युवाओं में बढ़ता मानसिक अवसाद

केवल व्यक्तिगत पीड़ा की कथा नहीं है

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महेन्द्र तिवारी

भारत के युवाओं का मानसिक स्वास्थ्य आज जिस संकट के दौर से गुजर रहा है, वह केवल व्यक्तिगत पीड़ा की कथा नहीं है, बल्कि राष्ट्र के भविष्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन चुका है। हाल ही में दिल्ली में आयोजित भारतीय मनोरोग विज्ञान संस्था के 77 वें राष्ट्रीय सम्मेलन ने इस सच्चाई को पूरे समाज के सामने रख दिया है कि देश में मानसिक विकारों का सबसे बड़ा भार अब युवाओं के कंधों पर आ चुका है। सम्मेलन में प्रस्तुत शोध और अनुभव बताते हैं कि मानसिक रोग अब जीवन के उत्तरार्ध में नहीं, बल्कि किशोरावस्था और युवावस्था में ही अपनी जड़ें जमा रहे हैं। यह वही समय होता है जब व्यक्ति शिक्षा ग्रहण करता है, अपने सपनों को आकार देता है और समाज व राष्ट्र के लिए उपयोगी नागरिक बनने की ओर बढ़ता है। ऐसे में यदि मन ही अस्वस्थ हो जाए, तो न केवल व्यक्ति टूटता है, बल्कि सामाजिक संरचना भी कमजोर पड़ती है।

विशेषज्ञों के अनुसार भारत में पाए जाने वाले कुल मानसिक विकारों में से लगभग साठ प्रतिशत मामले पैंतीस वर्ष से कम आयु के लोगों में देखे जा रहे हैं। यह तथ्य अपने आप में भयावह है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए एक व्यापक अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि एक तिहाई से अधिक मानसिक विकार चौदह वर्ष की आयु से पहले ही शुरू हो जाते हैं और अधिकांश समस्याएँ पच्चीस वर्ष तक सामने आ जाती हैं। भारत में मानसिक रोगों की औसत शुरुआत की आयु उन्नीस से बीस वर्ष के बीच बताई गई है। ध्यान की कमी, अत्यधिक चंचलता, चिंता, अवसाद, भोजन से जुड़ी समस्याएँ, नशे की लत और व्यवहार संबंधी विकार अब बहुत कम उम्र में दिखाई देने लगे हैं। इन रोगों की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि ये अक्सर शांत रूप से व्यक्ति के भीतर पनपते रहते हैं और समय पर पहचान व उपचार न मिलने पर जीवन की दिशा ही बदल देते हैं।

युवाओं में बढ़ते मानसिक संकट का एक भयावह पहलू आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति है। वैश्विक स्वास्थ्य संगठनों के अनुसार पंद्रह से उनतीस वर्ष की आयु वर्ग में आत्महत्या मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल हो चुकी है। यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं है, बल्कि असंख्य टूटे परिवारों, अधूरे सपनों और मौन पीड़ा की कहानी कहता है। हाल के वर्षों में यह भी देखा गया है कि युवा वर्ग में बार-बार होने वाले मानसिक तनाव की घटनाओं में सौ प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। इसके पीछे महामारी के दौर में बढ़ा एकांत, शिक्षा और रोजगार की अनिश्चितता तथा सामाजिक ताने-बाने का कमजोर होना प्रमुख कारण रहे हैं।

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यदि इस संकट के कारणों पर दृष्टि डाली जाए, तो आधुनिक जीवनशैली की कई परतें सामने आती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, प्रवेश परीक्षाओं का दबाव और असफलता का भय किशोरों और युवाओं को भीतर से तोड़ रहा है। परिवार और समाज की अपेक्षाएँ इतनी अधिक हो गई हैं कि युवा स्वयं को लगातार कसौटी पर खड़ा महसूस करते हैं। इसके साथ ही मोबाइल और आभासी संसार पर अत्यधिक निर्भरता ने वास्तविक मानवीय संबंधों को कमजोर कर दिया है। संवाद कम हुआ है, संवेदना घट रही है और अकेलापन बढ़ रहा है। संयुक्त परिवारों के विघटन और तेज शहरीकरण ने भी भावनात्मक सहारे की कमी को गहरा किया है।

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नशे की बढ़ती प्रवृत्ति भी युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है। शराब, मादक पदार्थ और जुए जैसी आदतें तनाव से राहत का झूठा भ्रम देती हैं, लेकिन अंततः समस्या को और जटिल बना देती हैं। आर्थिक दबाव, बेरोजगारी और बढ़ती महंगाई ने युवाओं के मन में असुरक्षा और निराशा को जन्म दिया है। ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक रोगों को लेकर गहरा सामाजिक कलंक आज भी मौजूद है, जहाँ इन्हें पागलपन से जोड़कर देखा जाता है। वहीं शहरी समाज में मानसिक बीमारी को कमजोरी मानकर लोग उपचार से कतराते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर किए गए सर्वेक्षण बताते हैं कि मानसिक रोग से ग्रस्त केवल दस से पंद्रह प्रतिशत लोग ही किसी प्रकार का उपचार प्राप्त कर पाते हैं।

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मानसिक रोगों का प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। कम उम्र में शुरू होने वाले विकार अक्सर लंबे समय तक बने रहते हैं और जीवन भर की उत्पादकता को प्रभावित करते हैं। शोध बताते हैं कि ऐसे लोगों में कार्यक्षमता में भारी गिरावट आती है और विकलांगता की संभावना भी बढ़ जाती है। इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। अनुमान है कि मानसिक रोगों के कारण भारत को हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। अवसाद से ग्रस्त व्यक्ति की कार्यक्षमता में बीस से तीस प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। सामाजिक स्तर पर पारिवारिक कलह, तलाक, अपराध और सामाजिक विघटन जैसी समस्याएँ भी बढ़ती हैं। यदि युवाओं का मन अस्वस्थ रहेगा, तो जनसंख्या का वह लाभ, जिसे देश की सबसे बड़ी शक्ति माना जाता है, बोझ में बदल सकता है।

इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए बहुस्तरीय और समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है। सबसे पहला कदम है समय पर पहचान। विद्यालयों और महाविद्यालयों में नियमित रूप से मानसिक स्वास्थ्य की जाँच की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि प्रारंभिक लक्षणों को पहचाना जा सके। जागरूकता अभियानों के माध्यम से यह संदेश समाज तक पहुँचना चाहिए कि मानसिक रोग भी अन्य बीमारियों की तरह उपचार योग्य हैं। मीडिया, सिनेमा, खेल और सार्वजनिक जीवन से जुड़े प्रभावशाली लोगों की भागीदारी से कलंक को तोड़ा जा सकता है।

नीतिगत स्तर पर भी ठोस बदलाव जरूरी हैं। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति को वर्तमान चुनौतियों के अनुरूप अद्यतन करना होगा। जिला स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत किया जाना चाहिए, ताकि ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों तक उपचार पहुँच सके। शिक्षण संस्थानों में प्रशिक्षित परामर्शदाताओं की नियुक्ति अनिवार्य हो। परिवारों को भी यह सिखाया जाना चाहिए कि बच्चों के साथ संवाद कैसे बनाए रखें और उनकी भावनाओं को कैसे समझें। युवाओं को संतुलित जीवनशैली, शारीरिक गतिविधि और सामाजिक जुड़ाव के महत्व के बारे में शिक्षित करना होगा।

सरकार, समाज और निजी क्षेत्र को मिलकर मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी। बजट में पर्याप्त संसाधन आवंटित किए जाएँ और स्थानीय स्तर पर कार्यरत संस्थाओं को सशक्त बनाया जाए। कार्यस्थलों पर कर्मचारियों के मानसिक कल्याण के लिए सहायता कार्यक्रम लागू किए जाएँ, ताकि युवा कामकाजी वर्ग भी सहारा पा सके।

अंततः यह समझना होगा कि मानसिक स्वास्थ्य कोई गौण विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र की नींव से जुड़ा प्रश्न है। यदि आज हम युवाओं के मन की पीड़ा को अनसुना करते रहे, तो आने वाला कल और अधिक अंधकारमय हो सकता है। समय रहते उठाए गए कदम न केवल लाखों जीवन बचा सकते हैं, बल्कि एक संवेदनशील, स्वस्थ और सशक्त भारत के निर्माण का मार्ग भी प्रशस्त कर सकते हैं। युवाओं का स्वस्थ मन ही राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी है, और उसकी रक्षा करना हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।

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