सन्यास या साम्राज्य? 50 करोड़ का आश्रम, करोड़ों की कारें और योगी से नजदीकी कौन हैं सतुआ बाबा उर्फ संतोष तिवारी?

मिडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में सतुआ बाबा की जड़ें ललितपुर से जुड़ती हैं। असली नाम संतोष तिवारी। पढ़ाई के लिए बनारस आए और यहीं उन्होंने सन्यास की राह पकड़ ली।

सन्यास या साम्राज्य? 50 करोड़ का आश्रम, करोड़ों की कारें और योगी से नजदीकी कौन हैं सतुआ बाबा उर्फ संतोष तिवारी?

स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।
दया शंकर त्रिपाठी की रिपोर्ट।
 

 इस बार माघ मेले में आस्था से ज़्यादा चर्चा अगर किसी की है, तो वह हैं सतुआ बाबा। वजह साधारण नहीं है—एक ओर संत का चोला, दूसरी ओर 3 करोड़ और 4.50 करोड़ की लग्जरी कारें, प्राइवेट जेट से यात्रा और सत्ता के शीर्ष से नजदीकियां। सवाल उठना लाज़मी है—यह सन्यास है या संपन्नता का प्रदर्शन? 
 
माघ मेले में सतुआ बाबा का काफिला देखते ही श्रद्धालु नहीं, बल्कि प्रशासन और मीडिया तक ठिठक गया। बताया जा रहा है कि बाबा के पास मौजूद दो गाड़ियों की कीमत ही करीब 7 करोड़ रुपये है। यहीं से चर्चाओं का सिलसिला शुरू हुआ और बात वाराणसी तक जा पहुंची। जांच में सामने आया कि वाराणसी में सतुआ बाबा का आश्रम करीब 50 करोड़ रुपये का बताया जाता है। इसके अलावा कई लग्जरी गाड़ियां और प्राइवेट जेट से सफर—ये सब ऐसे तथ्य हैं, जो एक संन्यासी जीवन की परिभाषा पर सवाल खड़े करते हैं। इतना ही नहीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से नजदीकियों की चर्चाएं भी माघ मेले में आम रहीं। सत्ता और संत के इस मेल ने बहस को और धार दे दी हैं। 
 
मिडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में सतुआ बाबा की जड़ें ललितपुर से जुड़ती हैं। असली नाम संतोष तिवारी। पढ़ाई के लिए बनारस आए और यहीं उन्होंने सन्यास की राह पकड़ ली। कहा जाता है कि उनका व्यवहार, बोलचाल और संगठन क्षमता ऐसी थी कि वे धीरे-धीरे आश्रम के मुख्य और फिर महामंडलेश्वर बन गए। पर कहानी में मोड़ तब आया, जब यह सामने आया कि सन्यास लेने की जानकारी तक माता- पिता को नहीं थी।
 
परिवार ने इसका विरोध भी किया—सवाल उठाया गया कि बिना सहमति उनका बेटा कैसे सन्यासी बना दिया गया? भावनात्मक पहलू भी कम चौंकाने वाला नहीं है। बाद में मां ने इच्छा जताई कि वे अपने अंतिम दिन छोटे बेटे के साथ बिताना चाहती हैं। उनकी अंतिम सांस वाराणसी के उसी आश्रम में टूटी, जो आज करोड़ों की संपत्ति का केंद्र बताया जा रहा है। चार भाइयों में सबसे छोटे सतुआ बाबा के बड़े भाई पत्रकार थे, जिनकी 2007 में गोली लगने से मौत हो गई थी।
 
कहा जाता है कि इसी घटना के बाद उनके जीवन ने निर्णायक मोड़ लिया।आज स्थिति यह है कि प्रयागराज माघ मेले में सतुआ बाबा सबसे बड़ा चर्चा-बिंदु हैं। सवाल साफ हैं—क्या यह आस्था का नया चेहरा है? या फिर संन्यास की आड़ में खड़ा होता एक भव्य साम्राज्य? आगे की कहानी क्या मोड़ लेती है—इस पर अब सबकी नजरें टिकी हैं। 
 
 

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