भारत-अमेरिका रिश्तों में नया मोड़ टैरिफ कटौती के पीछे बदलती वैश्विक राजनीति और भारत की बढ़ती ताकत

लंबे समय से जिस भारत-अमेरिका ट्रेड डील का इंतजार किया जा रहा था

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ को घटाकर 18% करना सिर्फ एक व्यापारिक फैसला नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक समीकरणों, भारत की रणनीतिक मजबूती और अमेरिका की व्यावहारिक मजबूरियों का संकेत देता है। लंबे समय से जिस भारत-अमेरिका ट्रेड डील का इंतजार किया जा रहा था, वह आखिरकार ऐसे समय में सामने आई है जब दुनिया युद्ध, ऊर्जा संकट, महंगाई और भू-राजनीतिक खींचतान से जूझ रही है। इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि भारत अब केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक संतुलन में निर्णायक भूमिका निभाने वाला देश बन चुका है।
 
ट्रम्प का भारत पर नरम रुख पहली नजर में उनकी व्यक्तिगत कूटनीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ दोस्ताना संबंधों का नतीजा लगता है, लेकिन गहराई से देखने पर इसके पीछे ठोस आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक कारण दिखाई देते हैं। अमेरिका इस समय एक जटिल स्थिति में है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है, चीन के साथ अमेरिका का टकराव लगातार तेज हो रहा है और घरेलू स्तर पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था महंगाई व उद्योगों की लागत से दबाव में है। ऐसे में अमेरिका के लिए भारत जैसा बड़ा बाजार, भरोसेमंद साझेदार और रणनीतिक सहयोगी बेहद अहम हो गया है।
 
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल बाजार है। 1.4 अरब की आबादी, तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग और उपभोक्ता मांग अमेरिका की बड़ी कंपनियों के लिए सुनहरा अवसर है। ट्रम्प की ‘बाय अमेरिकन’ नीति तभी सफल हो सकती है जब अमेरिकी उत्पादों के लिए बड़े और स्थिर बाजार उपलब्ध हों। भारत ने अमेरिका से 500 अरब डॉलर से ज्यादा के ऊर्जा, तकनीक, कृषि और अन्य उत्पाद खरीदने की प्रतिबद्धता जताकर यह साफ कर दिया कि वह केवल टैरिफ में राहत नहीं चाहता, बल्कि दीर्घकालिक साझेदारी के लिए तैयार है। यह प्रस्ताव अमेरिकी उद्योगों, खासकर ऊर्जा और टेक सेक्टर के लिए बेहद आकर्षक है।
 
ऊर्जा के मोर्चे पर भारत की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। रूस से सस्ता तेल खरीदना भारत की मजबूरी रही है, क्योंकि उसकी ऊर्जा जरूरतें विशाल हैं और घरेलू उत्पादन सीमित है। अमेरिका ने इसी को लेकर भारत पर अतिरिक्त 25% टैरिफ लगाया था, लेकिन हकीकत यह है कि भारत को पूरी तरह रूस से अलग करना न तो आसान है और न ही व्यावहारिक। ट्रम्प प्रशासन यह समझ चुका है कि दबाव की नीति भारत जैसे आत्मनिर्भर और रणनीतिक रूप से स्वतंत्र देश पर ज्यादा देर तक कारगर नहीं रहेगी। इसके बजाय, अमेरिका ने भारत को अपने पक्ष में करने के लिए प्रोत्साहन का रास्ता चुना। ज्यादा अमेरिकी तेल और गैस की खरीद से अमेरिका को आर्थिक फायदा होगा और भारत को ऊर्जा स्रोतों में विविधता मिलेगी।
 
ट्रम्प के नरम पड़ने की एक बड़ी वजह चीन फैक्टर भी है। अमेरिका और चीन के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में लगातार बिगड़े हैं। व्यापार युद्ध, तकनीकी प्रतिबंध और सैन्य प्रतिस्पर्धा ने दोनों देशों को आमने-सामने खड़ा कर दिया है। ऐसे में अमेरिका को एशिया में एक मजबूत संतुलनकारी शक्ति की जरूरत है, और भारत इस भूमिका के लिए सबसे उपयुक्त देश है। भारत की अर्थव्यवस्था चीन के बाद एशिया में सबसे बड़ी है, उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था अमेरिका के लिए वैचारिक रूप से भी अनुकूल है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी रणनीतिक स्थिति बेहद अहम है। भारत को नाराज करना या उस पर अत्यधिक दबाव बनाना अमेरिका के दीर्घकालिक हितों के खिलाफ जाता।
 
भारत की कूटनीतिक परिपक्वता भी इस डील में साफ नजर आती है। भारत ने न तो जल्दबाजी में कोई प्रतिक्रिया दी और न ही दबाव में अपने हितों से समझौता किया। डब्यूटीओ में जवाबी ड्यूटी का प्रस्ताव देकर भारत ने यह संकेत दिया कि वह अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करना जानता है। साथ ही, अमेरिका के साथ संवाद के दरवाजे खुले रखकर यह भी दिखाया कि वह टकराव नहीं, बल्कि संतुलन चाहता है। यही संतुलित रुख अंततः अमेरिका को बातचीत की मेज पर वापस लाया।
 
ट्रम्प की व्यक्तिगत राजनीति भी इस फैसले में अहम रही। ट्रम्प खुद को एक ऐसे नेता के रूप में पेश करना चाहते हैं जो डील करना जानता है। भारत जैसे बड़े देश के साथ ट्रेड डील उनकी छवि को मजबूत करती है, खासकर तब जब वे इसे अपनी सख्त टैरिफ नीति की “सफलता” के रूप में दिखा सकते हैं। 18% टैरिफ को वे रियायत नहीं, बल्कि अपनी बातचीत की जीत के तौर पर पेश कर रहे हैं। साथ ही, मोदी जैसे लोकप्रिय और मजबूत नेता के साथ दोस्ती दिखाना ट्रम्प के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर सकारात्मक संदेश देता है।
 
भारत की आंतरिक मजबूती भी अमेरिका के बदले रुख की वजह बनी है। पिछले एक दशक में भारत ने बुनियादी ढांचे, डिजिटल अर्थव्यवस्था, विनिर्माण और रक्षा क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहल ने यह संदेश दिया है कि भारत अब केवल आयात पर निर्भर रहने वाला देश नहीं रहा। विदेशी कंपनियों के लिए भारत सिर्फ बाजार नहीं, बल्कि उत्पादन का केंद्र भी बन रहा है। अमेरिका यह समझता है कि भारत के साथ सहयोग का मतलब भविष्य की वैश्विक सप्लाई चेन में हिस्सेदारी हासिल करना है।
 
राजनीतिक दृष्टि से भी भारत की स्थिति मजबूत हुई है। वैश्विक मंचों पर भारत की आवाज अब ज्यादा प्रभावशाली है। जी-20 की अध्यक्षता, क्वाड जैसे मंचों में सक्रिय भूमिका और विकासशील देशों के मुद्दों पर नेतृत्व ने भारत को एक भरोसेमंद वैश्विक खिलाड़ी बना दिया है। अमेरिका जैसे देश के लिए ऐसे साझेदार को नजरअंदाज करना मुश्किल है।
 
इस पूरे घटनाक्रम से यह भी साफ होता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध अब केवल ताकत के दम पर नहीं चलते। आर्थिक परस्पर निर्भरता, रणनीतिक जरूरतें और राजनीतिक संतुलन मिलकर फैसले तय करते हैं। अमेरिका ने यह महसूस किया कि भारत पर सख्ती उसे चीन या रूस के और करीब धकेल सकती है, जो अमेरिकी हितों के खिलाफ है। इसलिए टैरिफ में कटौती कर और ट्रेड डील की घोषणा कर अमेरिका ने रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश की है।
 
अंततः यह डील भारत के लिए भी एक अवसर है और एक जिम्मेदारी भी। अवसर इसलिए कि कम टैरिफ से भारतीय निर्यात को बढ़ावा मिलेगा और अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा आसान होगी। जिम्मेदारी इसलिए कि भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए संतुलन साधना होगा, ताकि वह किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भर न हो। ट्रम्प का नरम पड़ना इस बात का संकेत है कि भारत अब वैश्विक मंच पर कमजोर पक्ष नहीं, बल्कि ऐसा देश है जिसके साथ शर्तों पर बात होती है।
 
यह समझौता दिखाता है कि भारत की ताकत केवल उसकी अर्थव्यवस्था या आबादी में नहीं, बल्कि उसकी धैर्यपूर्ण कूटनीति, स्पष्ट प्राथमिकताओं और आत्मविश्वास में है। अमेरिका का रुख बदलना इस बात की स्वीकारोक्ति है कि भारत के बिना वैश्विक समीकरण पूरे नहीं होते। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह नई शुरुआत भारत-अमेरिका रिश्तों को किस ऊंचाई तक ले जाती है, लेकिन इतना तय है कि इस डील ने भारत की बढ़ती वैश्विक हैसियत पर एक बार फिर मुहर लगा दी है।
 
कांतिलाल मांडोत
 
 

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