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पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतें आम आदमी की जेब पर भारी संकट
ऐसे में वैश्विक राजनीतिक तनाव, युद्ध या आपूर्ति में कमी का असर सीधे भारतीय बाजार पर पड़ता है
देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर एक बार फिर चिंता गहराती नजर आ रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के कारण भारत में भी ईंधन महंगा होने की आशंका बढ़ गई है। विदेशी ब्रोकरेज फर्म की रिपोर्ट के अनुसार, पेट्रोल की कीमतों में लगभग 18 रुपए प्रति लीटर और डीजल में 35 रुपए प्रति लीटर तक बढ़ोतरी संभव है। यह संभावित वृद्धि ऐसे समय में सामने आई है जब देश के कई राज्यों में चुनावी माहौल है और फिलहाल कीमतों को स्थिर रखा गया है।
भारत जैसे देश में जहां ऊर्जा की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर करता है, वहां कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव सीधे आम लोगों की जिंदगी को प्रभावित करता है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। इसमें से एक बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व और रूस जैसे क्षेत्रों से आता है। ऐसे में वैश्विक राजनीतिक तनाव, युद्ध या आपूर्ति में कमी का असर सीधे भारतीय बाजार पर पड़ता है।
पिछले कुछ हफ्तों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से वृद्धि देखी गई है। करीब डेढ़ महीने के भीतर ही कीमतों में 27 डॉलर प्रति बैरल तक का उछाल दर्ज किया गया है। इस बढ़ोतरी ने तेल कंपनियों पर भारी दबाव बना दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, तेल कंपनियां हर लीटर पेट्रोल पर करीब 18 रुपए और डीजल पर 35 रुपए तक का नुकसान झेल रही हैं। कुल मिलाकर यह नुकसान प्रतिदिन लगभग 1600 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है, जो पहले 2400 करोड़ रुपए के स्तर तक भी जा चुका था।
सरकार द्वारा एक्साइज ड्यूटी में कुछ कटौती किए जाने के बावजूद यह राहत पर्याप्त साबित नहीं हो रही है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार का तेल पर मिलने वाला राजस्व भी घटा है। जहां 2017 में यह 22 प्रतिशत था, वहीं अब घटकर करीब 8 प्रतिशत रह गया है। इसका मतलब यह है कि सरकार के पास भी कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सीमित विकल्प बचे हैं। यदि सरकार पूरी तरह से एक्साइज ड्यूटी हटा भी दे, तब भी कंपनियों के घाटे की पूरी भरपाई संभव नहीं है।
इस स्थिति का एक बड़ा कारण वैश्विक स्तर पर बढ़ता तनाव भी है। पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष, विशेष रूप से ईरान और यूनाइटेड स्टेट के बीच बढ़ती खींचतान, कच्चे तेल की आपूर्ति को प्रभावित कर रही है। आपूर्ति में कमी और मांग में स्थिरता या वृद्धि के कारण कीमतें तेजी से ऊपर जा रही हैं। इसका असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
ईंधन की कीमतें बढ़ने का सीधा असर परिवहन लागत पर पड़ता है, जिससे हर वस्तु की कीमत बढ़ जाती है। खाद्य तेल, साबुन, शैंपू, बिस्किट और अन्य रोजमर्रा के उत्पाद महंगे होने लगते हैं। कई कंपनियां कीमतें बढ़ाने के बजाय पैकेट का आकार छोटा कर देती हैं, जिसे ‘श्रिंकफ्लेशन’ कहा जाता है। इससे उपभोक्ताओं पर अप्रत्यक्ष रूप से बोझ बढ़ता है।
खाद्य तेल की बात करें तो भारत अपनी जरूरत का लगभग 57 प्रतिशत आयात करता है। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से इनके दाम भी 7 प्रतिशत तक बढ़ चुके हैं। वहीं प्लास्टिक और पैकेजिंग सामग्री महंगी होने से एफएमसीजी कंपनियों की लागत बढ़ गई है। इसका असर सीधे उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ रहा है।
घरेलू उपकरणों के क्षेत्र में भी लागत में 10 से 15 प्रतिशत तक की वृद्धि हो चुकी है। कंपनियां इसका बड़ा हिस्सा पहले ही ग्राहकों पर डाल चुकी हैं और आगे भी कीमतें बढ़ने की संभावना बनी हुई है। कपड़ा उद्योग में सिंथेटिक फाइबर की कीमतें 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं, जिससे कपड़ों के दाम भी बढ़ेंगे। पेंट उद्योग में भी लागत में वृद्धि के कारण 2 से 5 प्रतिशत तक कीमत बढ़ाने की तैयारी की जा रही है।
इस पूरी स्थिति का एक और महत्वपूर्ण पहलू देश का चालू खाता घाटा है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण भारत का चालू खाता घाटा बढ़ सकता है। अनुमान है कि 2026 की पहली तिमाही में यह 20 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। यह देश की आर्थिक स्थिरता के लिए चिंता का विषय है।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ईंधन की कीमतों में वृद्धि देखी जा रही है। यूनाइटेड स्टेट में पेट्रोल की औसत कीमतें 4 डॉलर प्रति गैलन के पार पहुंच गई हैं, जो पिछले कुछ वर्षों में एक महत्वपूर्ण स्तर माना जाता है। भारत के पड़ोसी देशों जैसे पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका में भी ईंधन की कीमतों में वृद्धि की गई है।
फिलहाल भारत में कीमतों को स्थिर रखा गया है, लेकिन यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहना मुश्किल है। जैसे ही चुनावी प्रक्रिया समाप्त होगी, कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है। यदि ऐसा होता है तो इसका सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ेगा और महंगाई में और वृद्धि होगी।इस परिस्थिति में सरकार के सामने संतुलन बनाए रखने की चुनौती है। एक ओर कंपनियों के घाटे को कम करना जरूरी है, तो दूसरी ओर आम जनता को राहत देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसके लिए दीर्घकालिक समाधान की आवश्यकता है, जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना, आयात पर निर्भरता कम करना और ऊर्जा दक्षता में सुधार करना।
अंततः यह स्पष्ट है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में संभावित वृद्धि केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव भी रखती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और तेल कंपनियां इस चुनौती से कैसे निपटती हैं और आम जनता को कितनी राहत मिल पाती है।
कांतिलाल मांडोत
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