राजनीति
अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे
भारत और अमेरिका के बीच हाल में हुए व्यापारिक समझौते ने केवल दो देशों की नीतियों को ही नहीं बदला
महेन्द्र तिवारी
ट्रंप की राजनीति हमेशा आक्रामक रही है। उनका मानना रहा कि आर्थिक दबाव के जरिए ही किसी देश को झुकाया जा सकता है। सत्ता में आते ही उन्होंने चीन के साथ व्यापार युद्ध छेड़ दिया और उसी क्रम में भारत को भी निशाने पर लिया। भारत पर यह आरोप लगाया गया कि वह विदेशी वस्तुओं पर बहुत अधिक कर लगाता है और अमेरिकी कंपनियों को उचित अवसर नहीं देता। इसी सोच के तहत भारत को विशेष व्यापारिक सुविधा की सूची से बाहर कर दिया गया, जिससे भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इस फैसले से दवाइयों, कपड़ों, रत्नों और कृषि उत्पादों पर अतिरिक्त बोझ पड़ा और भारत के लिए अमेरिकी बाजार कठिन हो गया।
भारत ने इस दबाव को चुपचाप स्वीकार नहीं किया। उसने जवाबी कदम उठाए और अमेरिका से आने वाले कई उत्पादों पर कर बढ़ा दिए। इससे अमेरिका के किसान और उद्योगपति प्रभावित हुए। बादाम, सेब और अन्य कृषि उत्पादों के निर्यात पर असर पड़ा। यह संकेत साफ था कि भारत केवल सुनने वाला देश नहीं है, बल्कि अपने हितों की रक्षा करना जानता है। इसके बावजूद भारत ने टकराव की भाषा नहीं अपनाई। उसने संवाद के दरवाजे खुले रखे और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत साबित हुई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति का मूल आधार संतुलन रहा है। न तो किसी के आगे झुकना और न ही अनावश्यक टकराव। इसी नीति के तहत भारत ने अमेरिका के साथ रणनीतिक सहयोग बढ़ाया। सुरक्षा, रक्षा उत्पादन, तकनीक और निवेश के क्षेत्र में साझेदारी को मजबूत किया गया। भारत ने यह संदेश स्पष्ट रूप से दिया कि वह केवल एक बाजार नहीं, बल्कि भरोसेमंद साझेदार है। अमेरिका की बड़ी कंपनियों को भारत में निवेश के अवसर दिए गए, उत्पादन को बढ़ावा देने वाली योजनाओं के माध्यम से उद्योगों को आकर्षित किया गया और नौकरशाही अड़चनों को कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए।
इन सभी प्रयासों का असर तब दिखा जब ट्रंप ने खुद स्वीकार किया कि प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत के बाद उन्होंने अपने रुख पर पुनर्विचार किया। यह कोई साधारण फोन वार्ता नहीं थी, बल्कि वर्षों की रणनीति और विश्वास का परिणाम थी। ट्रंप जैसे नेता, जो आमतौर पर सार्वजनिक रूप से किसी की प्रशंसा नहीं करते, उन्होंने मोदी को प्रभावशाली और सम्मानित नेता बताया। यह बदलाव केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नीतियों में भी दिखाई दिया।
नए व्यापारिक समझौते के तहत भारत और अमेरिका दोनों ने एक दूसरे को राहत दी। भारत ने कुछ कृषि उत्पादों पर शुल्क कम करने का संकेत दिया, जबकि अमेरिका ने भारतीय इस्पात, कपड़ा और दवा उद्योग को बड़ी राहत दी। इससे भारत के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा और लाखों लोगों के रोजगार सुरक्षित होंगे। दवा उद्योग के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारतीय दवाइयाँ सस्ती और प्रभावी मानी जाती हैं और अमेरिका में उनकी मांग लगातार बढ़ रही है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक बड़ा सवाल यह भी उठा कि क्या अमेरिका से बढ़ती नजदीकी का असर भारत के रूस के साथ संबंधों पर पड़ेगा। यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से सस्ता तेल खरीदने के कारण भारत पश्चिमी देशों की आलोचना के केंद्र में रहा है। भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए रूस से तेल खरीद जारी रखी, जिससे उसे अरबों रुपये की बचत हुई और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हुई। अमेरिका ने इस पर असंतोष जरूर जताया, लेकिन कोई ठोस प्रतिबंध नहीं लगाया।
रूस की ओर से भी यह स्पष्ट किया गया कि भारत के साथ उसके संबंधों में कोई बदलाव नहीं आया है। रूसी नेतृत्व ने कहा कि भारत एक भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार है और दोनों देशों का सहयोग आगे भी जारी रहेगा। रक्षा क्षेत्र में चल रही परियोजनाएँ, मिसाइल प्रणालियों की आपूर्ति और सैन्य सहयोग पर कोई असर नहीं पड़ेगा। यह प्रतिक्रिया इस बात का प्रमाण है कि भारत ने अपनी कूटनीति में संतुलन बनाए रखा है और किसी एक खेमे में खुद को सीमित नहीं किया है।
भारत की यह नीति कोई नई नहीं है। आज़ादी के बाद से ही भारत ने गुटनिरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता का रास्ता चुना है। बदलती दुनिया में शब्द भले बदल गए हों, लेकिन मूल भावना वही है। भारत अपने फैसले स्वयं करता है, दबाव में नहीं। अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौता भी इसी सोच का परिणाम है। इसमें न तो आत्मसमर्पण है और न ही टकराव, बल्कि आपसी लाभ का रास्ता है।
इस समझौते का असर केवल भारत और अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था में भी इसके सकारात्मक संकेत दिखाई देंगे। जब दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ सहयोग का रास्ता चुनती हैं, तो बाजारों में स्थिरता आती है। निवेशकों का भरोसा बढ़ता है और विकास को गति मिलती है। भारत के लिए यह अवसर है कि वह खुद को विश्व उत्पादन केंद्र के रूप में स्थापित करे और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी भूमिका मजबूत करे।
हालांकि चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं। डिजिटल कर, बौद्धिक संपदा अधिकार और आंकड़ों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं। भारत को सावधानी से आगे बढ़ना होगा ताकि घरेलू हितों की अनदेखी न हो। विदेशी कंपनियों को अवसर देते समय यह सुनिश्चित करना होगा कि देश के कानूनों और संप्रभुता से कोई समझौता न हो।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह समझौता महत्वपूर्ण है। इससे यह संदेश जाता है कि भारत अब केवल प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं, बल्कि वैश्विक नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति की यह एक बड़ी परीक्षा थी, जिसमें वे सफल दिखाई देते हैं। ट्रंप का नरम रुख इस बात का संकेत है कि भारत की बात अब सुनी जाती है।
आने वाले वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच सहयोग और गहरा हो सकता है। उभरती तकनीकों, रक्षा उत्पादन और निवेश के क्षेत्रों में नए रास्ते खुलेंगे। साथ ही रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा सहयोग भी जारी रहेगा। भारत दोनों शक्तियों के साथ अपने हितों के अनुसार संबंध बनाए रखेगा।
अंततः यह कहानी किसी की हार या जीत की नहीं है, बल्कि बदलती दुनिया में समझदारी भरी कूटनीति की है। यह दिखाती है कि शोर मचाने से नहीं, बल्कि संवाद और संतुलन से बड़े फैसले लिए जाते हैं। भारत ने यही रास्ता चुना है और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभर रहा है।

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