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होर्मुज की नाकेबंदी से टूटती अनगिनत उम्मीदें
ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता और करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी टिकी हुई है
महेन्द्र तिवारी
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के नक्शे पर महज एक संकरी रेखा है, लेकिन इस रेखा के दोनों किनारों पर आज जो ताकतें आमने-सामने खड़ी हैं, उनकी टकराहट की गूँज पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था की नींव तक पहुँच रही है। होर्मुज नाकेबंदी का यह संकट केवल दो देशों के बीच के सैन्य टकराव की कहानी नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था के दरकने की कहानी है जिस पर पिछले कई दशकों से वैश्विक व्यापार की रफ्तार, ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता और करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी टिकी हुई है।
इस संकट की पृष्ठभूमि फरवरी 2026 के अंत में बनी जब अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने ईरान पर सैन्य हमले किए। ईरान ने इसके जवाब में होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की और वहाँ से गुजरने वाले जहाजों पर नियंत्रण की कोशिशें तेज कर दीं। यह वही जलमार्ग है जिससे सामान्य परिस्थितियों में विश्व के समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत गुजरता है। इसके बाद पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शांति वार्ताओं का एक लंबा दौर चला। सप्ताहों तक कूटनीतिक मेज पर बातचीत होती रही लेकिन जब ये वार्ताएँ बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गईं तो 13 अप्रैल 2026 को भारतीय समयानुसार शाम लगभग 7 बजकर 30 मिनट पर अमेरिका ने ईरान के सभी प्रमुख बंदरगाहों पर समुद्री नाकेबंदी लागू कर दी। इस एक घोषणा ने पूरी दुनिया की आर्थिक नब्ज को झकझोर कर रख दिया।
नाकेबंदी को सीमित रखने की कोशिश की गई। अमेरिकी सैन्य कमान ने स्पष्ट किया कि यह केवल उन जहाजों पर लागू होगी जो ईरानी बंदरगाहों में प्रवेश करते हैं या वहाँ से बाहर निकलते हैं। खाड़ी के अन्य देशों के बीच आवागमन को बाधित नहीं किया जाएगा। उद्देश्य यह था कि ईरान की तेल निर्यात क्षमता को कुचला जाए लेकिन वैश्विक व्यापार पूरी तरह ठप न हो। किंतु यह सीमित रणनीति भी बाजारों को स्थिर नहीं रख सकी। जैसे ही नाकेबंदी की घोषणा हुई, कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई और कुछ ही घंटों में यह 101 से 104 डॉलर प्रति बैरल के बीच पहुँच गई। यह केवल तत्काल बाजार प्रतिक्रिया नहीं थी बल्कि इसमें आने वाले महीनों की गहरी अनिश्चितता का डर भी शामिल था। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि यह संकट लंबा खींचा तो तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं।
ईरान की जवाबी चालों ने समुद्री व्यापार को जड़ से हिला दिया। सैकड़ों जहाज खाड़ी के बाहर लंगर डाले प्रतीक्षा करते रहे। लाखों बैरल तेल समुद्र में ही अटका रहा। अनुमान है कि प्रतिदिन लगभग 20,00,000 बैरल ईरानी तेल की आपूर्ति इस नाकेबंदी से प्रभावित हो सकती है। यह आँकड़ा वैश्विक बाजार के लिए किसी गहरे घाव से कम नहीं है। जब इतनी बड़ी मात्रा में तेल आपूर्ति अचानक बाधित होती है तो उसकी प्रतिध्वनि केवल पेट्रोल पंपों पर नहीं बल्कि हर उस चीज की कीमत पर सुनाई देती है जिसे बनाने, उगाने या पहुँचाने में ऊर्जा की जरूरत होती है।
समुद्री बीमा दरों में तेज उछाल ने स्थिति को और जटिल बना दिया। जब जहाज संघर्ष क्षेत्र के पास से गुजरते हैं तो बीमा कंपनियाँ जोखिम के अनुपात में प्रीमियम बढ़ा देती हैं। इससे परिवहन की लागत बढ़ जाती है। जो जहाज वैकल्पिक मार्ग अपनाते हैं उन्हें अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप का लंबा चक्कर लगाना पड़ता है जिससे यात्रा का समय और ईंधन खर्च दोनों बढ़ जाते हैं। यह बढ़ी हुई लागत अंततः उन देशों तक पहुँचती है जो इस तेल के खरीदार हैं और वहाँ के उपभोक्ताओं की जेब पर सीधा बोझ बनती है। इस तरह होर्मुज में खींची गई एक रेखा दिल्ली, बीजिंग, टोक्यो और यूरोप की रसोइयों तक अपना असर दिखाती है।
एशिया इस संकट का सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक देश है और उसकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से पूरा होता है। ऊर्जा महंगी होने पर उसकी विनिर्माण लागत बढ़ेगी, उत्पाद महंगे होंगे और वैश्विक बाजार में उसकी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त कमजोर पड़ेगी। इसका असर उन देशों पर भी पड़ेगा जो चीनी वस्तुओं पर निर्भर हैं। भारत की स्थिति और भी अधिक नाजुक है। भारत अपनी कुल ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। तेल महंगा होने का अर्थ है कि परिवहन लागत बढ़ेगी, बिजली उत्पादन महंगा होगा, उद्योगों की लागत बढ़ेगी और अंततः हर वस्तु की कीमत ऊपर जाएगी। हाल की रिपोर्टों में यह सामने आया है कि तेल कीमतों में आई इस उछाल के कारण भारतीय मुद्रा पर भी दबाव बढ़ा है जो आयात को और महंगा बना देता है।
इस संकट का एक ऐसा पहलू भी है जिस पर आम तौर पर कम ध्यान जाता है और वह है खाद्य सुरक्षा पर पड़ने वाला असर। आधुनिक कृषि ऊर्जा पर बहुत अधिक निर्भर है। खाद बनाने में प्राकृतिक गैस का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है। जब ऊर्जा महंगी होती है तो खाद महंगी होती है, खेती की लागत बढ़ती है और अनाज के दाम चढ़ते हैं। 2026 के इस संघर्ष ने पहले ही तेल और गैस के साथ-साथ खाद आपूर्ति को भी प्रभावित किया है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़े आकलनों में गंभीर चेतावनी दी गई है कि यदि यह संकट लंबे समय तक बना रहा तो करोड़ों लोग गरीबी में धकेले जा सकते हैं और वैश्विक खाद्य संकट उभर सकता है। यह चेतावनी उन देशों के लिए विशेष रूप से भयावह है जो पहले से ही खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे हैं।
यूरोप की स्थिति भी चिंताजनक है। महाद्वीप पहले से ही ऊर्जा संकट की मार झेल रहा है और इस नई घटना ने उसकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्थाएँ जो अभी धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही थीं, उन्हें एक और झटका लगा है। इस पूरे संकट के सामरिक आयाम भी कम जटिल नहीं हैं। ईरान ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि किसी सैन्य जहाज ने उसके प्रभाव क्षेत्र के समीप हस्तक्षेप किया तो उसे संघर्षविराम का उल्लंघन माना जाएगा और जवाबी कार्रवाई होगी। इसका मतलब यह है कि कोई भी छोटी सी घटना बड़े युद्ध की शुरुआत बन सकती है। इस क्षेत्र में 1980 के दशक में भी ईरान-इराक युद्ध के दौरान इसी जलमार्ग को लेकर भयंकर तनाव देखा गया था। लेकिन आज की परिस्थिति उस दौर से कहीं अधिक जटिल है क्योंकि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था कहीं अधिक आपस में बुनी हुई है। एक जगह की आग दूसरी जगह पहुँचने में अब ज्यादा वक्त नहीं लगता।
अमेरिका की इस नाकेबंदी के पीछे केवल सैन्य उद्देश्य नहीं है। इसका मकसद ईरान को आर्थिक रूप से इतना दबाना है कि वह वार्ता की मेज पर वापस आने को मजबूर हो जाए। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि आर्थिक नाकेबंदी हमेशा वैसा असर नहीं करती जैसी उम्मीद होती है। कभी-कभी दबाव में आकर देश और अधिक कठोर रुख अपना लेते हैं। यदि ईरान ने भी ऐसा ही किया तो यह संकट और गहरा हो सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य का यह संकट हमें एक बड़ी सच्चाई से रूबरू कराता है। आधुनिक दुनिया में ऊर्जा मार्गों का नियंत्रण केवल आर्थिक मामला नहीं है, यह सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है। जो देश या शक्ति इन मार्गों पर काबिज होती है वह वैश्विक राजनीति की बिसात पर सबसे मजबूत मोहरा बन जाती है। अप्रैल 2026 की यह नाकेबंदी केवल एक कूटनीतिक चाल नहीं है। यह उस बड़े संघर्ष की एक कड़ी है जो ऊर्जा, भू-राजनीति और वैश्विक व्यवस्था के भविष्य को लेकर दशकों से चला आ रहा है। होर्मुज की यह आग आज चाहे जितनी सीमित लगे, इसकी तपिश दिल्ली से बीजिंग तक, लंदन से नैरोबी तक, हर जगह महसूस की जा रही है और यदि यह जल्द नहीं बुझी तो इसके धुएँ में न जाने कितनी अर्थव्यवस्थाएँ दम तोड़ देंगी।


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