चूल्हे से चाँद तक: महिलाओं की पहचान की बदलती कहानी

दीवारों के भीतर सुलगते सपने, बाहर बदलती दुनिया खामोशी की आग: स्त्री और उसकी अनकही महत्वाकांक्षा

Swatantra Prabhat UP Picture
Published On

कृति आरके जैन

रसोई की दीवारें केवल ईंट-सीमेंट की बनी हुई संरचना नहीं होतींवे उस सामाजिक सोच की मूक प्रतीक हैं जिसने सदियों से महिलाओं की दुनिया को सीमाओं में बाँध दिया। इन दीवारों के भीतर सिर्फ़ भोजन नहीं पकताबल्कि अनगिनत सपने भी धीमी आँच पर सुलगते रहते हैं। यहाँ हर दिन समझौते होते हैं—खुद सेअपनी इच्छाओं सेअपनी पहचान से। बाहर की दुनिया तेज़ी से बदल रही हैपर इन दीवारों के भीतर आज भी वही पुरानी अपेक्षाएँ गूँजती हैं। फिर भीइन्हीं सीमाओं के बीच एक दृढ़ आवाज़ जन्म लेती है—मैं इससे अधिक हूँऔर इससे आगे जा सकती हूँ।

भारतीय समाज में महिला को अक्सर त्याग और सहनशीलता की प्रतिमा बना दिया गया है। उसकी सफलता इस कसौटी पर परखी जाती है कि उसने परिवार के लिए कितना त्याग कियान कि उसने अपने लिए क्या हासिल किया। बचपन से उसे सिखाया जाता है कि सपने देखना ठीक हैपर उन्हें सीमाओं में रखना ज़रूरी है। धीरे-धीरे वह भी मान लेती है कि उसकी ज़िंदगी की प्राथमिकता हमेशा दूसरे होंगे। फिर भीउसके मन के किसी कोने में उसकी इच्छाएँ जीवित रहती हैं—शांतधैर्यवान और अपने सही समय की प्रतीक्षा करती हुई।

आज की महिला एक साथ कई भूमिकाएँ निभा रही है। वह माँ हैपत्नी हैबहू हैलेकिन इन सबसे पहले वह एक संपूर्ण इंसान है—जिसके अपने सपने और आकांक्षाएँ हैं। दिन भर वह घर की ज़िम्मेदारियों में उलझी रहती हैपर रात के सन्नाटे में उसका मन जाग उठता है। तब वह किताब खोलती हैऑनलाइन कक्षाओं में समय लगाती हैया अपने भविष्य की नई तस्वीर गढ़ती है। समाज भले ही उसकी इस कोशिश को अनदेखा करेलेकिन उसके भीतर आत्मनिर्भर बनने की आग हर दिन और प्रखर होती जाती है।

बेटियों का कागज़ी कवच और सामाजिक बेड़ियां Read More बेटियों का कागज़ी कवच और सामाजिक बेड़ियां

कई बार महिलाओं के सपने उसी रसोई से आकार लेते हैंजहाँ कभी उन्हें सीमित कर दिया गया था। वर्षों तक स्वाद और मेहनत से खाना बनाने वाली महिला एक दिन समझ पाती है कि यही उसका हुनर है। वह अपने काम को घर की चारदीवारी से बाहर लाने का साहस जुटाती है। शुरुआत में ताने मिलते हैंशक किया जाता हैलेकिन वह पीछे नहीं हटती। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है और उसका हुनर उसकी पहचान बन जाता है। यह बदलाव सिर्फ़ कमाई तक सीमित नहीं रहताबल्कि आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता की नींव रख देता है।

लालची नेता और बिकता पत्रकार,मिलकर कर रहे देश का बंटाधार Read More लालची नेता और बिकता पत्रकार,मिलकर कर रहे देश का बंटाधार

हालाँकि यह सफ़र आसान नहीं होता। समय की कमीशारीरिक थकानपरिवार की अपेक्षाएँ और समाज की आलोचना—हर मोड़ पर नई बाधाएँ खड़ी हो जाती हैं। कई बार महिलाओं को यह महसूस कराया जाता है कि उनका आगे बढ़ना घर के संतुलन को बिगाड़ देगा। अपराधबोध चुपचाप उनके मन में जगह बना लेता है। फिर भी कुछ महिलाएँ इन दबावों के बावजूद आगे बढ़ती हैंक्योंकि वे जानती हैं कि उनका सपना किसी का नुकसान नहीं करताबल्कि दूसरों को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

संविधान और लोकतंत्र: खतरा या भ्रम? Read More संविधान और लोकतंत्र: खतरा या भ्रम?

संघर्ष की इस राह पर महिलाएँ कई बार गिरती हैंलेकिन हर बार थोड़ा और सशक्त होकर उठती हैं। वे समझ जाती हैं कि सफलता का अर्थ पूर्णता नहींबल्कि निरंतर प्रयास और धैर्य है। उनके चेहरे पर थकान साफ़ दिखती हैपर आँखों में संतोष की रोशनी होती है। वे जानती हैं कि यह लड़ाई सिर्फ़ उनकी नहीं है—वे उन अनगिनत महिलाओं के लिए रास्ता बना रही हैंजो अभी खामोश हैंलेकिन सपने देखना नहीं छोड़ा है।

आज भारत में ऐसी हज़ारों कहानियाँ हैं जो रसोई की दीवारों को पीछे छोड़ चुकी हैं। महिलाएँ प्रशासनविज्ञानशिक्षाकला और व्यापार के हर क्षेत्र में अपनी सशक्त पहचान गढ़ रही हैं। उन्होंने यह साबित किया है कि महत्वाकांक्षा किसी जगह या भूमिका की मोहताज नहीं होती। जब अवसर और भरोसा मिलता हैतो महिलाएँ असंभव को भी संभव कर दिखाती हैं। उनकी सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहींबल्कि समाज की जड़ सोच में आए बदलाव का स्पष्ट संकेत है।

रसोई की दीवारें अब सिर्फ़ बंधन का प्रतीक नहीं रहीं। वे उस बदलाव की साक्षी बन रही हैंजहाँ महिलाएँ डर और संकोच को पीछे छोड़कर आगे बढ़ रही हैं। उनके दबे हुए सपने अब खामोश नहींवे आवाज़ बन चुके हैं। यह आवाज़ धीरे-धीरे पूरे समाज में गूँज रही है—बराबरीसम्मान और स्वतंत्रता की। क्योंकि जब एक महिला अपने सपनों को जीने का साहस करती हैतो वह केवल अपना भविष्य नहीं बदलतीबल्कि आने वाली पूरी पीढ़ी की दिशा तय करती है। यही असली क्रांति है—बिना शोरबिना नारेरसोई की दीवारों से बाहर निकलकर दुनिया को जीत लेने की क्रांति।

About The Author