राष्ट्रीय मतदाता दिवस: जागरूक मतदाता, मजबूत लोकतंत्र का आधार

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- महेन्द्र तिवारी

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण राष्ट्र के लिए लोकतंत्र केवल एक शासन प्रणाली नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है। लोकतंत्र जीवित रहता है नागरिकों की भागीदारी से, और उसकी सबसे सशक्त अभिव्यक्ति है -मतदान। भारत जैसे देश में यह सत्य और भी गहरा हो जाता है, जहाँ एक मत केवल सरकार नहीं चुनता, बल्कि समाज की दिशा, नीति की प्राथमिकता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा भी तय करता है।

यह संयोग नहीं है कि भारत निर्वाचन आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई थी, ठीक एक दिन पहले जब देश औपचारिक रूप से गणतंत्र बना। संविधान निर्माताओं ने स्पष्ट रूप से समझ लिया था कि लोकतंत्र की सफलता केवल लिखित संविधान से नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और शक्तिशाली चुनावी संस्था से सुनिश्चित होगी। छह दशक बाद, जब निर्वाचन आयोग ने 2011 में अपने 60 वर्ष पूरे किए, तब राष्ट्रीय मतदाता दिवस की शुरुआत की गई। इसका उद्देश्य केवल उत्सव मनाना नहीं था, बल्कि उस चिंता को संबोधित करना था जो धीरे-धीरे उभर रही थी—मतदाताओं, विशेषकर युवाओं, की घटती रुचि और बढ़ती उदासीनता।

आज जब भारत 96 करोड़ से अधिक मतदाताओं वाला देश बन चुका है, तो इस दिवस की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। यह दिवस एक सेतु का कार्य करता है—अतीत के संघर्षों और भविष्य की संभावनाओं के बीच। आधुनिक भारत में मतदान केवल एक संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि एक नैतिक उत्तरदायित्व है। निर्वाचन आयोग द्वारा प्रतिवर्ष एक नई 'थीम' के साथ इस दिवस का आयोजन करना इस बात का संकेत है कि लोकतंत्र को निरंतर नवीनीकरण की आवश्यकता होती है।

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'कोई भी मतदाता पीछे न छूटे' जैसा संकल्प केवल एक नारा नहीं है, बल्कि यह उस अंतिम छोर के व्यक्ति तक पहुँचने की प्रतिबद्धता है, जो सामाजिक या भौगोलिक कारणों से मुख्यधारा से कटा हुआ है। राष्ट्रीय मतदाता दिवस का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होता है जब एक युवा, जो अभी-अभी 18 वर्ष का हुआ है, अपने मतदाता पहचान पत्र को केवल एक पहचान पत्र के रूप में नहीं, बल्कि देश के भाग्य-विधाता बनने के अधिकार पत्र के रूप में देखता है। यह दिवस युवाओं को राजनीतिक उदासीनता की गर्त से निकालकर भागीदारी की रोशनी में लाने का प्रयास है।

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वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यदि हम देखें, तो मतदान के प्रति एक अजीब सी विडंबना दिखाई देती है। जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में लोग भीषण गर्मी या ठंड की परवाह किए बिना मिलों पैदल चलकर अपनी बारी का इंतजार करते हैं, वहीं शहरी क्षेत्रों में 'छुट्टी' का आनंद लेना अधिक प्राथमिकता बन गया है। इस 'शहरी उदासीनता' पर प्रहार करना राष्ट्रीय मतदाता दिवस का एक प्रमुख लक्ष्य है।

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यह दिवस हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि यदि हम अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सड़कों पर उतरने का हक रखते हैं, तो हमें मतदान केंद्र तक जाने का कर्तव्य भी निभाना होगा। लोकतंत्र में निष्क्रियता की कोई जगह नहीं होती; यहाँ अनुपस्थिति का अर्थ अपनी शक्ति किसी और को सौंप देना है। इसलिए, 25 जनवरी का दिन हर भारतीय को यह सोचने पर विवश करता है कि क्या वह केवल एक उपभोक्ता नागरिक है या एक सहभागी नागरिक।

प्रौद्योगिकी के इस युग में निर्वाचन आयोग ने 'स्वीप' (SVEEP) जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से जिस प्रकार की जागरूकता फैलाई है, वह वैश्विक स्तर पर अनुकरणीय है। डिजिटल इंडिया के दौर में मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया को उंगलियों के पोरों पर ला देना एक क्रांतिकारी कदम है। वोटर हेल्पलाइन ऐप, ऑनलाइन सुधार और ई-एपिक (e-EPIC) जैसी सुविधाओं ने उन बाधाओं को दूर किया है जो कभी मतदाताओं को चुनावी प्रक्रिया से दूर रखती थीं।

राष्ट्रीय मतदाता दिवस इन्हीं तकनीकी सफलताओं और मानवीय प्रयासों के संगम का दिन है। यह उस निर्वाचन अधिकारी के प्रति सम्मान व्यक्त करने का दिन है जो लद्दाख की बर्फीली चोटियों से लेकर अंडमान के दूरदराज के द्वीपों तक सिर्फ एक मतदाता के लिए भी पोलिंग बूथ स्थापित करता है। यह उस सुरक्षाकर्मी के प्रति कृतज्ञता का दिन है जो निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करने के लिए अपना जीवन दांव पर लगाता है। भारतीय लोकतंत्र की यह मशीनरी दुनिया के लिए एक केस स्टडी है, और राष्ट्रीय मतदाता दिवस इस मशीनरी के केंद्र में स्थित 'मतदाता' को सम्मानित करने का अवसर प्रदान करता है।

हालाँकि, जागरूकता के इस महाभियान के सामने चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। सूचना क्रांति के इस दौर में 'फेक न्यूज' और भ्रामक प्रचार लोकतंत्र के लिए नए खतरे बनकर उभरे हैं। मतदाताओं को न केवल यह बताना जरूरी है कि 'वोट देना है', बल्कि यह भी सिखाना अनिवार्य है कि 'विवेकपूर्ण वोट' कैसे देना है। जाति, धर्म और संकीर्ण क्षेत्रीयता के घेरों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में मतदान करना ही इस दिवस की सच्ची उपलब्धि होगी। धनबल और बाहुबल की छाया से लोकतंत्र को मुक्त कराने के लिए मतदाता का जागरूक होना पहली शर्त है। राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर ली जाने वाली शपथ—कि हम बिना किसी प्रलोभन के निष्पक्ष मतदान करेंगे—मात्र औपचारिकता नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसे हमारे राजनीतिक आचरण का हिस्सा बनना चाहिए। जब तक मतदाता प्रलोभन को ठुकराने का साहस नहीं दिखाएगा, तब तक राजनीति की गंदगी को साफ करना संभव नहीं होगा।

समावेशिता इस दिवस का एक अन्य महत्वपूर्ण आयाम है। वर्षों तक समाज के कुछ वर्ग—जैसे महिलाएं, दिव्यांगजन और ट्रांसजेंडर समुदाय—चुनावी प्रक्रिया में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराने के लिए संघर्ष करते रहे। राष्ट्रीय मतदाता दिवस ने इन वर्गों को एक विशेष मंच दिया है। पिंक बूथों की स्थापना, दिव्यांगों के लिए घर से मतदान की सुविधा और थर्ड जेंडर के लिए अलग से पंजीकरण जैसे कदमों ने यह सिद्ध किया है कि लोकतंत्र तभी पूर्ण होता है जब वह सबके लिए सुलभ हो। महिलाओं का बढ़ता मतदान प्रतिशत इस बात का प्रमाण है कि भारत का लोकतंत्र अब घर की चारदीवारी से निकलकर नीति-निर्धारण के केंद्र तक पहुँच रहा है। यह सामाजिक परिवर्तन का वह मूक आंदोलन है, जिसे राष्ट्रीय मतदाता दिवस के माध्यम से स्वर प्राप्त हुआ है।

भविष्य की ओर देखते हुए, हमें 'एक राष्ट्र, एक मतदाता सूची' और 'रिमोट वोटिंग' जैसे विचारों पर गंभीरता से विचार करना होगा। भारत एक ऐसा देश है जहाँ बड़ी आबादी रोजगार और शिक्षा के लिए प्रवास करती है। ऐसे में करोड़ों मतदाता अपने मताधिकार से वंचित रह जाते हैं क्योंकि वे मतदान के दिन अपने गृह क्षेत्र में उपस्थित नहीं रह पाते। तकनीक के माध्यम से इस समस्या का समाधान ढूंढना अगली बड़ी लोकतांत्रिक क्रांति होगी। राष्ट्रीय मतदाता दिवस हमें इन सुधारों के प्रति मानसिक रूप से तैयार करता है। यह हमें बताता है कि लोकतंत्र एक जड़ प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक गतिशील यात्रा है, जिसे समय के साथ परिष्कृत होना ही होगा।

लेख के अंत में, यह समझना आवश्यक है कि संविधान निर्माताओं ने हमें जो अधिकार दिए हैं, उनकी रक्षा केवल कानून से नहीं, बल्कि नागरिकों की सतर्कता से होती है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि यदि हम अपने लोकतंत्र की रक्षा करना चाहते हैं, तो हमें अपनी स्वतंत्रता को किसी भी व्यक्ति के चरणों में समर्पित नहीं करना चाहिए। राष्ट्रीय मतदाता दिवस इसी 'संवैधानिक नैतिकता' की याद दिलाने वाला दिवस है। यह प्रत्येक भारतीय को यह एहसास कराता है कि भले ही वह सत्ता में न हो, लेकिन सत्ता किसके पास होगी, इसका निर्णय उसी के हाथ में है। मतदान की वह स्याही जो उंगली पर लगती है, वह मात्र एक निशान नहीं है, बल्कि वह आधुनिक भारत के निर्माण में हमारे योगदान का हस्ताक्षर है।

अतः, 25 जनवरी को यह संकल्प करें कि हम न केवल स्वयं मतदान करेंगे, बल्कि अपने आस-पास के प्रत्येक व्यक्ति को इसके लिए प्रेरित करेंगे। लोकतंत्र की मजबूती हमारे सक्रिय सहयोग में है। यह शपथ केवल औपचारिक शब्द नहीं है, बल्कि लोकतंत्र के प्रति पुनः प्रतिबद्ध होने का अवसर है। यदि भारत को एक सशक्त, समावेशी और भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र बनाना है, तो मतदान को उत्सव नहीं, कर्तव्य बनाना होगा। जय हिंद, जय लोकतंत्र।

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