शांति अशांति के बीच झूलती वैश्विक युद्ध की आशंका और परिणतिl

अमेरिका ईरान इजरायल युद्ध के बीच शांति वार्ता युद्ध के तैयारी के लिए समय समय पैदा करने की युति से ज्यादा कुछ नहींl

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अमेरिका ईरान इजरायल युद्ध के बीच शांति वार्ता युद्ध के तैयारी के लिए समय समय पैदा करने की युति से ज्यादा कुछ नहींl अमेरिका युद्ध विराम को सिर्फ इसलिए आगे बढ़ते जा रहे हैं कि उन्हें अपनी तैयारी के लिए और समय चाहिए वैसे ईरान भी पूरी तरह से कंगाली के दौर से गुजर रहा है अब उसे युद्ध बढ़ाने के लिए समय चाहिए इन परिस्थितियों में ऐसा नहीं लगता की तीनों में से कोई देश शांति चाहता हो सब अपनी अपनी महत्वाकांक्षा और विस्तार नीति पर अड़े हुए हैंl परिणाम स्वरुप पूरा विश्व वैश्विक युद्ध की आशंका और उसके होने वाले परिणामों से भयभीत दिखाई दे रहा हैl


वैश्विक परिदृश्य एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है, जहाँ कूटनीति की भाषा कमजोर और शक्ति-प्रदर्शन की भाषा प्रबल होती जा रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव विशेष रूप से अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच, विश्व को एक संभावित महायुद्ध यहाँ तक कि परमाणु युद्ध की आशंका की ओर धकेल रहा है। इस संपूर्ण घटनाक्रम में डोनाल्ड ट्रंप की नीतियाँ और उनके निर्णय भी चर्चा के केंद्र में हैं, जिन्हें लेकर विश्व स्तर पर विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। उनके द्वारा लिए जा रहे निर्णय पर अमेरिका के नागरिक उनके संसद सदस्य और वैश्विक देश के नेताओं द्वारा भी अविश्वास प्रकट किया जा रहा है उनकी मानसिक स्थिति पर भी अब सवालिया निशान लगने लगे हैं।


ऐतिहासिक तौर पर देखा जाए तो शांति वार्ताओं का उद्देश्य सदैव संघर्ष को समाप्त कर स्थिरता स्थापित करना होता है, किंतु हालिया प्रयासों में यह उद्देश्य बिखरता हुआ प्रतीत हो रहा है। जब मध्यस्थता के लिए पाकिस्तान जैसे कमजोर,आतंकवादी और अपरिपक्व  मानसिकता वाले देश को आगे किया गया, तब ही कई कूटनीतिक विश्लेषकों ने इसकी निष्पक्षता और प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया था। किसी भी शांति प्रक्रिया की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि मध्यस्थ देश निष्पक्ष, विश्वसनीय और सभी पक्षों के लिए स्वीकार्य हो। यदि मध्यस्थ ही अपने रणनीतिक हितों में उलझा हो, तो वार्ता का मार्ग स्वतः ही संदिग्ध हो जाता है।


अमेरिका और इज़रायल का दृष्टिकोण ईरान की परमाणु क्षमताओं को सीमित करने पर केंद्रित रहा है, जबकि ईरान अपनी संप्रभुता और सुरक्षा के अधिकारों का सदैव पक्षकार  रहा है। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांति और ऊर्जा के उद्देश्य से है, परंतु पश्चिमी देशों को इसमें संभावित सैन्य उपयोग की आशंका दिखाई देती है। यही अविश्वास शांति वार्ता को बार-बार विफल करता रहा है।

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अमेरिका द्वारा ईरान के प्रस्तावों को अस्वीकार करना इस बात का संकेत है कि दोनों पक्षों के बीच संवाद की खाई गहरी होती जा रही है। इज़रायल, जो पहले से ही ईरान को कई वर्षों से अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है, और उसके लिए यह लड़ाई अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण भी है और वह किसी भी प्रकार के समझौते को लेकर अत्यंत सावधान और अतिरिक्त सतर्क है। ऐसे में जब तीनों शक्तियाँ अपने-अपने हितों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक अड़े हुए और अडिग हों, तो शांति का मार्ग और भी ना मुमकिन सा होता दिखाई देता है।
यदि यह तनाव आगे बढ़कर जैसा की युद्ध विश्लेषक आशंका जाता रहे हैं परमाणु संघर्ष में परिवर्तित होता है, तो इसके परिणाम न केवल अत्यंत भयानक तथा विनाशक होने की संभावना होगी बल्कि युद्ध क्षेत्र भी सीमित नहीं रहेंगे, पूरी दुनिया इसकी जद और बड़े प्रभाव में आ जाएगी। सबसे पहले असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। तेल उत्पादक क्षेत्र होने के कारण पश्चिम एशिया में युद्ध छिड़ने से कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आएगा, जिससे महंगाई वैश्विक स्तर पर बेकाबू हो जाएगी। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह स्थिति और भी गंभीर हो सकती है, जहाँ पहले से ही आम जनता महंगाई के दबाव से जूझ रही है।

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महंगाई का सीधा असर आम जीवन पर पड़ता है।खाद्य पदार्थ, ईंधन, परिवहन, दवाइयाँ सभी की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। इससे निम्न और मध्यम वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होगा ह। रोजगार के अवसर कम हो जाते हैं, और आर्थिक असमानता बढ़ जाती है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी परमाणु युद्ध के दुष्परिणाम अत्यंत भयावह होंगे। परमाणु विस्फोट से निकलने वाला विकिरण  न केवल तत्काल जनहानि करता है, बल्कि पीढ़ियों तक चलने वाली बीमारियों को जन्म देता है। कैंसर, जन्मजात विकृतियाँ, मानसिक रोग ये सब ऐसे प्रभाव हैं जो दशकों तक मानवता को झेलने पड़ते हैं। पर्यावरण पर इसका असर भी विनाशकारी होता है,जल, वायु और मिट्टी सभी प्रदूषित हो जाते हैं, जिससे कृषि उत्पादन ठप हो सकता है और खाद्य संकट उत्पन्न हो सकता है। इसके अतिरिक्त, एक परमाणु युद्ध “न्यूक्लियर विंटर” जैसी स्थिति भी पैदा कर सकता है, जिसमें धूल और धुएँ के कारण सूर्य का प्रकाश धरती तक नहीं पहुँच पाता, जिससे वैश्विक तापमान में भारी गिरावट आ सकती है। इसका परिणाम व्यापक अकाल और पारिस्थितिक असंतुलन के रूप में सामने आएगा।

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वर्तमान स्थिति में सबसे अधिक आवश्यकता संयम, संवाद और विवेकपूर्ण नेतृत्व की है। विश्व शक्तियों को यह समझना होगा कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि नई समस्याओं की शुरुआत है। कूटनीति की मेज पर बैठकर मतभेदों को सुलझाना ही एकमात्र स्थायी मार्ग है।
अंततः, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज मानवता एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है, जहाँ एक ओर शांति, सहयोग और विकास का मार्ग है, तो दूसरी ओर विनाश, अराजकता और अंधकार का। निर्णय विश्व नेताओं के हाथ में है, परंतु परिणाम पूरी मानवता को भुगतना होगा। इसलिए यह आवश्यक है कि शांति को प्राथमिकता दी जाए और विश्व को एक और महायुद्ध की विभीषिका से बचाया जाए।

संजीव ठाकुर, वरिष्ठ पत्रकार,लेखक, चिंतक, स्तंभकार,रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,

कविता,
संजीव-नी
हर स्त्री
शिव का अंश हुआ करती
यह बात
किसी ग्रंथ में लिखी नहीं
पर रसोई की धीमी आँच पर
उबलती आशाओं के साथ
चुपचाप समझ में आती।

वह
सारा जीवन
धीमा विष पिया करती है,
पर उसे
विष नही समझती
कहती
बस थोड़ा कड़वा पेय है।

उसकी हथेलियों में
रेखाएँ नहीं,
छोटे-छोटे संस्कार होते
जहाँ से
घर गुजरता
बच्चे इसी धारा में युवा होते
और समय
धीरे से थम जाता
कुछ पल आराम करने।

वह सीसकियों की आवाज
को बर्तन में रख देती
ताकि घर में
कोई टूटने की आवाज़ न हो।

कभी-कभी
आईने में देखती खुद को,
तो उसे
अपने ही चेहरे में
नीला आकाश दिखता ।

जैसे किसी ने
विष को भी
रंग में बदल दिया हो।

हर स्त्री
शिव का अंश हुआ करती
इसलिए नहीं कि वह देवता है,
बल्कि इसलिए कि
वह अपने भीतर
सारा विष रख लेती
और फिर भी
दुनिया को
खाली हाथ नहीं जाने देती।

संजीव ठाकुर,रायपुर छत्तीसगढ़,
9009 415 415,

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