद हैं, जिनमें से 110 पदों पर नियुक्ति है. 50 पद खाली हैंं. यानि इलाहाबाद हाईकोर्ट में 31% जजों के पद खाली हैं.

अगर पूरे देश के हाईकोर्ट की बात करें तो सभी 25 हाईकोर्ट में कुल 1114 पद सृजित हैं, जिनमें से 804 पदों पर जज नियुक्त हैं. पूरे देश में हाईकोर्ट के 310 पदों पर जजों की नियुक्ति नहीं है. इसका मतलब पूरे देश में हाईकोर्ट के 27.8 प्रतिशत जजों के पद खाली हैं.

सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट ही नहीं जिला कोर्ट में भी केस की संख्या अधिक होने के चलते जज पर काम का प्रेशर होता है. वहीं पक्षकारों को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. कोर्ट पर अधिक दबाव होने के चलते मुकदमे की सुनवाई समय से नहीं हो पाती है. एक दिन में अधिक मामले सुनाने पड़ते हैं जिसके चलते केस पर जज अधिक समय नहीं दे पाते और तारीख पर तारीख का खेल चलता रहता है.

आपराधिक मामलों में कोर्ट पर ओवर बर्डन होने के चलते बेल मिलने में समस्या होती है. एक हियरिंग के लिए लिस्टिंग करने के बाद दूसरी हियरिंग की लिस्टिंग होने में महीनों का समय लग जाता है. ऐसे में अगर एक हियरिंग पर किन्ही कारणों से बेल रिजेक्ट होती है, तो दूसरी बेल का मौका मिलने में कई बार महीनों का समय लगता है.

 

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