संगम की गोद में फिर सजेगा कल्पवास का दिव्य संसार।
नियम, संयम और साधना की अद्भुत साधना
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स्वतंत्र प्रभात
ब्यूरो प्रयागराज।
संगम नगरी प्रयागराज जहां गंगा-यमुना की लहरों में केवल जल नहीं, बल्कि युगों की आस्था बहती है। पूरे विश्व में यदि कहीं कल्पवास की परंपरा जीवंत है, तो वह केवल यही पावन भूमि है माघ मेले के दौरान संगम तट पर नियम, संयम और साधना के साथ एक माह तक निवास करने की इस कठिन लेकिन पुण्यदायी साधना को कल्पवास कहा जाता है।
संगम नगरी प्रयागराज जहां गंगा-यमुना की लहरों में केवल जल नहीं, बल्कि युगों की आस्था बहती है। पूरे विश्व में यदि कहीं कल्पवास की परंपरा जीवंत है, तो वह केवल यही पावन भूमि है माघ मेले के दौरान संगम तट पर नियम, संयम और साधना के साथ एक माह तक निवास करने की इस कठिन लेकिन पुण्यदायी साधना को कल्पवास कहा जाता है।
इस वर्ष पौष शुक्ल एकादशी, यानी 30 दिसंबर तक कल्पवासियों का मेला क्षेत्र में आगमन आरंभ हो जाएगा। जैसे-जैसे तिथियां आगे बढ़ेंगी, संगम की रेत पर श्रद्धा के दीप जलने लगेंगे। पौष शुक्ल पूर्णिमा 3 जनवरी से अनुमानित 20 से 25 लाख कल्पवासी कल्पवास का संकल्प लेकर संगम तट पर बस जाएंगे। यह आध्यात्मिक यात्रा माघ पूर्णिमा, 1 फरवरी तक चलेगी। देश के कोने-कोने से, विभिन्न राज्यों और उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों से श्रद्धालु पहले ही यहां पहुंचने की तैयारी में हैं।
दंडी बाड़ा, आचार्य बाड़ा, तीर्थ- पुरोहितों के बाड़े, खाक चौक और विभिन्न धार्मिक संस्थाओं के शिविरों में कल्पवासियों ने अपने स्थान सुरक्षित करा लिए हैं। संगम तट पर तंबुओं की कतारें किसी साधना-नगरी का आभास कराएंगी। शास्त्रों में भी इस परंपरा का गहरा महत्व बताया गया है। ब्रह्म पुराण के अनुसार पौष शुक्ल एकादशी से माघ शुक्ल एकादशी तक कल्पवास का विधान है,
जबकि वर्तमान समय में पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक कल्पवास की परंपरा प्रचलित है। इस अवधि में श्रद्धालु ब्रह्ममुहूर्त में स्नान, जप, तप, दान और संयमित जीवन के माध्यम से आत्मशुद्धि का मार्ग अपनाते हैं। कल्पवास केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा को ईश्वर से जोड़ने की वह कथा है, जो हर वर्ष संगम की रेत पर फिर से लिखी जाती है—भक्ति, विश्वास और सनातन परंपरा की अमर कहानी।
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