लालची नेता और बिकता पत्रकार,मिलकर कर रहे देश का बंटाधार
प्रतिक संघवी, राजकोट (गुजरात)
आजाद भारत की नींव जिन मूल्यों पर रखी गई थी, उनमें नेता और पत्रकार—दोनों को लोकतंत्र का स्तंभ माना गया था।नेता सत्ता में रहकर जनता की सेवा करेगा और पत्रकार सत्ता से टकराकर जनता की रक्षा करेगा—यही लोकतांत्रिक संतुलन था। और सभी आजादी के सपूतों ने भी आजाद भारत का यही सपना देखा था।लेकिन आज हालात यह हैं कि नेता सत्ता के भूखे हो चुके हैं और पत्रकारिता का बड़ा हिस्सा सौदेबाज़ी का मंच बन गया है। साथ में लेखक और अब तो सोशीयल मीडिया भी घुस गया है। जब सत्ता लालच में अंधी हो जाए और सच कीमत देखकर बोला जाता हे मिलजुट के दिखावे तो होते हे लेकिन देश का बंटाधार तय हो जाता है ।
आजाद भारत में नेता और पत्रकारों की जिम्मेदारी
आजादी के बाद नेता का धर्म था—संविधान, समानता और देश की एकता ।पत्रकार का कर्तव्य था—डर के बिना सवाल, दबाव के बिना सच और सत्ता के सामने सीधी आंख। दोनों का रिश्ता टकराव का था, गठजोड़ का नहीं ।लेकिन आज यही टकराव खत्म कर दिया गया है—और वहीं से लोकतंत्र बीमार पड़ा। जो सही हे वह सही हे और जो गलत हे वह गलत ही हे यह लेखकों और पत्रकारों की सोच और आचरण होना चाहिए सामने नेता के पास उसका क्षेत्र और राज्य या देश की जनता के लिए जो न्याय और नीति सही हे वहीं निर्णय लेने चाहिए या उसकी आगेवानी करनी चाहिए न की किसी एक विचारधारा की।
वर्तमान स्थिति: जब आदर्श गिरवी रख दिए गए
आज कई नेता चुनाव को जनसेवा नहीं, निवेश मानते हैं।सत्ता में जाकर उस निवेश की वसूली होती है—नीतियों से, ठेकों से और संस्थाओं की चुप्पी से।वहीं पत्रकारिता का एक बड़ा वर्ग अब सच नहीं खोजता, वह “मैनेजमेंट” निभाता है। और कुछ तो यहां तक लिखते और दिखते हे कि हम यह खबर की पुष्टि नहीं करते !? अब खबरें तय होती हैं, बहसें स्क्रिप्टेड होती हैं और सवाल चुनकर पूछे जाते हैं।जब नेता जवाबदेही छोड़ दें और पत्रकार निर्भयता तो लोकतंत्र सिर्फ नाम भर रह जाता है।
लोकतंत्र को आहत करते चार सच्चे उदाहरण
पहला उदाहरण:
एक बड़े घोटाले के सबूत मौजूद होते हैं, लेकिन खबर इसलिए नहीं चलती क्योंकि आरोपी सत्ता के करीब है।
सच जानबूझकर दबा दिया जाता है—क्योंकि सच बोलना महंगा पड़ता है।
दूसरा उदाहरण:
एक नेता नफरत फैलाता है, पत्रकार उसे बिना रोक-टोक लाइव दिखाता है।क्योंकि जहर विवाद पैदा करता है और विवाद टीआरपी देता है।यही काम सोशीयल मीडिया मैनेज करने में हो रहा हे और नेता और पक्ष के द्वारा करोड़ों रूपये लुटाए जा रहे हे। पुल गिरता है, लोग मरते हैं। शुरुआत में शोर होता है, फिर फाइलें बंद हो जाती है। दोषी बच जाते हैं, सिस्टम मुस्कुरा देता है।
चौथा उदाहरण:
चुनाव में बेरोजगारी और महंगाई गायब रहती है। धर्म, जाति और भावनात्मक जहर पर बहस होती है।
जनता मुद्दों से भटकाई जाती है—और लोकतंत्र हारता हे। यह चारो उदाहरण आज की तस्वीर बया करता हे और साबित करता हे की कैसे पत्रकार / मीडिया / लेखक बिकता हे और नेता सता की लालच में कोईभी हद पार कर देते हे। शाम तक भ्रष्टाचारी रहा नेता सुबह पक्ष बदल दे तो वह राष्ट्रवादी हो जाता हे।:)
अंतिम और सबसे तीखा सच
अब देश को यह भ्रम छोड़ देना चाहिए कि लोकतंत्र सिर्फ नेताओं से खतरे में है। सच यह है कि जब पत्रकार बिक जाए और जनता चुप रहे—तब तानाशाही को किसी तख्तापलट की जरूरत नहीं पड़ती।
जो नेता सवाल से डरता है, वह देश का सेवक नहीं हो सकता। और जो पत्रकार सत्ता से डरता है, वह पत्रकार कहलाने का हकदार नहीं।आज सबसे बड़ा खतरा यह नहीं कि झूठ बोला जा रहा है,सबसे बड़ा खतरा यह है कि सच जानबूझकर चुप कराया जा रहा है—और उसे “समझदारी” कहा जा रहा है। और अब तिरंगे की बात—सबसे कड़वी लेकिन जरूरी तिरंगा कोई सजावट नहीं है। वह कोई इवेंट की फोटो या सोशल मीडिया पोस्ट नहीं है।
तिरंगा एक जिम्मेदारी है।
तिरंगा वही उठाए जो सच बोलने का साहस रखता हो , सवाल पूछने की हिम्मत रखता हो और देश को कुर्सी से ऊपर रखने की औकात रखता हो। क्योंकि अगर नेता बिके, पत्रकार झुके और जनता सोती रही तो देश पर हमला बाहर से नहीं होगा, देश अंदर से ही मर जाएगा। और एक बात हमेशा याद रखना नीति और न्याय छोड़ने वाले नेता के हाथ तिरंगे को हाथ छू नहीं सकते लालची और बिकने वाले पत्रकार तिरंगे को छू नहीं सकते धर्म तोड़ मरोड़ने वाले गुरु घंटाल तिरंगे को छू नहीं सकते और भ्रष्टाचारी अधिकारी तिरंगे को छू नहीं सकते। क्योंकि यह शहीदों और सच्चे देश भक्तों की आन बान शान हे उसे यू खो नहीं सकते।।।
