पश्चिम बंगाल में भाजपा—तो मुख्यमंत्री कौन 

 देश के इतिहास में पहली बार पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के दौरान 92 प्रतिशत से अधिक रिकॉर्ड मतदान ने सभी पूर्वानुमानों और एग्जिट पोल को नई दिशा दे दी है।

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 देश के इतिहास में पहली बार पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के दौरान 92 प्रतिशत से अधिक रिकॉर्ड मतदान ने सभी पूर्वानुमानों और एग्जिट पोल को नई दिशा दे दी है। अधिकांश सर्वेक्षणों में प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के राज्य में पहली बार सरकार बनाने के दावे सामने आ रहे हैं। यह परिदृश्य न केवल राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैबल्कि राज्य की बदलती जन-चेतना का भी संकेत देता है। चुनाव पूर्व मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण को लेकर राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कड़ा विरोध दर्ज कराया और न्यायिक चुनौतियाँ भी पेश कीं। हालांकिसर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद प्रक्रिया आगे बढ़ी। अनुमान है कि लाखों ऐसे लोगजो अपने नागरिकता संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सकेमतदान सूची से बाहर रह गए। इस पृष्ठभूमि में हुई बंपर वोटिंग को कई विश्लेषक मतदाता सूची के शुद्धिकरण का परिणाम मान रहे हैंजिससे सूची में शामिल मतदाताओं ने निर्भीक होकर मतदान किया।

     ऐतिहासिक रूप से देखें तो पश्चिम बंगाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कर्मभूमि और श्यामाप्रसाद मुखर्जी की जन्मस्थली रहा हैफिर भी यह विडंबना ही रही कि भाजपा को अब तक राज्य में सत्ता का अवसर नहीं मिला। 2014 के बाद पार्टी ने यहां अपनी पकड़ मजबूत की और एक दशक के भीतर वाम दलों तथा कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए मुख्य विपक्षी दल बन गई। अगर मतगणना के नतीजे भाजपा के पक्ष में आते हैंतो सबसे बड़ा प्रश्न होगा—राज्य का पहला भाजपा मुख्यमंत्री कौन बनेगाइस दौड़ में कई नाम चर्चा में हैं। तृणमूल कांग्रेस से आए प्रभावशाली नेता सुवेंदु अधिकारीप्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्ययुवा सांसद निशीथ प्रमाणिक और लोकप्रिय महिला चेहरा लॉकेट चटर्जी प्रमुख दावेदारों के रूप में देखे जा रहे हैं।

    हालांकिभाजपा की कार्यशैली को देखते हुए किसी नए या अपेक्षाकृत कम चर्चित चेहरे को आगे लाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इतना निश्चित है कि यदि भाजपा सत्ता में आती हैतो मुख्यमंत्री का चेहरा ऐसा होगा जो बंगाल की माटीसंस्कृति और सामाजिक संरचना से गहराई से जुड़ा हो। पश्चिम बंगाल का यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की संभावना भर नहीं हैबल्कि यह राज्य की राजनीतिक दिशा में संभावित बड़े बदलाव का संकेत भी है। अब सबकी निगाहें मतगणना पर टिकी हैंजहां यह तय होगा कि बंगाल की जनता किसे अपना नेतृत्व सौंपती है।

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                                                                                             अरविंद रावल

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