टीबी अब लाइलाज नहीं समय पर पहचान और उपचार से संभव है पूरी तरह स्वस्थ जीवन
आज टीबी का प्रभावी इलाज उपलब्ध है और लाखों मरीज पूरी तरह स्वस्थ होकर सामान्य जीवन जी रहे हैं।
एक समय था जब टीबी यानी क्षय रोग का नाम सुनते ही मरीज और उसके परिवार में डर का माहौल बन जाता था। लोगों को लगता था कि यह बीमारी जीवन भर पीछा नहीं छोड़ेगी और इसका इलाज संभव नहीं है। जानकारी की कमी और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के कारण अनेक मरीज समय पर उपचार नहीं ले पाते थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में चिकित्सा विज्ञान ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। आज टीबी का प्रभावी इलाज उपलब्ध है और लाखों मरीज पूरी तरह स्वस्थ होकर सामान्य जीवन जी रहे हैं। यही कारण है कि अब टीबी को लाइलाज बीमारी नहीं माना जाता बल्कि समय पर पहचान और नियमित उपचार से इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है।
टीबी एक संक्रामक रोग है जो मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करता है। यह बीमारी माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नामक जीवाणु के कारण होती है। संक्रमित व्यक्ति के खांसने छींकने या बोलने के दौरान निकलने वाली सूक्ष्म बूंदों के माध्यम से यह दूसरे लोगों तक फैल सकती है। हालांकि यह बीमारी केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं रहती बल्कि शरीर के अन्य अंगों जैसे हड्डियों लिम्फ नोड्स मस्तिष्क और गुर्दों को भी प्रभावित कर सकती है।
भारत लंबे समय से दुनिया में टीबी से सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2030 तक टीबी उन्मूलन का लक्ष्य रखा है जबकि भारत ने इससे पहले ही टीबी मुक्त बनने का संकल्प लिया था। हालांकि यह लक्ष्य अभी पूरी तरह हासिल नहीं हो पाया है लेकिन सरकार और स्वास्थ्य विभाग की ओर से लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। जागरूकता अभियान बेहतर जांच सुविधाएं और मुफ्त उपचार जैसी योजनाओं ने इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
राजस्थान सहित देश के कई राज्यों में टीबी मरीजों की पहचान के लिए विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं। 24 मार्च से शुरू किए गए 100 दिवसीय टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत हाई रिस्क गांवों और क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग की जा रही है। आधुनिक तकनीक से लैस पोर्टेबल एक्स रे मशीनों का उपयोग किया जा रहा है जो गांव गांव पहुंचकर लोगों की जांच कर रही हैं। इन मशीनों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सॉफ्टवेयर लगा है जो मौके पर ही टीबी की आशंका का संकेत दे सकता है। इससे संदिग्ध मरीजों की पहचान तेजी से हो रही है और उन्हें समय पर उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है।
टीबी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि लोग शुरुआती लक्षणों को सामान्य बीमारी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। दो सप्ताह से अधिक समय तक लगातार खांसी रहना टीबी का प्रमुख संकेत माना जाता है। इसके अलावा बुखार का बार बार आना रात में अत्यधिक पसीना आना वजन कम होना भूख न लगना सीने में दर्द होना सांस फूलना थकान बने रहना और बलगम में खून आना भी इसके महत्वपूर्ण लक्षण हैं। यदि किसी व्यक्ति में ये लक्षण दिखाई दें तो तुरंत जांच करानी चाहिए। समय पर जांच होने से बीमारी गंभीर होने से पहले ही पकड़ में आ जाती है।
आज टीबी की जांच पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान और सटीक हो गई है। न्यूक्लिक एसिड एम्प्लीफिकेशन टेस्ट जैसी आधुनिक जांच तकनीकों के माध्यम से कुछ ही समय में रोग की पुष्टि की जा सकती है। देशभर में सैकड़ों आधुनिक मशीनें स्थापित की गई हैं जिनसे छिपे हुए मरीज भी सामने आ रहे हैं। इससे संक्रमण के प्रसार को रोकने में मदद मिल रही है और मरीजों को शीघ्र उपचार मिल रहा है।
टीबी के इलाज में सबसे महत्वपूर्ण बात नियमित दवा सेवन है। सरकार की ओर से टीबी मरीजों को मुफ्त दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। उपचार की अवधि सामान्यतः छह महीने या उससे अधिक हो सकती है जो बीमारी की गंभीरता पर निर्भर करती है। कई बार मरीज शुरुआती सुधार के बाद दवाएं लेना बंद कर देते हैं जिससे बीमारी दोबारा उभर सकती है और दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो सकती है। इसलिए चिकित्सकों की सलाह के अनुसार पूरा उपचार लेना अत्यंत आवश्यक है।
पोषण भी टीबी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। संतुलित आहार शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और मरीज को जल्दी स्वस्थ होने में सहायता करता है। पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन विटामिन और खनिज तत्वों का सेवन लाभकारी होता है। सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत टीबी मरीजों को पोषण सहायता भी प्रदान की जाती है ताकि उपचार के दौरान उन्हें आवश्यक पोषण मिल सके।
टीबी को लेकर समाज में फैली भ्रांतियां भी एक बड़ी समस्या रही हैं। कई लोग इस बीमारी को सामाजिक कलंक के रूप में देखते हैं जिसके कारण मरीज अपनी बीमारी छिपाने की कोशिश करते हैं। इससे उपचार में देरी होती है और संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि टीबी को एक सामान्य इलाज योग्य बीमारी के रूप में देखा जाए और मरीजों को सामाजिक सहयोग तथा मानसिक समर्थन दिया जाए।
कोविड महामारी के दौरान टीबी नियंत्रण कार्यक्रमों पर भी असर पड़ा था जिससे कई मरीज समय पर जांच और उपचार से वंचित रह गए। लेकिन अब स्वास्थ्य विभाग फिर से सक्रिय होकर व्यापक स्तर पर जांच अभियान चला रहा है। गांवों और दूरदराज क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाई जा रही हैं ताकि कोई भी मरीज उपचार से वंचित न रहे। टीबी के खिलाफ लड़ाई केवल सरकार या स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि इसमें पूरे समाज की भागीदारी आवश्यक है। यदि किसी व्यक्ति में लक्षण दिखाई दें तो उसे जांच के लिए प्रेरित करना चाहिए। परिवार और समुदाय का सहयोग मरीज के आत्मविश्वास को बढ़ाता है और उपचार पूरा करने में मदद करता है।
आज चिकित्सा विज्ञान और सरकारी प्रयासों की बदौलत टीबी का सफल उपचार संभव है। लाखों लोग इस बीमारी को हराकर स्वस्थ जीवन जी रहे हैं। इसलिए टीबी के लक्षण दिखने पर घबराने की नहीं बल्कि तुरंत जांच और उपचार शुरू कराने की जरूरत है। जागरूकता समय पर पहचान नियमित दवा सेवन और संतुलित पोषण के माध्यम से टीबी को पूरी तरह हराया जा सकता है। यदि समाज और स्वास्थ्य तंत्र मिलकर प्रयास करें तो टीबी मुक्त भारत का सपना भी निश्चित रूप से साकार हो सकता है।
कांतिलाल मांडोत


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